बंगाल चुनाव से पहले ‘नारी शक्ति’ का दांव? महिला आरक्षण बिल पर सरकार का बड़ा संकेत

Women Reservation Bill

बंगाल चुनाव से पहले ‘नारी शक्ति’ का दांव? महिला आरक्षण बिल पर सरकार का बड़ा संकेत

2029 से लागू करने की तैयारी, लेकिन टाइमिंग पर सियासी घमासान तेज

नई दिल्ली। क्या महिला आरक्षण बिल एक बार फिर चुनावी राजनीति के केंद्र में आने वाला है? संसद के गलियारों में उठी हलचल ने इस सवाल को और तेज कर दिया है। सरकार की ओर से संकेत मिला है कि महिला आरक्षण बिल को लेकर विशेष सत्र बुलाया जा सकता है, और यही टाइमिंग अब सियासी विवाद की वजह बन गई है।

दरअसल, संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजीजू ने राज्यसभा में साफ किया कि मौजूदा सत्र के बाद सदन को कुछ समय के लिए स्थगित कर, एक “निश्चित उद्देश्य” के साथ दो-तीन हफ्तों में फिर बुलाया जा सकता है। माना जा रहा है कि यह उद्देश्य महिला आरक्षण बिल ही है। सरकार पहले ही यह संकेत दे चुकी है कि 33% आरक्षण को 2029 से लागू करने की उसकी मंशा है।

लेकिन जैसे ही यह इशारा मिला, विपक्ष हमलावर हो गया। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि सरकार चुनावी माहौल में इसका श्रेय लेना चाहती है। नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कड़े तेवर दिखाते हुए कहा कि संसद को “दबंगई” से नहीं चलाया जा सकता। वहीं कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने मांग की कि पहले सर्वदलीय बैठक बुलाई जाए और चुनाव के दौरान इस तरह का कदम आचार संहिता के खिलाफ होगा।

सरकार ने भी पलटवार में कोई कसर नहीं छोड़ी। नेता सदन जेपी नड्डा ने दो टूक कहा कि सदन कब बुलाना है, यह सरकार तय करेगी। उन्होंने विपक्ष पर तंज कसते हुए याद दिलाया कि जिस महिला आरक्षण बिल को दशकों तक पास नहीं कराया जा सका, उसे नरेंद्र मोदी सरकार ने रिकॉर्ड समय में आगे बढ़ाया।

टाइमिंग ही असली ‘ट्विस्ट’
राजनीतिक जानकारों की मानें तो असली लड़ाई बिल पर नहीं, बल्कि उसकी टाइमिंग पर है। पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों में चुनावी सरगर्मी के बीच अगर यह बिल चर्चा में आता है, तो ‘नारी शक्ति’ का मुद्दा सीधे चुनावी नैरेटिव को प्रभावित कर सकता है।

आगे का क्या है संकेत?
सरकार का कहना है कि महिला आरक्षण लागू करने की प्रतिबद्धता अटल है और यह राजनीति का विषय नहीं होना चाहिए। लेकिन विपक्ष इसे चुनावी रणनीति का हिस्सा मान रहा है। महिला आरक्षण बिल एक बार फिर संसद से निकलकर सियासी अखाड़े में आ गया है। अब नजर इस बात पर है कि क्या विशेष सत्र बुलाया जाता है और क्या यह कदम चुनावी समीकरणों को नया मोड़ देता है। फिलहाल इतना तय है—‘नारी शक्ति’ का मुद्दा आने वाले दिनों में राजनीति का सबसे बड़ा केंद्र बनने वाला है।

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