भारतीय समाज में परिवार की पारंपरिक परिभाषा तेजी से बदल रही है। पहले जहां शादी के बाद ही माता-पिता बनने को सामान्य माना जाता था, वहीं अब विज्ञान और आधुनिक चिकित्सा तकनीकों की मदद से कई लोग बिना विवाह किए भी माता-पिता बनने का फैसला कर रहे हैं। बॉलीवुड में भी ऐसे कई चर्चित चेहरे हैं जिन्होंने सरोगेसी या अन्य सहायक प्रजनन तकनीकों के जरिए सिंगल पैरेंट बनने का रास्ता चुना है। हालांकि इस बदलते सामाजिक परिदृश्य के साथ बच्चों की परवरिश, भावनात्मक विकास और जिम्मेदारियों को लेकर नई बहस भी शुरू हो गई है।
- तुषार ने साझा किया पालन-पोषण का अनुभव
- ‘बैचलर डैड’ में लिखी सिंगल पैरेंटिंग की कहानी
- करण-एकता भी हैं सिंगल पैरेंट
- बच्चों को भावनात्मक सहारे की जरूरत
- बदलती सोच के साथ बढ़ी नई चुनौतियां
इसी बीच अभिनेता तुषार कपूर ने लगभग एक दशक के अपने सिंगल पैरेंटिंग अनुभव साझा करते हुए कहा है कि आज के दौर में बच्चों की परवरिश पहले की तुलना में कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण हो गई है। उन्होंने अपने अनुभवों को अपनी पुस्तक ‘बैचलर डैड’ में भी दर्ज किया है और भविष्य में इस विषय पर एक और किताब लिखने की इच्छा जताई है।
तुषार कपूर वर्ष 2016 में सरोगेसी के माध्यम से बेटे लक्ष्य के पिता बने थे। उन्होंने पहले भी स्पष्ट किया था कि वह शादी नहीं करना चाहते थे, लेकिन पिता बनने की इच्छा रखते थे। इसी वजह से उन्होंने सरोगेसी का विकल्प चुना। आज लगभग दस वर्षों से वह अपने बेटे की परवरिश अकेले कर रहे हैं।
हाल ही में दिए एक इंटरव्यू में तुषार कपूर ने कहा कि नई पीढ़ी, जिसे जेनरेशन अल्फा कहा जाता है, उसकी परवरिश पहले से अधिक कठिन है। उनके अनुसार आज के बच्चों को केवल अच्छी शिक्षा या सुविधाओं की जरूरत नहीं होती, बल्कि उन्हें माता-पिता से लगातार भावनात्मक जुड़ाव, संवाद और समय भी चाहिए। उन्होंने माना कि सिंगल पैरेंट होने के कारण यह जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।
तुषार ने अपने अमेरिका प्रवास का जिक्र करते हुए बताया कि वहां रहने के दौरान उन्होंने स्वतंत्र जीवन और बच्चों की परवरिश के अलग तरीके को करीब से देखा। उनका कहना है कि बचपन में उन्हें फैसले लेने की उतनी आजादी नहीं मिली, जितनी वे आज अपने बेटे को देना चाहते हैं। उनका मानना है कि बच्चों की अपनी पसंद, सोच और निजी पहचान का सम्मान करना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि सकारात्मक माहौल और खुला संवाद ही अच्छी परवरिश की सबसे बड़ी कुंजी है।
बॉलीवुड में तुषार कपूर अकेले ऐसे सितारे नहीं हैं जिन्होंने बिना शादी के माता-पिता बनने का फैसला किया हो। फिल्म निर्माता और निर्देशक करण जौहर भी वर्ष 2017 में सरोगेसी के जरिए जुड़वां बच्चों यश और रूही के पिता बने। करण अपने दोनों बच्चों की देखभाल अपनी मां हीरू जौहर के सहयोग से करते हैं और अक्सर सोशल मीडिया पर उनके साथ बिताए खास पल साझा करते रहते हैं।
इसी तरह निर्माता एकता कपूर भी वर्ष 2019 में सरोगेसी के माध्यम से बेटे रवि कपूर की मां बनीं। उन्होंने अपने बेटे का नाम अपने पिता और वरिष्ठ अभिनेता जीतेंद्र के वास्तविक नाम ‘रवि कपूर’ पर रखा। एकता भी अपने बेटे की परवरिश सिंगल मदर के रूप में कर रही हैं।
इन उदाहरणों से यह साफ है कि समाज में परिवार की संरचना बदल रही है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि सिंगल पैरेंटिंग केवल आर्थिक रूप से सक्षम होने का विषय नहीं है, बल्कि इसमें मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक जिम्मेदारियां भी समान रूप से महत्वपूर्ण होती हैं।
बाल मनोविज्ञान से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी बच्चे के स्वस्थ विकास के लिए सबसे जरूरी तत्व है—उसे सुरक्षित, प्यार भरा और स्थिर वातावरण मिलना। यह वातावरण संयुक्त परिवार, एकल परिवार या सिंगल पैरेंट—किसी भी व्यवस्था में संभव है, यदि बच्चे को पर्याप्त समय, संवाद, देखभाल और भावनात्मक सहयोग मिले। वहीं यदि माता-पिता व्यस्तता के कारण बच्चों के साथ पर्याप्त समय नहीं बिता पाते, तो बच्चे अकेलापन महसूस कर सकते हैं और डिजिटल दुनिया पर अधिक निर्भर हो सकते हैं। इसलिए गुणवत्तापूर्ण समय देना किसी भी परिवार के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में काम और परिवार के बीच संतुलन बनाना हर माता-पिता के लिए चुनौती है। सिंगल पैरेंट्स के सामने यह चुनौती और अधिक बढ़ जाती है, क्योंकि उन्हें आर्थिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य, भावनात्मक जरूरतों और दैनिक देखभाल का पूरा दायित्व अकेले निभाना पड़ता है।
तुषार कपूर की कहानी इस बात का उदाहरण है कि सिंगल पैरेंटिंग आसान नहीं है, लेकिन समर्पण, धैर्य और सकारात्मक सोच के साथ इसे निभाया जा सकता है। वहीं करण जौहर और एकता कपूर जैसे उदाहरण यह भी दिखाते हैं कि बदलते समय में परिवार की परिभाषा बदल रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी बच्चे का भविष्य इस बात से तय नहीं होता कि उसके माता-पिता विवाहित हैं या अविवाहित, बल्कि इस बात से तय होता है कि उसे कितना प्यार, सुरक्षा, मार्गदर्शन और भावनात्मक सहयोग मिलता है। ऐसे में बदलते सामाजिक ढांचे के बीच बच्चों के सर्वांगीण विकास को प्राथमिकता देना ही सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।





