संसद के बाद अब सड़क पर लड़ाई आई…महिला आरक्षण की लड़ाई..
नई दिल्ली। महिला आरक्षण को लेकर देश की राजनीति में नया भूचाल आ गया है। संसद में बहुमत न मिलने के कारण ‘नारी शक्ति वंदन’ से जुड़े संशोधन विधेयक के गिरने के बाद अब यह मुद्दा सड़क पर उतर आया है। केंद्र की सत्ताधारी NDA सरकार और विपक्षी दलों के बीच टकराव तेज हो गया है। भारतीय जनता पार्टी ने साफ संकेत दे दिए हैं कि वह इस मुद्दे को जनांदोलन का रूप देगी और देशभर में विपक्ष के खिलाफ व्यापक अभियान चलाएगी।
- बिल गिरने के बाद NDA का राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन ऐलान
- विपक्ष पर 70 करोड़ महिलाओं से “विश्वासघात” का आरोप
- चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी, कई राज्यों में तेज होगा अभियान
लोकसभा में पेश किए गए इस अहम संशोधन विधेयक को अपेक्षित दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल सका। बिल के पक्ष में 298 वोट पड़े, जबकि विरोध में 230 सांसदों ने मतदान किया। कुल मिलाकर यह आंकड़ा 352 के जादुई आंकड़े से काफी पीछे रह गया। इसी के साथ महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण देने की दिशा में बड़ा राजनीतिक झटका लगा।
संसद के बाद सड़क पर संघर्ष
विधेयक के पास न हो पाने के बाद NDA ने रणनीति बदलते हुए अब इसे जनभावना का मुद्दा बनाने का फैसला किया है। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि यह सिर्फ संसद की हार नहीं, बल्कि महिलाओं के अधिकारों से जुड़ा सवाल है, जिसे जनता के बीच उठाना जरूरी है। आज शनिवार 18 अप्रैल से देशभर में विरोध प्रदर्शन, प्रेस कॉन्फ्रेंस और जनसभाओं की श्रृंखला शुरू करने की तैयारी की गई है। इन कार्यक्रमों में NDA के सभी सहयोगी दलों को शामिल किया जाएगा। खास बात यह है कि जिन संसदीय क्षेत्रों के सांसदों ने बिल का विरोध किया, वहां विशेष प्रदर्शन आयोजित किए जाएंगे, ताकि स्थानीय स्तर पर राजनीतिक दबाव बनाया जा सके।
महिला सांसदों का संसद परिसर में प्रदर्शन
बिल गिरने के तुरंत बाद NDA की महिला सांसदों ने संसद परिसर में धरना देकर विरोध जताया। हाथों में तख्तियां लेकर सांसदों ने “महिलाओं का अपमान बंद करो” और “देश की बेटियों के अधिकार वापस करो” जैसे नारे लगाए। इन सांसदों का कहना था कि दशकों से लंबित इस बिल को एक बार फिर राजनीतिक कारणों से रोका गया, जो महिलाओं के साथ अन्याय है। उनका आरोप था कि विपक्ष ने राजनीतिक लाभ के लिए महिलाओं के अधिकारों को बलि चढ़ा दिया।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष पर जोरदार हमला बोलते हुए कहा कि यह देश की 70 करोड़ महिलाओं के साथ विश्वासघात है। उन्होंने कहा कि जो दल खुद को महिलाओं का हितैषी बताते हैं, उन्होंने संसद में असली चेहरा दिखा दिया है। शाह ने सवाल उठाया कि जब महिलाएं अपने अधिकारों के लिए दशकों से इंतजार कर रही हैं, तब इस तरह का विरोध किस मानसिकता को दर्शाता है। उन्होंने विपक्ष के जश्न मनाने पर भी कड़ी आपत्ति जताई और इसे महिलाओं का अपमान बताया।
बीजेपी का चुनावी दांव
दरअसल राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा इस मुद्दे को आने वाले चुनावों में बड़े हथियार के रूप में इस्तेमाल कर सकती है। खासतौर पर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में, जहां निकट भविष्य में चुनाव होने हैं, वहां महिला वोटरों को साधने के लिए यह मुद्दा प्रमुखता से उठाया जाएगा। पार्टी की रणनीति है कि बिल के गिरने को “खोया हुआ अवसर” बताया जाए और यह संदेश दिया जाए कि विपक्ष के कारण महिलाओं को उनका अधिकार नहीं मिल सका। इससे महिलाओं के बीच सहानुभूति और समर्थन हासिल करने की कोशिश होगी। महिला आरक्षण का मुद्दा अब केवल संसदीय बहस तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह जन-राजनीति का बड़ा विषय बन चुका है। आने वाले दिनों में देशभर में विरोध-प्रदर्शनों और राजनीतिक बयानबाजी के जरिए यह मुद्दा और गरमाने की संभावना है। यह स्पष्ट है कि ‘आधी आबादी’ से जुड़ा यह सवाल अब चुनावी राजनीति का केंद्र बनने जा रहा है। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि जनता इस मुद्दे पर किस पक्ष के साथ खड़ी होती है और क्या यह आंदोलन भविष्य में महिला आरक्षण की राह को आसान बना पाएगा।





