सोच से मशीन तक: BCI बदल रही है इंसान और तकनीक का रिश्ता

क्या आपने कभी सोचा है कि बिना हाथ लगाए, सिर्फ अपने दिमाग से कंप्यूटर चलाया जा
सकता है? या केवल सोचकर किसी रोबोटिक हाथ को हरकत में लाया जा सकता है? कुछ साल
पहले तक यह सब साइंस फिक्शन फिल्मों की कहानी जैसा लगता था। लेकिन आज यह
हकीकत बन चुका है। इसके पीछे है एक बेहद दिलचस्प तकनीक, जिसे ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस
यानी BCI कहा जाता है।

आसान भाषा में समझें तो BCI ऐसी तकनीक है, जो इंसान के दिमाग और किसी मशीन के
बीच सीधा संपर्क स्थापित करती है। हमारा दिमाग लगातार इलेक्ट्रिकल सिग्नल पैदा करता
रहता है। BCI इन्हीं सिग्नल को पढ़कर कंप्यूटर की भाषा में बदलती है और फिर मशीन उसी
के मुताबिक काम करती है। यानी इंसान सोचता है और मशीन उस सोच को समझकर
प्रतिक्रिया देने की कोशिश करती है।

लेकिन यह प्रक्रिया आखिर काम कैसे करती है? दरअसल, हमारे दिमाग में अरबों न्यूरॉन यानी
तंत्रिका कोशिकाएं होती हैं। यही कोशिकाएं हमारी सोच, याददाश्त, भावनाओं और शरीर की
गतिविधियों को नियंत्रित करती हैं। करीब सवा किलो वज़न वाला हमारा दिमाग इतना जटिल
है कि वैज्ञानिक इसे "थ्री-पाउंड यूनिवर्स" यानी "तीन पाउंड का ब्रह्मांड" भी कहते हैं। अब BCI
तकनीक इसी रहस्यमयी दुनिया को समझने और उससे संपर्क बनाने का एक नया रास्ता खोल
रही है।

इसी तकनीक को करीब से देखने और समझने के लिए मैं चीन के थ्येनचिन शहर में मौजूद
थ्येनचिन यूनिवर्सिटी पहुंचा। यहां की हाईहे लेबोरेटरी ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस पर शोध के क्षेत्र में
एक महत्वपूर्ण केंद्र मानी जाती है। इस लैब के नाम तीन विश्व रिकॉर्ड दर्ज हैं। पिछले 20 वर्षों
में थ्येनचिन इस क्षेत्र में दुनिया के प्रमुख शोध केंद्रों में भी अपनी जगह बना चुका है।
लैब के अंदर कदम रखते ही महसूस हुआ कि यहां भविष्य की तकनीक पर काम हो रहा है।
अलग-अलग शोध टीमें ऐसे सिस्टम विकसित कर रही हैं, जिनकी मदद से इंसान केवल अपने
विचारों के जरिए मशीनों को नियंत्रित कर सके। इसी दिशा में वैज्ञानिकों ने "लिंगशी फिंगर"

नाम की एक उन्नत रोबोटिक उंगली भी विकसित की है। भविष्य में यह तकनीक कई मरीजों
के लिए नई उम्मीद बन सकती है। इसके बाद बारी थी इस तकनीक को खुद आजमाने की। सबसे पहले मेरे सिर पर एक खास कैप
पहनाई गई, जो मेरे ब्रेन वेव्स यानी मस्तिष्क की तरंगों को रिकॉर्ड कर रही थी। कुछ ही सेकंड
में मेरे दिमाग की गतिविधियां कंप्यूटर स्क्रीन पर दिखाई देने लगीं। इसके बाद मेरे हाथ में
एक रोबोटिक उंगली लगाई गई। सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि उसे चलाने के लिए
मुझे किसी बटन को दबाने की जरूरत नहीं थी। मैंने सिर्फ अपनी उंगली को हिलाने की कल्पना
की और कंप्यूटर ने मेरे ब्रेन सिग्नल को समझकर रोबोटिक उंगली को उसी तरह हिलाना शुरू
कर दिया।

इसके बाद मैंने एक और दिलचस्प प्रयोग किया। इस बार मैंने सिर्फ अपने विचारों की मदद से
कंप्यूटर पर टाइपिंग की। न कोई कीबोर्ड था और न ही कोई कंट्रोलर। सिर पर लगा हल्का
हेडबैंड लगातार मेरे ब्रेन वेव्स को रिकॉर्ड कर रहा था। जैसे-जैसे मैं सोच रहा था, वैसे-वैसे स्क्रीन
पर टाइपिंग होती जा रही थी।

इस अनुभव से यह समझना आसान हो जाता है कि BCI तकनीक कितनी तेजी से आगे बढ़
रही है। कुछ ही सेकंड में यह किसी व्यक्ति की एकाग्रता, थकान, तनाव और भावनात्मक
स्थिति का आकलन कर सकती है। इतना ही नहीं, जरूरत के मुताबिक यह सुधार के सुझाव भी
दे सकती है। हालांकि, इस तकनीक की असली संभावनाएं इससे कहीं आगे हैं।

फिलहाल BCI का सबसे महत्वपूर्ण इस्तेमाल स्वास्थ्य क्षेत्र में हो रहा है। उदाहरण के लिए,
थ्येनचिन के हुआनहू अस्पताल में डॉक्टर इस तकनीक की मदद से मरीजों के दिमाग के अंदर
के दबाव यानी इंट्राक्रेनियल प्रेशर की लगातार निगरानी कर रहे हैं। पहले इसके लिए खोपड़ी की
सर्जरी करनी पड़ती थी, जिससे संक्रमण का खतरा भी रहता था। अब नई तकनीक बिना बड़े
ऑपरेशन के लगातार जरूरी जानकारी उपलब्ध कराने में मदद कर रही है।

इतना ही नहीं, विशेषज्ञों के मुताबिक जब दिमाग में किसी तरह की बीमारी होती है, तो न्यूरॉन
से निकलने वाले इलेक्ट्रिकल सिग्नल में बदलाव आने लगता है। BCI इन बदलावों का

विश्लेषण करके डॉक्टरों को बीमारी का जल्दी और ज्यादा सटीक पता लगाने में मदद कर
सकती है। BCI का इस्तेमाल सिर्फ बीमारी की पहचान तक सीमित नहीं है। स्ट्रोक और दूसरी
न्यूरोलॉजिकल बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के पुनर्वास में भी यह तकनीक काफी मददगार
साबित हो रही है। अस्पताल के डॉक्टरों के मुताबिक, अब तक 200 से ज्यादा मरीजों पर
इसका सफल इस्तेमाल किया जा चुका है और कई मरीजों के हाथ-पैर की गतिविधियों में
अच्छा सुधार देखने को मिला है।

आगे देखें तो विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे-जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई तेजी
से आगे बढ़ेगा, वैसे-वैसे ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस भी हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन सकता
है। शुरुआत भले ही स्वास्थ्य क्षेत्र से हुई हो, लेकिन आने वाले समय में इसका इस्तेमाल शिक्षा,
उद्योग, स्मार्ट डिवाइस और रोजमर्रा की जिंदगी में भी बढ़ सकता है।

यानी जो तकनीक कभी फिल्मों और कल्पनाओं तक सीमित थी, वह अब शोध प्रयोगशालाओं
से निकलकर अस्पतालों तक पहुंच चुकी है। आने वाले वर्षों में संभव है कि इंसान और मशीन
के बीच संवाद का तरीका ही बदल जाए। शायद वह समय भी आए, जब मशीन को निर्देश देने
के लिए न शब्दों की जरूरत हो, न हाथों के स्पर्श की। सिर्फ आपके विचार ही मशीन के लिए
निर्देश बन जाएं।

(अखिल पाराशर, CGTN हिन्दी संवाददाता, बीजिंग)

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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