बंद खदान से बना रोजगार का नया पर्यटन मॉडल
छत्तीसगढ़ के विश्रामपुर में एक बंद पड़ी कोयला खदान आज न केवल पर्यटन का केंद्र बन चुकी है, बल्कि स्थानीय महिलाओं के लिए कमाई का मजबूत जरिया भी बन गई है। जो जगह कभी कोयला उत्पादन के लिए जानी जाती थी, आज वही स्थान पानी से भरी झील, नाव विहार, फ्लोटिंग रेस्टोरेंट और कॉटेज जैसी सुविधाओं सुविधाओं के साथ यह एक बेहद आकर्षक पिकनिक स्पॉट के तौर पर लगभग विकसित हो चुका है
- खदान से बना आकर्षक पिकनिक स्पॉट
- महिलाओं को मिला रोजगार का जरिया
- इको-टूरिज्म से बदली इलाके की तस्वीर
- नाव, कॉटेज और मछली पालन सुविधा
- विकास में सरकारी-निजी साझेदारी अहम
सूरजपुर जिले के विश्रामपुर क्षेत्र में स्थित यह पुरानी ओपन कास्ट कोल माइन (OCM) कभी खनन गतिविधियों का बड़ा केंद्र थी। वर्ष 1961 में शुरू हुई इस खदान ने 2020 में बंद होने से पहले लगभग 38 मिलियन टन कोयले का उत्पादन किया। खदान बंद होने के बाद यहां बना विशाल गड्ढा धीरे-धीरे पानी से भर गया, जो आज एक खूबसूरत जलाशय का रूप ले चुका है।
इस परियोजना की शुरुआत वर्ष 2018 में जिला प्रशासन और साउथ ईस्ट कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) की साझेदारी से हुई। पूर्व उपायुक्त केसी देवसेनापति के कार्यकाल में इस स्थान को पर्यावरण-पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने की योजना बनाई गई। इसके तहत खदान संख्या 6, जो 1985 के बाद से निष्क्रिय थी, को पुनर्वास कर पर्यटन स्थल में बदला गया।
विकास के पहले चरण में लगभग 20 मिलियन रुपये की लागत से यहां नौका विहार, फ्लोटिंग रेस्टोरेंट और मछली पालन के लिए पिंजरों की व्यवस्था की गई। बाद में वर्ष 2022 में राज्य सरकार और SECL की CSR पहल के तहत लगभग 40 मिलियन रुपये खर्च कर इस क्षेत्र में और सुविधाएं जोड़ी गईं। इनमें कॉटेज, बच्चों के लिए पार्क, रेस्टोरेंट और शॉपिंग मार्ट शामिल हैं।
इस परियोजना की सबसे खास बात यह है कि इससे स्थानीय महिलाओं को सीधे रोजगार मिला है। महिलाएं अब नाव चलाने, पर्यटकों को घुमाने और अन्य गतिविधियों में भाग लेकर अपनी आजीविका कमा रही हैं। एक नाव चालक महिला एक बार में करीब दस पर्यटकों को घुमाती है और दिनभर में कई चक्कर लगाकर अच्छी आय अर्जित करती है। इसके अलावा, यहां मछली पालन की व्यवस्था भी की गई है, जिससे स्थानीय लोगों को अतिरिक्त आय का स्रोत मिला है। जलाशय में बनाए गए पिंजरों में मछलियों का पालन किया जा रहा है, जो न केवल आर्थिक लाभ देता है, बल्कि पर्यटकों के लिए आकर्षण भी बढ़ाता है।
विश्रामपुर का यह मॉडल पर्यावरण संरक्षण और रोजगार सृजन का बेहतरीन उदाहरण बनकर उभरा है। जहां एक ओर खदान के पुनर्वास से पर्यावरण को नुकसान होने से बचाया गया, वहीं दूसरी ओर स्थानीय लोगों के लिए स्थायी रोजगार के अवसर भी तैयार किए गए। खनन नियमों के अनुसार, कंपनियों के लिए बंद खदानों का पुनर्वास करना अनिवार्य होता है। आमतौर पर इन स्थानों पर वृक्षारोपण, पार्क निर्माण या सिंचाई परियोजनाएं विकसित की जाती हैं। लेकिन विश्रामपुर का यह मॉडल इन सबसे अलग है, क्योंकि यहां पर्यटन और आजीविका को एक साथ जोड़ा गया है। भविष्य में इस क्षेत्र में और विकास की संभावनाएं भी दिखाई दे रही हैं। कुछ अन्य खदानों को सिंचाई परियोजनाओं और सौर ऊर्जा उत्पादन के लिए उपयोग में लाने की योजना है। इससे यह क्षेत्र ऊर्जा और पर्यावरण के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
कुल मिलाकर, विश्रामपुर का यह प्रयास यह साबित करता है कि सही योजना और साझेदारी से किसी भी परित्यक्त संसाधन को विकास और रोजगार का माध्यम बनाया जा सकता है। यह मॉडल देश के अन्य खनन क्षेत्रों के लिए भी एक प्रेरणा बन सकता है, जहां बंद पड़ी खदानों को इसी तरह से पुनर्जीवित कर स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है।