बढ़ती गर्मी का कहर अब सिर्फ वयस्कों की सेहत तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसका सीधा और खतरनाक असर गर्भ में पल रहे मासूमों पर भी पड़ रहा है। ‘जर्नल साइंस एडवांसेज’ में प्रकाशित एक हालिया शोध के अनुसार, गर्भावस्था के दौरान अत्यधिक गर्म और उमस भरा मौसम होने वाले बच्चे के शारीरिक विकास को गंभीर रूप से बाधित कर सकता है।
मुख्य बातें
- जर्नल साइंस एडवांसेज (Science Advances) की स्टडी में हुआ चौंकाने वाला खुलासा।
- गर्भावस्था के दौरान अत्यधिक गर्मी और उमस से बच्चों में स्टंटिंग (ठिगनेपन) का खतरा।
- दक्षिण एशिया में साल 2050 तक 30 से 37 लाख अधिक बच्चे हो सकते हैं प्रभावित।
- प्रेग्नेंसी के आखिरी 3 महीनों (थर्ड ट्राइमेस्टर) में रहता है सबसे ज्यादा जोखिम।
जलवायु परिवर्तन की नई मार
सिर्फ सूरज की तपिश नहीं
हवा की ‘उमस’ भी बन रही है अजन्मे बच्चों की दुश्मन
प्रेग्नेंसी पर मौसम की मार: क्या कहती है नई स्टडी?
यह रिसर्च दक्षिण एशिया के लगभग दो लाख बच्चों के डेटा पर आधारित है, जिनमें से अधिकांश बच्चे भारत के हैं। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यदि जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले सालों में स्थिति बेहद गंभीर हो सकती है।
क्या है ‘स्टंटिंग’ और यह कितनी खतरनाक है?
दिल्ली AIIMS के पीडियाट्रिक विभाग के डॉ. हिमांशु भदानी के अनुसार:
विशेषज्ञों की माने तो किसी बच्चे का जब शारीरिक विकास उसकी उम्र के अनुपात में ठीक तरीके से नहीं होता है तो इस स्थिति को मेडिकल की भाषा में स्टंटिंग या बोलचाल की भाषा में ठिगनापन कहते हैं। यह समस्या महज बच्चे की कम लंबाई तक सीमित नहींनहीं .इससे बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) कमजोर हो जाती है और उसकी सीखने व समझने की मानसिक क्षमता भी सामान्य बच्चों से काफी कम रह जाती है।”
शुष्क गर्मी बनाम उमस: कौन है ज्यादा खतरनाक?
इस शोध में सूखी (शुष्क) गर्मी और उमस भरी गर्मी के बीच एक बेहद चौंकाने वाला अंतर सामने आया है:
| मौसम का प्रकार | बच्चों की लंबाई पर असर (औसतन कमी) |
| सिर्फ सूखा तापमान (बिना उमस) | 1.3% |
| उमस भरी गर्मी (Humidity + Heat) | 5.1% |
सिर्फ तापमान का बढ़ना उतना घातक नहीं है, जितना तापमान के साथ हवा में मौजूद नमी (उमस) का होना। उमस की वजह से बच्चे की ग्रोथ रुकने का खतरा लगभग चार गुना बढ़ जाता है।
गर्भ में बच्चे तक कैसे पहुंचता है नुकसान?
जब एक गर्भवती महिला लंबे समय तक उमस और भीषण गर्मी के संपर्क में रहती है, तो उसका शरीर थर्मल स्ट्रेस (Thermal Stress) से जूझने लगता है।
- शारीरिक दबाव: शरीर का तापमान नियंत्रित करने के लिए महिला के अंगों को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है, जिससे डिहाइड्रेशन और हीट स्ट्रोक का खतरा बढ़ता है।
- प्लेसेंटा पर असर: इस अतिरिक्त दबाव के कारण गर्भनाल (Placenta) में रक्त का प्रवाह (Blood Circulation) कम हो जाता है।
- पोषण की कमी: रक्त प्रवाह कम होने से गर्भस्थ शिशु तक पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन और जरूरी पोषक तत्व नहीं पहुंच पाते, जिससे उसकी ग्रोथ गर्भ के अंदर ही प्रभावित होने लगती है।
अंतिम तिमाही (Last Trimester): सबसे नाजुक समय
अध्ययन के मुताबिक, गर्भावस्था के 28वें हफ्ते से लेकर 40वें हफ्ते तक (आखिरी तीन महीने) का समय सबसे ज्यादा संवेदनशील होता है। यही वह समय होता है जब गर्भ में बच्चे का विकास सबसे तेजी से होता है और उसे सबसे ज्यादा पोषण की आवश्यकता होती है। यदि इसी दौरान मां को अत्यधिक उमस का सामना करना पड़े, तो स्टंटिंग का खतरा सबसे ज्यादा बढ़ जाता है।
भारत के इन राज्यों पर मंडरा रहा है सबसे बड़ा संकट
भारत में भौगोलिक विविधताओं के कारण गर्मी का मिजाज अलग-अलग है। जहां राजस्थान और पश्चिमी भारत में सूखी गर्मी पड़ती है, वहीं कुछ राज्यों में उमस का स्तर बहुत ज्यादा होता है। इस स्टडी के अनुसार, निम्नलिखित राज्यों की गर्भवती महिलाओं को सबसे ज्यादा खतरा है:
- बिहार
- पश्चिम बंगाल
- पूर्वी उत्तर प्रदेश
इन क्षेत्रों में रहने वाली महिलाओं को गर्भावस्था के अंतिम महीनों में विशेष सावधानी बरतने और खुद को ठंडे व सुरक्षित माहौल में रखने की सख्त जरूरत है। यह रिसर्च साफ करती है कि जलवायु परिवर्तन अब हमारे भविष्य (अजन्मे बच्चों) की नींव को भी कमजोर कर रहा है।




