भोपाल। दिवाली की खुशियों और खरीदारी के बीच आम आदमी के सामने अब रोजमर्रा के खर्च का सवाल खड़ा हो सकता है। चॉकलेट, बिस्किट, साबुन, खाद्य तेल, टूथपेस्ट और चाय-कॉफी जैसे उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी की आशंकाएं जताई जा रही हैं। वहीं, मोबाइल सेवाओं के शुल्क में संभावित वृद्धि भी उपभोक्ताओं का मासिक बजट बिगाड़ सकती है। ऐसे में सवाल है कि क्या त्योहार के बाद महंगाई का नया दौर शुरू होने वाला है और इसका सबसे ज्यादा असर किस पर पड़ेगा?
हालांकि, अलग-अलग उत्पादों के दाम 15 से 74 प्रतिशत तक बढ़ने का दावा बेहद बड़ा है। उपलब्ध जानकारी से यह पुष्टि नहीं होती कि सभी संबंधित कंपनियों ने इतनी बढ़ोतरी का अंतिम फैसला कर लिया है। इसलिए इन आंकड़ों को घोषित मूल्य वृद्धि के बजाय संभावित बढ़ोतरी के दावों के रूप में देखना जरूरी है।
चॉकलेट-बिस्किट से साबुन तक, कहां पड़ेगी मार?
रोजमर्रा के उपभोग वाले उत्पाद बनाने वाली कंपनियों के सामने कच्चे माल, पैकेजिंग, परिवहन और उत्पादन लागत का दबाव कीमतों में बदलाव की वजह बन सकता है। कोको और चीनी महंगे होने पर चॉकलेट तथा मिठाई उत्पादों की लागत बढ़ती है। इसी तरह पाम तेल और पाम कर्नेल तेल की कीमतों का असर साबुन, डिटर्जेंट और कुछ खाद्य उत्पादों के निर्माण पर पड़ सकता है।
चाय और कॉफी के मामले में भी कच्चे माल की कीमत, आयात लागत और आपूर्ति की स्थिति महत्वपूर्ण है। हालांकि, हर उत्पाद की लागत संरचना अलग होती है। इसलिए एक ही प्रतिशत से सभी वस्तुओं की कीमत बढ़ने का अनुमान लगाना सही नहीं होगा।
महंगाई बढ़ने के पीछे चार बड़े कारण
पहला कारण: कच्चे माल की बढ़ती लागत। कोको, खाद्य तेल, कॉफी बीन्स और अन्य औद्योगिक सामग्रियों की कीमतों में तेजी आने पर कंपनियों का उत्पादन खर्च बढ़ सकता है। यदि यह दबाव लंबे समय तक बना रहता है, तो कंपनियां इसकी भरपाई कीमतें बढ़ाकर कर सकती हैं।
दूसरा कारण: पुराने स्टॉक से नए स्टॉक की ओर बदलाव। बाजार में पहले से मौजूद माल पुराने मूल्य पर बिक सकता है, जबकि नई खेप की कीमतें अलग हो सकती हैं। लेकिन 31 अक्टूबर के बाद सभी कंपनियां अनिवार्य रूप से नए दाम लागू करेंगी, इसकी स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है। कीमतों में बदलाव कंपनी और उत्पाद के अनुसार अलग-अलग समय पर हो सकता है।
तीसरा कारण: रुपये की कमजोरी। डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होने से आयातित कच्चे माल की लागत बढ़ सकती है। कोको, कॉफी और कुछ तेलों के आयात पर निर्भर कंपनियों के लिए यह अतिरिक्त दबाव पैदा करता है। हालांकि, अंतिम कीमत पर असर इस बात से भी तय होता है कि कंपनियों ने कितना माल पहले खरीदा है और लागत का कितना हिस्सा वे स्वयं वहन करती हैं।
चौथा कारण: मांग और बाजार की स्थिति। त्योहारों के दौरान मिठाई, चॉकलेट, बिस्किट और अन्य उपभोक्ता वस्तुओं की मांग बढ़ सकती है। लेकिन केवल मांग बढ़ने से कीमतों में वृद्धि तय नहीं होती। प्रतिस्पर्धा, उपभोक्ताओं की खरीद क्षमता और कंपनियों की व्यावसायिक रणनीति भी इसमें भूमिका निभाती है।
कंपनियां कीमत बढ़ाने के बजाय पैक छोटा करें तो?
महंगाई का असर केवल मूल्य वृद्धि के रूप में दिखाई नहीं देता। कई बार उत्पाद की कीमत समान रहती है, लेकिन पैकेट में मात्रा घटा दी जाती है। इसे श्रिंकफ्लेशन कहा जाता है।
उदाहरण के लिए, यदि किसी बिस्किट के पैकेट की कीमत 20 रुपये ही रहती है, लेकिन उसमें बिस्किट की मात्रा कम हो जाती है, तो उपभोक्ता को उतनी ही रकम में कम सामान मिलता है। इसी तरह साबुन, चिप्स, चॉकलेट और अन्य पैकेटबंद उत्पादों में भी मात्रा तथा प्रति इकाई कीमत पर नजर रखना जरूरी है।
8 से 10 हजार का बजट 12 से 13 हजार कैसे पहुंचेगा?
यदि किसी परिवार का मासिक किराना बजट 8,000 से 10,000 रुपये है, तो रोजमर्रा की वस्तुओं में व्यापक और लगातार मूल्य वृद्धि होने पर खर्च बढ़ सकता है। लेकिन यही बजट बढ़कर 12,000 से 13,000 रुपये हो जाएगा, ऐसा निश्चित रूप से कहना अभी उचित नहीं है। इसके लिए वास्तविक मूल्य वृद्धि, परिवार की खरीदारी की आदतों और अलग-अलग वस्तुओं पर होने वाले खर्च के आंकड़े जरूरी हैं।
कम आय वाले और निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों पर इसका असर अधिक महसूस हो सकता है, क्योंकि उनकी आय का बड़ा हिस्सा भोजन, घरेलू जरूरतों और परिवहन पर खर्च होता है। कीमतें बढ़ने पर परिवार ब्रांड बदलने, कम मात्रा खरीदने या गैर-जरूरी खर्च घटाने को मजबूर हो सकते हैं।
मोबाइल रिचार्ज भी बढ़ेगा? दिसंबर पर नजर
मोबाइल सेवाओं के शुल्क में संभावित वृद्धि की चर्चाएं भी उपभोक्ताओं के लिए चिंता का विषय हैं। यदि दूरसंचार कंपनियां शुल्क बढ़ाती हैं, तो इसका सीधा असर हर महीने के मोबाइल बजट पर पड़ेगा। लेकिन दिसंबर में 15 प्रतिशत की वृद्धि को अंतिम निर्णय मानने से पहले संबंधित कंपनियों की आधिकारिक घोषणा की पुष्टि जरूरी है।
महंगाई का खतरा वास्तविक, लेकिन दावों की पुष्टि जरूरी
त्योहार के बाद आम उपभोक्ता के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने घरेलू बजट को संतुलित रखने की होगी। कच्चे माल की लागत, आयात खर्च और रुपये की कमजोरी उत्पादों की कीमतों पर दबाव बना सकते हैं। लेकिन चॉकलेट, बिस्किट, साबुन और दूसरी वस्तुओं के दाम 15 से 74 प्रतिशत तक बढ़ने का दावा तभी निर्णायक माना जा सकता है, जब संबंधित कंपनियों की घोषणाएं और बाजार के प्रमाण सामने हों।
फिलहाल उपभोक्ताओं के लिए जरूरी है कि वे पैकेट पर दर्ज मात्रा, प्रति इकाई कीमत और नए मूल्य की तुलना करें। क्योंकि महंगाई का असर केवल इस बात से नहीं तय होगा कि सामान कितने रुपये महंगा हुआ, बल्कि इससे भी कि समान बजट में पहले के मुकाबले कितना कम सामान मिल रहा है।