पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस से शुरू हुई बगावत अब उसके बाद बने नए राजनीतिक समूह में भी दरार की तरफ बढ़ती दिखाई दे रही है। सायोनी घोष समेत टीएमसी के 20 बागी सांसदों ने कुछ महीने पहले नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया यानी NCPI का दामन थामा था और एनडीए को समर्थन देने का ऐलान किया था। अब इसी गुट के भीतर भी अलग-अलग राजनीतिक रास्ते नजर आने लगे हैं। कूचबिहार से सांसद जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया ने दावा किया है कि 20 में से 17 सांसद अक्टूबर में दुर्गा पूजा से पहले या उसके बाद बीजेपी में शामिल हो सकते हैं। अगर यह दावा सही साबित होता है, तो बंगाल की सियासत में इसका सीधा असर टीएमसी के साथ-साथ आगामी चुनावी समीकरणों पर भी पड़ सकता है।
17 सांसदों के बीजेपी में जाने का दावा
तीन मुस्लिम सांसद, बाहर से NDA को समर्थन
दल-बदल कानून से बचने की रणनीति पर भी नजर
1. टीएमसी से बगावत, अब NCPI में भी दरार
14 जून को टीएमसी के 20 असंतुष्ट सांसदों ने पार्टी से अलग होकर NCPI के साथ विलय की घोषणा की थी। इसके साथ ही उन्होंने एनडीए को समर्थन देने का फैसला किया था। उस समय इसे ममता बनर्जी के खिलाफ सांसदों की बड़ी राजनीतिक बगावत के तौर पर देखा गया था। लेकिन अब वही 20 सांसद एकजुट नहीं दिखाई दे रहे हैं। बसुनिया के मुताबिक, 17 सांसद सामूहिक रूप से बीजेपी का दामन थामने की तैयारी में हैं, जबकि तीन सांसद बीजेपी में औपचारिक रूप से शामिल नहीं होंगे। यानी जिस गुट को टीएमसी के खिलाफ एकजुट मोर्चे के रूप में देखा जा रहा था, उसमें भी राजनीतिक हित और स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर अलग-अलग रास्ते बनते नजर आ रहे हैं।
2. 17 सांसदों का दावा क्यों है महत्वपूर्ण?
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण संख्या है—17। बसुनिया का दावा है कि 20 सांसदों में से दो-तिहाई से ज्यादा सांसद एक साथ बीजेपी में जाते हैं तो उन पर दल-बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता का खतरा नहीं रहेगा। 20 का दो-तिहाई आंकड़ा लगभग 14 सांसद बैठता है। ऐसे में 17 सांसदों का साथ जाना राजनीतिक और कानूनी रणनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यही वजह है कि अब सवाल सिर्फ बीजेपी में शामिल होने का नहीं, बल्कि सांसदों के सामूहिक रूप से पाला बदलने और उनकी सदस्यता बचाने की रणनीति का भी है।
3. तीन सांसदों ने क्यों बनाई दूरी?
बसुनिया के मुताबिक, अबू ताहेर खान, खलीलुर रहमान और यूसुफ पठान बीजेपी में औपचारिक रूप से शामिल नहीं होंगे। दावा है कि इन तीनों सांसदों ने अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों की राजनीतिक और प्रशासनिक परिस्थितियों को देखते हुए यह फैसला लिया है। हालांकि, वे बाहर से एनडीए का समर्थन जारी रख सकते हैं। यही हिस्सा इस पूरे घटनाक्रम को और दिलचस्प बनाता है। क्योंकि एक तरफ 17 सांसद सीधे बीजेपी के साथ जाने की तैयारी में हैं, वहीं तीन सांसद बाहर से समर्थन देकर अपनी अलग राजनीतिक स्थिति बनाए रखने की कोशिश कर सकते हैं।
4. सायोनी घोष की भूमिका पर भी निगाहें
सायोनी घोष इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम का चर्चित चेहरा हैं। टीएमसी से बगावत कर NCPI के साथ जाने वाले 20 सांसदों में उनका नाम भी शामिल था। अब सवाल यह है कि क्या सायोनी घोष भी उन 17 सांसदों के साथ बीजेपी का दामन थामेंगी? अगर ऐसा होता है तो टीएमसी से उनकी दूरी का अगला राजनीतिक पड़ाव स्पष्ट हो जाएगा। वहीं अगर वह अलग रुख अपनाती हैं, तो 20 सांसदों के समूह के भीतर राजनीतिक समीकरण और जटिल हो सकते हैं। फिलहाल बसुनिया का दावा सामने आया है, इसलिए 17 सांसदों के बीजेपी में जाने को अंतिम फैसला मानना जल्दबाजी होगी।
5. बंगाल में बीजेपी को कितना फायदा?
अगर 17 सांसद बीजेपी में शामिल होते हैं तो यह सिर्फ संख्या बढ़ने का मामला नहीं होगा। इससे बीजेपी को टीएमसी के खिलाफ यह राजनीतिक संदेश देने का मौका मिलेगा कि ममता बनर्जी की पार्टी के भीतर असंतोष अभी भी जारी है। दूसरी तरफ टीएमसी के लिए यह चुनौती होगी कि वह अपने सांसदों और संगठन के बीच एकजुटता बनाए रखे। लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सांसदों का पाला बदलना जमीन पर वोटों के बदलाव में भी तब्दील होगा? क्योंकि बंगाल की राजनीति में केवल सांसदों का दल बदलना पर्याप्त नहीं है। स्थानीय संगठन, बूथ स्तर की पकड़ और क्षेत्रीय समीकरण चुनावी परिणाम तय करने में ज्यादा महत्वपूर्ण होंगे।
20 की बगावत अब 17 बनाम 3 की कहानी
टीएमसी से अलग हुए 20 सांसदों का गुट अब खुद दो हिस्सों में बंटता नजर आ रहा है। 17 सांसदों के बीजेपी में जाने का दावा और तीन सांसदों के बाहर से एनडीए समर्थन की बात बंगाल की राजनीति में नए समीकरणों का संकेत दे रही है। सबसे बड़ा सवाल अब यह है कि क्या यह दावा वास्तव में अक्टूबर में राजनीतिक घटनाक्रम में बदलता है? अगर 17 सांसद एक साथ बीजेपी में शामिल होते हैं, तो यह ममता बनर्जी के लिए बड़ा राजनीतिक झटका और बीजेपी के लिए बड़ा मनोवैज्ञानिक संदेश होगा। लेकिन तीन सांसदों का अलग रहना यह भी बताता है कि **बंगाल की राजनीति में दिल्ली का समीकरण और जमीन की