पंजाब में BJP-अकाली दल की फिर जुगलबंदी? तीन पेंच सुलझे तो बन सकता है गठबंधन
हेडर 1: 2027 से पहले फिर करीब आ रहे पुराने साथी
पंजाब की सियासत में BJP और शिरोमणि अकाली दल के बीच गठबंधन की अटकलें एक बार फिर तेज हैं। दोनों दल सार्वजनिक तौर पर अलग-अलग चुनाव लड़ने की बात कर रहे हैं, लेकिन सूत्रों के मुताबिक पर्दे के पीछे गठबंधन को लेकर बातचीत जारी है। सीट बंटवारे पर एक दौर की चर्चा हो चुकी है और अब तीन अहम मुद्दे बातचीत के केंद्र में हैं—कितनी सीटें मिलेंगी, कौन-कौन सी सीटें किसके खाते में जाएंगी और चुनाव जीतने की स्थिति में मुख्यमंत्री का चेहरा कौन होगा।
दिलचस्प बात यह है कि दोनों पार्टियां एक-दूसरे के साथ लंबा राजनीतिक इतिहास साझा करती हैं। 1996 से 2020 तक BJP और अकाली दल साथ रहे और इस दौरान गठबंधन ने कई चुनावी सफलताएं हासिल कीं। कृषि कानूनों के मुद्दे पर 2020 में दोनों के रास्ते अलग हुए थे। अब 2027 विधानसभा चुनाव से पहले बदले राजनीतिक समीकरण दोनों दलों को फिर करीब ला रहे हैं।
BJP 25 से कम सीटों पर मानने को तैयार नहीं
सबसे बड़ा पेच सीटों की संख्या को लेकर है। पुराने गठबंधन में BJP 117 विधानसभा सीटों में से सिर्फ 23 सीटों पर चुनाव लड़ती थी। लेकिन इस बार BJP उस पुराने फॉर्मूले पर लौटने के लिए तैयार नहीं दिखती। पार्टी 25 से कम सीटों पर समझौता नहीं करना चाहती और अपने हालिया चुनावी प्रदर्शन के आधार पर ज्यादा सीटों पर दावा कर रही है।
2024 लोकसभा चुनाव में BJP को पंजाब में 18.56 फीसदी वोट मिले थे। पार्टी का दावा है कि वह 23 विधानसभा क्षेत्रों में आगे रही, जबकि छह सीटों पर दूसरे और 16 पर तीसरे स्थान पर रही। यानी 45 विधानसभा क्षेत्रों में BJP का प्रदर्शन अकाली दल से बेहतर रहा। इसी आधार पर BJP मानती है कि उसकी संगठनात्मक और चुनावी ताकत 2020 के मुकाबले बढ़ी है।
दूसरी तरफ अकाली दल भी अपने पारंपरिक ग्रामीण और सिख वोट बैंक के आधार पर मजबूत हिस्सेदारी चाहता है। इसलिए सीटों का बंटवारा गठबंधन की सबसे कठिन परीक्षा बन सकता है।
सीट कौन सी? शहरी-ग्रामीण फॉर्मूला भी बदलेगा
दूसरा बड़ा सवाल सिर्फ कितनी सीटें नहीं, बल्कि कौन सी सीटें हैं। पुराने गठबंधन में मोटे तौर पर BJP का फोकस शहरी सीटों पर और अकाली दल का प्रभाव ग्रामीण क्षेत्रों में रहा। लेकिन इस बार अकाली दल सेमी-अर्बन सीटों पर भी अपना दावा मजबूत करना चाहता है।
यही बात BJP के लिए परेशानी पैदा कर सकती है, क्योंकि जिन क्षेत्रों में BJP अपना संगठन मजबूत कर रही है, वहां अकाली दल भी उम्मीदवार उतारना चाहता है। लिहाजा दोनों पार्टियों को सीटों की पहचान पर बारीकी से समझौता करना होगा।
2024 के आंकड़ों को देखते हुए BJP अपने मजबूत प्रदर्शन वाली सीटें छोड़ना नहीं चाहेगी। वहीं अकाली दल उन सीटों पर दावा कर सकता है जहां उसका पारंपरिक संगठन और स्थानीय नेतृत्व मजबूत है।
यानी गठबंधन की बातचीत का असली गणित ‘सीटों की संख्या’ से ज्यादा ‘सीटों की गुणवत्ता’ पर टिका हुआ है।
सुखबीर बादल बनेंगे CM फेस या BJP मांगेगी डिप्टी CM?
सबसे संवेदनशील मुद्दा मुख्यमंत्री पद का चेहरा है। अकाली दल की स्वाभाविक इच्छा होगी कि गठबंधन चुनाव में सुखबीर सिंह बादल को मुख्यमंत्री पद के चेहरे के तौर पर पेश करे। लेकिन BJP के भीतर इसे लेकर एकराय होना आसान नहीं माना जा रहा।
BJP का एक वर्ग मानता है कि अगर गठबंधन ज्यादा सीटों पर BJP लड़ती है और उसका प्रदर्शन बेहतर रहता है, तो सत्ता में उसकी हिस्सेदारी भी बढ़नी चाहिए। ऐसी स्थिति में पार्टी उपमुख्यमंत्री पद के साथ महत्वपूर्ण मंत्रालयों और सत्ता-साझेदारी की मांग कर सकती है।
दूसरी ओर, अगर अकाली दल ज्यादा सीटों पर लड़ता है और गठबंधन बहुमत हासिल करता है तो मुख्यमंत्री पद पर उसका दावा स्वाभाविक रूप से मजबूत होगा।
इसलिए संभव है कि गठबंधन बनने के बावजूद दोनों दल चुनाव से पहले CM फेस घोषित न करें और परिणाम आने के बाद विधायक दल की ताकत के आधार पर सत्ता का फॉर्मूला तय करें।
BJP ने संगठन मजबूत किया, ड्रग्स बनेगा बड़ा मुद्दा
गठबंधन पर बातचीत के बावजूद BJP अपने संगठन को कमजोर नहीं छोड़ना चाहती। पार्टी के संगठन महासचिव बीएल संतोष की पंजाब यात्रा के दौरान बूथ स्तर तक संगठन मजबूत करने पर चर्चा हुई। BJP का फोकस खास तौर पर उन क्षेत्रों में अपना स्वतंत्र आधार तैयार करने पर है जहां अभी तक अकाली दल के संगठन पर निर्भरता रही थी।
इसके साथ ही पार्टी ड्रग्स के खिलाफ अभियान को भी चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी में है। केंद्र सरकार की नशे के खिलाफ कार्रवाई और उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने के लिए राज्यव्यापी अभियान चलाने की योजना बताई जा रही है।
यानी BJP के लिए अकाली दल से गठबंधन एक विकल्प है, लेकिन पार्टी अपनी स्वतंत्र राजनीतिक जमीन भी तैयार कर रही है।
गठबंधन क्यों जरूरी और पेच कहां?
पंजाब की राजनीति में BJP और अकाली दल का रिश्ता नया नहीं है। दोनों ने लंबे समय तक एक-दूसरे की राजनीतिक ताकत का इस्तेमाल किया। अकाली दल के पास ग्रामीण पंजाब, सिख मतदाताओं और पारंपरिक संगठन की ताकत रही, जबकि BJP का प्रभाव खास तौर पर शहरी और हिंदू मतदाताओं के बीच रहा।
यानी दोनों दलों की ताकतें एक-दूसरे की कमजोरियों को भरती थीं।
लेकिन 2020 के बाद पंजाब की राजनीति काफी बदल चुकी है।
अब आम आदमी पार्टी सत्ता में है। कांग्रेस मुख्य विपक्षी ताकतों में है और BJP ने भी पंजाब में अपना स्वतंत्र राजनीतिक विस्तार शुरू कर दिया है। ऐसे में BJP अब पुराने गठबंधन में छोटी सहयोगी की भूमिका निभाने को तैयार नहीं दिखती।
यही असली बदलाव है।
1996 का BJP-अकाली गठबंधन जिस सामाजिक और राजनीतिक समीकरण पर खड़ा हुआ था, 2026 का पंजाब उससे अलग है।
2024 लोकसभा चुनाव के आंकड़ों ने BJP को यह विश्वास दिया है कि वह अकेले भी पंजाब में अपनी मौजूदगी बढ़ा सकती है। वहीं अकाली दल ने भी महसूस किया है कि BJP से अलग होकर चुनावी ताकत को पूरी तरह इस्तेमाल करना आसान नहीं है। यहीं से गठबंधन की जरूरत पैदा होती है।
गणित में 57 सीटों का दावा
BJP के आकलन के मुताबिक अगर दोनों दल 2024 लोकसभा चुनाव साथ लड़ते तो विधानसभा क्षेत्रों में उनका संयुक्त प्रदर्शन करीब 57 सीटों पर बढ़त का हो सकता था। यह बहुमत के 59 के आंकड़े से सिर्फ दो सीट कम होता। हालांकि यह सिर्फ चुनावी आंकड़ों पर आधारित एक राजनीतिक आकलन है, इसे संभावित विधानसभा परिणाम नहीं माना जा सकता। विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार, स्थानीय समीकरण, सत्ता विरोधी लहर और सीट-दर-सीट मुकाबला अलग परिणाम दे सकता है।
लेकिन राजनीतिक संदेश स्पष्ट है—अलग-अलग लड़कर दोनों दलों ने अपनी सीमाएं देख ली हैं, अब साथ आकर सत्ता में वापसी की संभावना तलाश रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल—क्या वोट ट्रांसफर होगा?
गठबंधन का सबसे बड़ा फायदा तभी होगा जब BJP और अकाली दल के वोट वास्तव में एक-दूसरे के उम्मीदवार को ट्रांसफर हों। यही गठबंधन की सबसे बड़ी परीक्षा होगी। BJP का वोटर हर सीट पर अकाली दल के उम्मीदवार को वोट देगा या नहीं? अकाली दल का पारंपरिक वोट BJP उम्मीदवार के पक्ष में कितना ट्रांसफर होगा? और क्या दोनों दलों के साथ आने से फ्लोटिंग वोट भी गठबंधन की तरफ आएगा?
इन सवालों के जवाब 2027 का चुनाव तय करेंगे।
इसलिए फिलहाल तस्वीर यह है कि BJP-अकाली गठबंधन की जमीन तैयार हो रही है, लेकिन डील अभी पूरी नहीं हुई है। तीन पेंच सबसे बड़े हैं—सीटों की संख्या, सीटों की पह चान और सत्ता में हिस्सेदारी। अगर इन तीनों पर सहमति बन गई तो पंजाब में एक पुराना राजनीतिक गठबंधन नए समीकरणों के साथ वापस आ सकता है। और तब 2027 का मुकाबला सिर्फ AAP बनाम कांग्रेस नहीं रहेगा—बल्कि पंजाब की सत्ता के लिए AAP, कांग्रेस और BJP-अकाली गठबंधन के बीच त्रिकोणीय मुकाबले का रास्ता खुल सकता है।