‘समुद्र मंथन’ योजना से आयात घटाने की कोशिश, लेकिन सफलता की गारंटी नहीं कॉपी 

Samudra Manthan Yojana

समंदर में तेल की तलाश, 84 हजार करोड़ का दांव

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। देश अपनी जरूरत का करीब 88% कच्चा तेल और बड़ी मात्रा में प्राकृतिक गैस आयात करता है। इसी निर्भरता को कम करने के लिए केंद्र सरकार ने 84,084 करोड़ रुपये की महत्वाकांक्षी ‘समुद्र मंथन’ योजना को मंजूरी दी है।

इस योजना का उद्देश्य गहरे समुद्र में तेल और गैस के नए भंडार तलाशना है। अगले पांच वर्षों में करीब 60 गहरे समुद्री कुओं की खोज की जाएगी। सरकार प्रत्येक कुएं की खोज के लिए अधिकतम 650 करोड़ रुपये तक का जोखिम खुद उठाएगी। इसके अलावा समुद्र के नीचे पाइपलाइन, प्रोसेसिंग सुविधाओं और अन्य साझा बुनियादी ढांचे के विकास पर भी हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे।

हालांकि यह पहली बार नहीं है कि भारत समुद्र से तेल निकाल रहा है। देश का सबसे बड़ा ऑफशोर ऑयल फील्ड मुंबई हाई 1974 में खोजा गया था और आज भी भारत के प्रमुख उत्पादन केंद्रों में शामिल है। इसके अलावा कृष्णा-गोदावरी बेसिन भी तेल और गैस उत्पादन का महत्वपूर्ण क्षेत्र है। वहीं, जमीन पर असम के डिगबोई से लेकर गुजरात के अंकलेश्वर, मेहसाणा, और राजस्थान के बाड़मेर तक कई तेल क्षेत्र मौजूद हैं।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत में अब तक 966 तेल और गैस खोजें हो चुकी हैं। इनमें सबसे अधिक तेल और गैस के कुएं गुजरात, असम, मुंबई ऑफशोर, आंध्र प्रदेश, राजस्थान और तमिलनाडु में हैं।

सरकार ने समुद्री खोज का दायरा बढ़ाते हुए पहले प्रतिबंधित रहे 10 लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक समुद्री क्षेत्र को भी अन्वेषण के लिए खोल दिया है। उम्मीद है कि इससे नए भंडार मिल सकते हैं और आयात पर निर्भरता घटेगी।

हालांकि यह योजना एक बड़ा दांव भी है। गहरे समुद्र में ड्रिलिंग बेहद महंगी और तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण होती है। कई बार वर्षों की खोज के बाद भी तेल या गैस नहीं मिलती। ऐसे में सरकार ने संभावित ऊर्जा सुरक्षा के लिए बड़ा आर्थिक जोखिम उठाने का फैसला किया है। अगर यह प्रयास सफल रहा, तो भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।

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