UP cabinet portfolio allocation:योगी सरकार में किसका कद बढ़ा, किसकी ताकत घटी और क्या संकेत दे गए मुख्यमंत्री?

UP cabinet portfolio allocation

उत्तर प्रदेश की राजनीति में मंत्रिमंडल विस्तार के बाद अब विभागों के बंटवारे ने नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है। मुख्यमंत्री Yogi Adityanath ने आखिरकार नए मंत्रियों के बीच विभागों का वितरण कर दिया, लेकिन इस फैसले के बाद सत्ता गलियारों से लेकर राजनीतिक विश्लेषकों तक एक ही सवाल गूंज रहा है — आखिर किसे क्या मिला और क्यों?

योगी सरकार में किसका कद बढ़ा किसकी ताकत घटी क्या संकेत दे गए मुख्यमंत्री?

10 मई को हुए मंत्रिमंडल विस्तार के बाद करीब एक सप्ताह तक विभागों का इंतजार चलता रहा। इस दौरान कई तरह की अटकलें लगाई जा रही थीं। माना जा रहा था कि कुछ नेताओं को बेहद प्रभावशाली विभाग मिलेंगे, लेकिन जब विभागों की सूची सामने आई तो कई चेहरे खुश नजर आए, जबकि कुछ नेताओं को उम्मीद से कम मिला।इस पूरे विभाग बंटवारे ने एक बात साफ कर दी कि सरकार में अंतिम फैसला अभी भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का ही चलता है और राजनीतिक दबावों के बावजूद वही अंतिम रणनीति तय करते हैं।

भूपेंद्र चौधरी को क्या मिला और क्या छूट गया?

सबसे ज्यादा चर्चा भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष Bhupendra Singh Chaudhary को लेकर रही। राजनीतिक गलियारों में चर्चा थी कि उन्हें गृह विभाग के बाद सबसे ताकतवर माने जाने वाले लोक निर्माण विभाग यानी पीडब्ल्यूडी की जिम्मेदारी मिल सकती है। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। भूपेंद्र चौधरी को सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम यानी MSME विभाग दिया गया। पहली नजर में इसे अपेक्षा से छोटा विभाग माना गया, लेकिन राजनीतिक जानकार इसे कमतर मानने से इनकार कर रहे हैं।

दरअसल MSME विभाग सीधे रोजगार, उद्योग और स्वरोजगार योजनाओं से जुड़ा हुआ है। मुख्यमंत्री रोजगार योजना, प्रधानमंत्री रोजगार योजना, यूपी स्मॉल इंडस्ट्री कॉरपोरेशन और मुख्यमंत्री युवा उद्यमी योजना जैसी अहम योजनाएं इसी विभाग के अंतर्गत आती हैं। यही वजह है कि इस विभाग को सरकार की आर्थिक रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। फिर भी राजनीतिक हलकों में यह चर्चा जरूर है कि जिस पीडब्ल्यूडी विभाग की चर्चा थी, उसके बजाय MSME देकर योगी ने यह संकेत दिया कि विभागों का फैसला केवल राजनीतिक वजन से तय नहीं होगा।

मनोज पांडे की एंट्री और बढ़ता कद

समाजवादी पार्टी छोड़कर भाजपा में आए Manoj Pandey को खाद्य रसद एवं नागरिक आपूर्ति जैसा बड़ा विभाग दिया गया है। यह विभाग सीधे जनता से जुड़ा हुआ माना जाता है और राशन व्यवस्था, सार्वजनिक वितरण प्रणाली और खाद्यान्न आपूर्ति जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक संदेश भी देता है। ब्राह्मण चेहरे के तौर पर भाजपा में शामिल किए गए मनोज पांडे को इतना अहम विभाग देकर पार्टी ने यह संकेत देने की कोशिश की है कि ब्राह्मण नेतृत्व को सरकार में मजबूत प्रतिनिधित्व दिया जा रहा है।यूपी की राजनीति में लंबे समय से ब्राह्मण समीकरण को लेकर चर्चा होती रही है। ऐसे में मनोज पांडे को बड़ा विभाग देकर भाजपा ने एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश की है।

किन मंत्रियों का घटा प्रभाव?

विभागों के इस बंटवारे में कुछ पुराने मंत्रियों का प्रभाव कम होता भी नजर आया। पहले MSME विभाग संभाल रहे राजीव सचान के पास अब केवल खादी एवं रेशम उद्योग विभाग बचा है। इसे उनके राजनीतिक कद में कमी के तौर पर देखा जा रहा है। इसी तरह खाद्य रसद एवं नागरिक आपूर्ति विभाग पहले दयालु मिश्रा के पास था, लेकिन अब यह विभाग उनसे लेकर मनोज पांडे को दे दिया गया। दयालु मिश्रा के पास अब केवल आयुष विभाग रह गया है।

राजनीतिक गलियारों में इसे शक्ति संतुलन की नई रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने साफ संकेत दिया है कि विभागों की ताकत स्थायी नहीं है और प्रदर्शन व राजनीतिक जरूरतों के आधार पर बदलाव संभव है।

छोटे विभाग, लेकिन बड़े संकेत

मंत्रिमंडल में शामिल अन्य नेताओं को भी अलग-अलग जिम्मेदारियां दी गई हैं। अजीत पाल सिंह को खाद्य सुरक्षा और औषधि प्रशासन विभाग की जिम्मेदारी मिली है। वहीं सोमेंद्र तोमर को राजनीतिक पेंशन, सैनिक कल्याण और प्रांतीय रक्षक दल विभाग का स्वतंत्र प्रभार दिया गया है।

दिलचस्प बात यह है कि पहले राज्य मंत्री रहते हुए सोमेंद्र तोमर के पास ऊर्जा जैसा बड़ा विभाग था, लेकिन अब उनका विभाग अपेक्षाकृत हल्का माना जा रहा है। कृष्णा पासवान को पशुधन एवं दुग्ध विकास विभाग, कैलाश सिंह राजपूत को ऊर्जा एवं अतिरिक्त ऊर्जा स्रोत विभाग और सुरेंद्र दिलेर को राजस्व विभाग से जोड़ा गया है। इन नियुक्तियों को सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन साधने की रणनीति के तौर पर भी देखा जा रहा है।

योगी ने क्यों लिया इतना समय?

राजनीतिक हलकों में सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की भी रही कि मंत्रियों के विभाग तय करने में करीब एक सप्ताह का समय क्यों लगा। 10 मई को शपथ ग्रहण हुआ और 17 मई को विभागों का वितरण किया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हर विभाग को लेकर लंबा मंथन किया। पार्टी संगठन, जातीय समीकरण, आगामी चुनाव और प्रशासनिक प्राथमिकताओं को ध्यान में रखते हुए यह फैसला तैयार किया गया। यानी यह केवल विभागों का बंटवारा नहीं, बल्कि 2027 के राजनीतिक समीकरणों की शुरुआती तैयारी भी मानी जा रही है।

क्या संदेश देना चाहती है भाजपा?

इस पूरे घटनाक्रम से भाजपा ने कई राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है। पहला, सरकार में अंतिम निर्णय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का ही होगा। दूसरा, पार्टी नए चेहरों को भी मजबूत जिम्मेदारी देने से पीछे नहीं हटेगी। और तीसरा, सामाजिक समीकरणों को साधते हुए संगठन और सरकार के बीच संतुलन बनाए रखा जाएगा। मंत्रिमंडल विस्तार और विभाग वितरण के बाद अब सभी की नजर इस बात पर रहेगी कि नए मंत्री अपने विभागों में कितना प्रभाव छोड़ पाते हैं और आने वाले चुनावों में इसका राजनीतिक असर कितना दिखाई देता है। फिलहाल इतना तय माना जा रहा है कि योगी सरकार के इस विभाग बंटवारे ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई बहस जरूर छेड़ दी है।

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