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ब्रिक्स 2026: नई दिल्ली से तय होगी 'ग्लोबल साउथ' की नई दिशा

DigitalDesk by DigitalDesk
September 11, 2026
in स्पेशल
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BRICS 2026 New Delhi to Chart the New Course for the Global South
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ब्रिक्स 2026: नई दिल्ली से तय होगी 'ग्लोबल साउथ' की नई दिशा

भारत 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में 18वें ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन की
मेज़बानी करने जा रहा है। इस बार भारत की अध्यक्षता का मुख्य फोकस 'मजबूती, नवाचार,
सहयोग और सतत विकास' पर केंद्रित है। हालांकि, ब्रिक्स के हालिया विस्तार के बाद समूह में
शामिल अलग-अलग देशों के रणनीतिक और आर्थिक हित भी स्पष्ट रूप से सामने आए हैं। इसी
संदर्भ में, भारत के सामने मौजूद इस अहम कूटनीतिक अवसर को लेकर CGTN हिन्दी
संवाददाता ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) की प्रोफेसर और ‘नेशन-स्टेट डायलॉग’
की फाउंडर डॉ. गीता कोछड़ से ख़ास बातचीत की।
भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता की बड़ी परीक्षा
भारत चौथी बार ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है। इसे कूटनीतिक लिहाज़ से एक अहम मौका
बताते हुए डॉ. कोछड़ ने कहा, "वर्तमान में 11 सदस्यों वाला यह विशाल समूह एक अहम मोड़
पर खड़ा है। मैं इसे भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता की एक बड़ी परीक्षा के रूप में देखती हूं।"
उन्होंने आगे बताया कि अब इस समूह में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, यूएई और इंडोनेशिया भी
जुड़ चुके हैं। ऐसे में भारत को इस तेज़ी से बढ़ते और जटिल होते समूह के बीच तालमेल बिठाने
का एक शानदार मौका मिल रहा है।
उनके मुताबिक, इसका मुख्य मक़सद ब्रिक्स को भू-राजनीतिक तनाव वाले मंच से बदलकर
आर्थिक और विकास सहयोग के इंजन के रूप में स्थापित करना है, जो कि इसकी शुरुआत का
भी मूल उद्देश्य था। साल 2026 के आधिकारिक विषय का ज़िक्र करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया
कि भारत का लक्ष्य ब्रिक्स को पश्चिम-विरोधी राजनीतिक हथियार बनने से रोकना और इसे पूरी
तरह से आर्थिक ढांचे की तरफ मोड़ना है। इसके तहत एमएसएमई (MSME) फोरम और
सप्लाई चेन की मज़बूती पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
विस्तार से बदल रहा है ब्रिक्स का स्वरूप
ब्रिक्स के विस्तार और इसकी बढ़ती ताक़त के सवाल पर प्रोफेसर गीता कोछड़ ने सहमति
जताते हुए कहा कि शुरुआत में यह महज़ पांच देशों का समूह था, लेकिन अब इसमें 11 पूर्ण

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सदस्य और लगभग 10 पार्टनर देश शामिल हो चुके हैं। इस बड़े बदलाव ने समूह के काम करने
के तरीके को पूरी तरह से बदल दिया है। उन्होंने बताया, "आज के समय में करीब 30 और देश
ब्रिक्स में शामिल होने के इच्छुक हैं, जिनमें पाकिस्तान का नाम भी शामिल है। इससे विश्व
स्तर पर इस समूह का प्रभाव और अहमियत काफ़ी तेज़ी से बढ़ रही है।" नए संसाधनों से समृद्ध
और रणनीतिक रूप से अहम देशों के जुड़ने से ब्रिक्स अब दुनिया भर में एक उभरते हुए वैश्विक
संगठन की तरह देखा जा रहा है। वर्तमान में यह समूह दुनिया के तेल उत्पादन और प्रमुख
समुद्री व्यापार मार्गों के एक बड़े हिस्से को नियंत्रित करता है।
हालांकि, उन्होंने इस बात पर भी ध्यान खींचा कि समूह आम सहमति के आधार पर फैसले लेता
है। ऐसे में क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता और विपरीत विदेश नीति वाले देशों के एक साथ आने से एक
जटिल ढांचा उभर कर सामने आ रहा है। इसके बावजूद, भारत नई दिल्ली शिखर सम्मेलन के
दौरान आपसी मतभेदों को दूर करने और एक डायलॉग (संवाद) स्थापित करने का भरपूर प्रयास
कर रहा है, जो अपने आप में एक नई और सकारात्मक शुरुआत है।
भारत-चीन रिश्तों के लिए एक 'डिप्लोमैटिक सेफ्टी वाल्व'
भारत और चीन के रिश्तों में सहयोग और प्रतिस्पर्धा के बीच, ब्रिक्स अध्यक्षता के संभावित
असर पर बात करते हुए डॉ. कोछड़ ने इसे एक बेहतरीन अवसर बताया। उन्होंने कहा, "भारत की
ब्रिक्स अध्यक्षता एक संस्थागत जुड़ाव के लिए बहुत ही मूल्यवान तंत्र है। यह मुख्य रूप से
कॉन्फ्लिक्ट मैनेजमेंट (विवाद प्रबंधन) के एक अहम मंच के तौर पर उभर रहा है।" पिछले कुछ
समय में दोनों देशों के रिश्तों में जो सुधार आ रहा है, ब्रिक्स उसे और रफ़्तार दे सकता है।
उन्होंने बताया कि इस सम्मेलन के ज़रिए शीर्ष नेताओं को सीधी बातचीत का मौका मिलता है।
व्यापारिक दृष्टिकोण से भी यह बेहद अहम है। डॉ. कोछड़ के अनुसार, भारत इस मंच का
उपयोग व्यावहारिक आर्थिक मतभेदों को सुलझाने के लिए कर रहा है। व्यापार में आपसी लेन-
देन, हाई-टेक आयात पर कस्टम की रुकावटों या चीनी निवेश में आने वाली अड़चनों पर सीधी
बातचीत की तैयारी चल रही है। अगर दोनों देश इन मुद्दों पर सीधे बात कर पाते हैं, तो यह एक
'डिप्लोमैटिक सेफ्टी वाल्व' की तरह काम करेगा, जिससे ज़िम्मेदारी से तनाव कम करने और
आर्थिक सहयोग खोजने में काफ़ी मदद मिलेगी।

2026 और 2027: एक दीर्घकालिक साझा एजेंडा
साल 2026 में भारत और 2027 में चीन द्वारा लगातार ब्रिक्स की अध्यक्षता किए जाने के
संदर्भ में डॉ. गीता कोछड़ ने इसे एक दीर्घकालिक एजेंडा तय करने का अनोखा मौका बताया।
उन्होंने स्पष्ट किया, "लगातार अध्यक्षता होने से तटस्थ, विकासात्मक और तकनीकी मोर्चों पर
नीतिगत निरंतरता बढ़ जाती है। चीन ने अपनी कूटनीति में 'ब्रिक्स पावर आर्किटेक्चर' का
प्रस्ताव रखा है, जिसका मक़सद नए सदस्यों को समूह की कार्यप्रणाली में आसानी से शामिल
करना है।" दोनों देश इस कार्यकाल का लाभ उठाकर ब्रेटन वुड्स सिस्टम में सुधार लाने,
आईएमएफ (IMF) के कोटा फॉर्मूले में बदलाव करने और 'ग्लोबल साउथ' की आवाज़ को
मज़बूत करने की दिशा में काम कर सकते हैं।
इसके अलावा, न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) के फंड को बढ़ाने, इंफ्रास्ट्रक्चर फंड्स, लोकल करेंसी
में ट्रेडिंग सिस्टम को मज़बूत करने और ग्रीन ग्रोथ जैसे अहम मुद्दों पर दोनों देशों के बीच
तालमेल बिठाने की कोशिश हो रही है। अंत में उन्होंने कहा कि अगर भारत और चीन इन मुद्दों
पर एक साझा दृष्टिकोण अपनाते हैं, तो यह न केवल पूरे एशिया बल्कि दुनिया भर के लिए एक
नई दिशा और नए अवसर पैदा करेगा।
(अखिल पाराशर, CGTN हिन्दी संवाददाता, पेइचिंग)

Tags: #BRICS 2026 #New Delhi #Chart the New Course #Global South
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