भदोही के कालीन उद्योग को ODOP की ताकत, पूंजी-बाजार और हुनर से बदल रही तस्वीर

Bhadohi carpet industry

उत्तर प्रदेश के भदोही की पहचान सिर्फ एक जिले के रूप में नहीं, बल्कि दुनिया के प्रमुख कालीन उत्पादन केंद्रों में होती है। हाथ से बुनी कालीनों की अपनी अलग पहचान है और यहां का कारोबार अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, जापान और मध्य-पूर्व समेत दुनिया के कई बाजारों तक पहुंचता है। अब इस पारंपरिक उद्योग को एक जिला, एक उत्पाद यानी ODOP योजना से नई आर्थिक ताकत मिल रही है। इस बदलाव की सबसे बड़ी खासियत यह है कि सरकारी मदद सिर्फ कर्ज तक सीमित नहीं है। पूंजी, प्रशिक्षण, टूलकिट और बाजार—चारों स्तर पर सहायता देने की कोशिश की जा रही है। भदोही में ODOP की वित्त पोषण योजना के तहत अब तक 347 लाभार्थियों को 1,228 लाख रुपये यानी करीब 12.28 करोड़ रुपये की सब्सिडी दी जा चुकी है। योजना के तहत बैंक के माध्यम से उद्यमियों को वित्त उपलब्ध कराया जाता है और पात्र मामलों में 25 प्रतिशत तक सब्सिडी का प्रावधान है। यानी जिस उद्योग में लंबे समय तक पैसा फंसा रहता है, वहां सरकारी सब्सिडी वाला वित्त छोटे और मध्यम उद्यमियों के लिए बड़ा सहारा बन सकता है।

कालीन उद्योग में पैसा क्यों इतना महत्वपूर्ण?

भदोही के कालीन उद्योग की सबसे बड़ी चुनौती इसकी लंबी प्रोडक्शन साइकिल है। एक सामान्य औद्योगिक उत्पाद कुछ दिनों में तैयार होकर बाजार में पहुंच सकता है, लेकिन हाथ से बनी कालीन को तैयार होने में कई महीने लग सकते हैं। कालीन निर्यातक पियूष बरनवाल के मुताबिक, उत्पादन प्रक्रिया करीब 21 चरणों से गुजरती है और एक कालीन को तैयार होने में चार महीने से लेकर एक साल तक का समय लग सकता है। इसका सीधा अर्थ है कि उद्यमी को उत्पादन शुरू करने से काफी पहले पूंजी लगानी पड़ती है, जबकि बिक्री से पैसा बाद में वापस आता है। ऐसे उद्योग में सस्ती और आसानी से उपलब्ध पूंजी कारोबार के लिए ऑक्सीजन की तरह काम करती है।

2,350 लोगों को ट्रेनिंग और टूलकिट

ODOP की दूसरी महत्वपूर्ण कड़ी कौशल विकास है। विभाग के मुताबिक भदोही में अब तक 2,350 लोगों को प्रशिक्षण देकर टूलकिट उपलब्ध कराई गई है। 10 दिन के प्रशिक्षण के दौरान प्रशिक्षुओं को प्रतिदिन 200 रुपये के हिसाब से कुल 2,000 रुपये का मानदेय भी दिया जाता है। इस पहल का महत्व इसलिए ज्यादा है क्योंकि कालीन उद्योग की ताकत मशीनों से ज्यादा कुशल हाथों में है। अगर नई पीढ़ी को बुनाई, डिजाइन और उत्पादन की तकनीक से जोड़ा जाता है तो पारंपरिक हुनर को रोजगार में बदला जा सकता है।

स्थानीय हुनर से ग्लोबल मार्केट तक

भदोही की कालीनें दुनिया के 88 से अधिक देशों में पहुंचती हैं। अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, जापान और मध्य-पूर्व इसके प्रमुख बाजारों में शामिल हैं।

भारत के कुल कालीन निर्यात में भदोही क्षेत्र की हिस्सेदारी महत्वपूर्ण है। यही वजह है कि अगर स्थानीय उद्यमियों की उत्पादन क्षमता बढ़ती है तो इसका असर सिर्फ भदोही तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उत्तर प्रदेश के निर्यात और ग्रामीण रोजगार पर भी पड़ता है।

मेलों से बाजार तक पहुंच

कालीन उद्योग के लिए उत्पादन जितना महत्वपूर्ण है, बाजार उतना ही जरूरी है। ODOP की विपणन सहायता योजना के तहत अब तक 546 बुनकरों और उद्यमियों को देश-विदेश की प्रदर्शनियों और मेलों में भाग लेने के लिए सहायता दी गई है।

विभाग के अनुसार इसके लिए करीब 6.50 करोड़ रुपये का रीइंबर्समेंट दिया जा चुका है।

यह कदम छोटे उद्यमियों के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बड़े अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक सीधे पहुंच बनाना उनके लिए महंगा होता है। प्रदर्शनी और ट्रेड फेयर में भागीदारी से उन्हें नए खरीदार, डिजाइन ट्रेंड और अंतरराष्ट्रीय बाजार की मांग समझने का अवसर मिलता है।

ODOP ने रोजगार का मॉडल बदला

भदोही में ODOP से जुड़े उद्यमियों के अनुभव बताते हैं कि योजना का असर सिर्फ एक कारोबारी को कर्ज देने तक सीमित नहीं है।

कालीन बुनाई सेंटर संचालक अक्षय उपाध्याय के मुताबिक, उन्होंने योजना के तहत 50 लाख रुपये का ऋण लेकर उत्पादन केंद्र स्थापित किया और इसके जरिए 100 से ज्यादा लोगों को रोजगार मिला। उनके अनुसार उत्पादन क्षमता करीब 2,000 गलीचों तक पहुंची है।

कालीन निर्यातक इम्तियाज अहमद बताते हैं कि छोटे बुनकर और ठेकेदार भी ODOP के जरिए ऋण लेकर कारखाने स्थापित कर रहे हैं।  योजना का प्रभाव एक उद्यमी से आगे बढ़कर स्थानीय रोजगार श्रृंखला तक पहुंच रहा है।

ODOP की असली ताकत क्या है?

भदोही की कहानी यह बताती है कि पारंपरिक उद्योग को बचाने के लिए सिर्फ विरासत की बात करना पर्याप्त नहीं है। उसे आधुनिक बाजार, पूंजी और तकनीक से जोड़ना भी जरूरी है।

ODOP का मॉडल इसी जगह महत्वपूर्ण हो जाता है।

पहली ताकत—पहचान।
जिले के पहले से प्रसिद्ध उत्पाद को सरकारी ब्रांडिंग और बाजार से जोड़ना आसान होता है।

दूसरी ताकत—वित्त।
लंबी उत्पादन अवधि वाले कालीन उद्योग को सस्ती पूंजी मिलने से छोटे उद्यमियों का विस्तार संभव होता है।

तीसरी ताकत—हुनर।
प्रशिक्षण और टूलकिट नई पीढ़ी को पारंपरिक काम से जोड़ने का माध्यम बन सकते हैं।

चौथी ताकत—बाजार।
मेलों और प्रदर्शनियों में सहायता छोटे उत्पादकों को स्थानीय बाजार से अंतरराष्ट्रीय खरीदारों तक पहुंचने का अवसर देती है।

अगली चुनौती और बड़ी है

भदोही के कालीन उद्योग को अब सिर्फ उत्पादन बढ़ाने की नहीं, बल्कि डिजाइन, ब्रांडिंग, ई-कॉमर्स, प्रमाणन और वैश्विक प्रतिस्पर्धा की चुनौती का सामना करना है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में मशीन से बनी सस्ती कालीनों से मुकाबला आसान नहीं है। भदोही की ताकत हाथ से बनी कालीन है, इसलिए इसे सिर्फ कीमत के आधार पर नहीं बल्कि क्वालिटी, डिजाइन, कारीगरी और ‘मेड इन भदोही’ की ब्रांड वैल्यू के आधार पर बाजार में स्थापित करना होगा। साथ ही कारीगरों की आय और सामाजिक सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। अगर वैश्विक बाजार से मिलने वाला फायदा उत्पादन की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी यानी बुनकर तक नहीं पहुंचता, तो उद्योग की स्थिरता प्रभावित हो सकती है। भदोही में ODOP योजना ने कालीन उद्योग को कर्ज, कौशल और बाजार—तीनों स्तरों पर सहारा दिया है। 347 लाभार्थियों को वित्तीय सहायता, 2,350 लोगों को प्रशिक्षण-टूलकिट और 546 बुनकरों-उद्यमियों को विपणन सहायता इस मॉडल के व्यापक असर को दिखाती है। अब अगला लक्ष्य होना चाहिए—भदोही के कालीन को सिर्फ दुनिया के बाजार तक पहुंचाना नहीं, बल्कि दुनिया के प्रीमियम बाजार में उसकी कीमत और पहचान दोनों बढ़ाना। यही ODOP की असली सफलता होगी—जब भदोही का पारंपरिक हुनर स्थानीय रोजगार से निकलकर वैश्विक ब्रांड और मजबूत ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बदल जाएगा।

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