बंदूक से ईंट-गारे तक: नक्सल रास्ता छोड़ अरविंद ने बदली जिंदगी, अब हर महीने 20 हजार तक कमाई
मां-बाप की मौत के बाद भटका युवक, सरेंडर कर कौशल सीखा और बना आत्मनिर्भर
छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग से एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो हिंसा के अंधेरे से निकलकर उम्मीद और पुनर्वास की नई रोशनी दिखाती है। बीजापुर जिले के रहने वाले 22 वर्षीय अरविंद हेमला, जो कभी माओवादी संगठन में सक्रिय था, आज मेहनत की कमाई से नई जिंदगी जी रहा है।
अभाव और अकेलेपन ने धकेला नक्सल रास्ते पर
अरविंद हेमला का बचपन गरीबी और संघर्ष में बीता। Bijapur जिले के एक साधारण परिवार में जन्मे अरविंद ने कम उम्र में ही अपने माता-पिता को खो दिया। साल 2009 में पिता की मौत और 2016 में मां के निधन के बाद वह पूरी तरह अकेला पड़ गया। इस कठिन दौर में उसे सहारे की जरूरत थी, लेकिन हालात ने उसे गलत दिशा में धकेल दिया। इसी दौरान वह माओवादी गतिविधियों के संपर्क में आया और संगठन से जुड़ गया।
टॉप लीडरों का ‘संतरी’ बना अरविंद
माओवादी संगठन में शामिल होने के बाद अरविंद को हथियार चलाने और जंगलों में रहने की ट्रेनिंग दी गई। धीरे-धीरे वह संगठन के भरोसेमंद सदस्यों में शामिल हो गया और उसे शीर्ष नक्सली नेताओं की सुरक्षा में तैनात कर दिया गया। वह कई सालों तक जंगल-जंगल भटकता रहा और संगठन के लिए काम करता रहा। लेकिन अंदर ही अंदर उसे इस जीवन की अस्थिरता और खतरे का अहसास होने लगा था।
गांव वालों ने दिखाई नई राह
अरविंद की जिंदगी में असली मोड़ तब आया जब उसके गांव के लोगों ने उससे संपर्क किया। उन्होंने उसे सरकार की पुनर्वास योजनाओं और मुख्यधारा में लौटने के फायदे बताए। लंबे समय तक सोचने के बाद आखिरकार अरविंद ने 22 मार्च 2025 को सुरक्षा बलों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। यह फैसला उसके जीवन का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ।
पुनर्वास केंद्र से मिली नई पहचान
सरेंडर के बाद अरविंद को पुनर्वास केंद्र भेजा गया, जहां उसे नई शुरुआत का मौका मिला। यहां उसने राजमिस्त्री (मेसन) का काम सीखा और निर्माण कार्य में प्रशिक्षण हासिल किया। यह प्रशिक्षण उसके लिए जीवन बदलने वाला साबित हुआ। उसने न सिर्फ एक हुनर सीखा, बल्कि आत्मनिर्भर बनने का रास्ता भी खोज लिया।
अब हर महीने 18-20 हजार की कमाई
ट्रेनिंग पूरी करने के बाद अरविंद अब Telangana में निर्माण कार्य में लगा हुआ है। वह रोजाना करीब 600 रुपये कमा रहा है, जिससे उसकी मासिक आय 18,000 से 20,000 रुपये तक पहुंच रही है। अरविंद का कहना है कि अब उसे अपने भविष्य को लेकर उम्मीद दिखने लगी है और वह एक सम्मानजनक जीवन जी रहा है।
“हिंसा में कोई भविष्य नहीं” – अरविंद
अरविंद ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा, “समय के साथ मुझे समझ में आया कि हिंसा का रास्ता सिर्फ डर और अनिश्चितता देता है। मैं सीनियर माओवादी कमांडरों के लिए संतरी था, लेकिन मुझे पता था कि एक दिन मुझे भी गोलियों का सामना करना पड़ेगा। इसलिए मैंने सरेंडर करने का फैसला लिया।” उसके इस बयान से साफ है कि बदलाव की इच्छा और सही मार्गदर्शन किसी भी व्यक्ति की जिंदगी बदल सकता है।
बस्तर में बदलती तस्वीर
Bastar क्षेत्र, जो कभी नक्सल हिंसा के लिए जाना जाता था, अब धीरे-धीरे विकास और शांति की राह पर आगे बढ़ रहा है। सरकार का फोकस अब केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षा, रोजगार और पुनर्वास पर भी है। ऐसे कई उदाहरण सामने आ रहे हैं, जहां पूर्व नक्सली मुख्यधारा में लौटकर सम्मानजनक जीवन जी रहे हैं।
उम्मीद की मिसाल बना अरविंद
अरविंद हेमला की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की सफलता नहीं है, बल्कि यह उन सैकड़ों युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो किसी वजह से भटक जाते हैं। यह कहानी बताती है कि हालात चाहे कितने भी कठिन क्यों न हों, अगर सही समय पर सही फैसला लिया जाए, तो जिंदगी को नई दिशा दी जा सकती है। बंदूक छोड़कर ईंट-गारे का काम अपनाने वाले अरविंद ने यह साबित कर दिया है कि बदलाव संभव है। जरूरत है तो बस हिम्मत, सही मार्गदर्शन और अवसर की। आज वह न केवल खुद आत्मनिर्भर है, बल्कि समाज के लिए भी एक सकारात्मक उदाहरण बन चुका है।