तांबे के बर्तन में रातभर रखा पानी पीने की परंपरा आयुर्वेद में लंबे समय से प्रचलित है। इसे ‘ताम्रजल’ कहा जाता है और माना जाता है कि कम से कम 8 घंटे तक तांबे के पात्र में रखा पानी पाचन क्रिया को बेहतर बनाने, शरीर की स्वच्छता बनाए रखने और सामान्य स्वास्थ्य को समर्थन देने में सहायक हो सकता है। कुछ शोधों में यह भी पाया गया है कि तांबे में प्राकृतिक रोगाणुरोधी (Antimicrobial) गुण होते हैं, जो पानी में मौजूद कुछ हानिकारक बैक्टीरिया की संख्या कम करने में मदद कर सकते हैं।
- तांबे के पानी पर आयुर्वेद की राय
- क्या सचमुच मिलते हैं इतने स्वास्थ्य लाभ?
- कॉपर की अधिकता भी बन सकती है खतरा
- 8 घंटे रखा पानी पीने की परंपरा
- फायदे के साथ सावधानी भी है जरूरी
हालांकि, सोशल मीडिया और कई दावों में तांबे के पानी को थायराइड, गठिया, कैंसर, एनीमिया और हृदय रोग जैसी गंभीर बीमारियों का इलाज बताया जाता है, लेकिन इन दावों के समर्थन में पर्याप्त और ठोस वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए इसे किसी भी बीमारी के उपचार का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।
विशेषज्ञों के अनुसार, सीमित मात्रा में तांबे के बर्तन का पानी पीना सामान्यतः सुरक्षित हो सकता है, लेकिन अत्यधिक कॉपर शरीर के लिए हानिकारक भी हो सकता है। इसलिए केवल साफ पानी का उपयोग करें, बर्तन की नियमित सफाई करें और लंबे समय तक अत्यधिक मात्रा में तांबे का पानी पीने से बचें। किसी गंभीर बीमारी या लंबे समय तक स्वास्थ्य संबंधी समस्या होने पर चिकित्सक की सलाह लेना सबसे सुरक्षित विकल्प है।