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छत्तीसगढ़ सरकार की पहल: तिरिया ने दिखाया जंगल बचाने का रास्ता, CFR अधिकार मिला तो ग्रामीणों ने दावानल को दी मात

DigitalDesk by DigitalDesk
September 16, 2026
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छत्तीसगढ़ सरकार की पहल: तिरिया ने दिखाया जंगल बचाने का रास्ता, CFR अधिकार मिला तो ग्रामीणों ने दावानल को दी मात
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तिरिया ने दिखाया जंगल बचाने का रास्ता, CFR अधिकार मिला तो ग्रामीणों ने दावानल को दी मात

जंगल की आग को रोकने के लिए अक्सर सरकारी मशीनरी, फायर ब्रिगेड और आधुनिक तकनीक की बात होती है… लेकिन छत्तीसगढ़ के बस्तर का तिरिया गांव एक अलग कहानी बता रहा है। यहां जंगल को बचाने की जिम्मेदारी सिर्फ वन विभाग की नहीं रही, बल्कि जंगल पर अधिकार पाने वाले ग्रामीण खुद उसकी सुरक्षा की पहली दीवार बन गए। तिरिया गांव को कम्युनिटी फॉरेस्ट राइट्स यानी CFR मिलने के बाद ग्रामीणों ने 3 हजार हेक्टेयर से ज्यादा जंगल की निगरानी के लिए सामुदायिक व्यवस्था खड़ी की। नतीजा यह हुआ कि जिस दावानल को हर साल जंगल के लिए बड़ा खतरा माना जाता था, उसे गांव वालों ने शुरुआती स्तर पर ही रोकने की कोशिश शुरू कर दी।

अधिकार मिला तो जंगल से रिश्ता भी बदल गया

तिरिया की कहानी में सबसे अहम बदलाव सिर्फ इतना नहीं है कि ग्रामीणों को वन संसाधनों पर अधिकार मिला… असली बदलाव जंगल के प्रति उनकी जिम्मेदारी में आया। पहले जंगल को बचाने की जिम्मेदारी मुख्य रूप से सरकारी व्यवस्था से जुड़ी मानी जाती थी। CFR के बाद ग्रामीणों के सामने यह एहसास मजबूत हुआ कि जंगल सुरक्षित रहेगा तो उनकी आजीविका भी सुरक्षित रहेगी। महुआ हो, चार हो या तेंदूपत्ता… जंगल की वनोपज ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में जंगल में आग का मतलब सिर्फ पेड़-पौधों का नुकसान नहीं, बल्कि ग्रामीणों की आमदनी और भविष्य पर सीधा असर भी है। यही जुड़ाव तिरिया की सबसे बड़ी ताकत बना।

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गांव ने बनाई अपनी जंगल प्रहरी टीम

ग्रामीणों ने सामुदायिक गश्ती दल तैयार किया। सदस्य बारी-बारी से जंगल की निगरानी करते हैं।

कहीं धुआं दिखाई दिया…

कहीं आग की छोटी सी लपट नजर आई…

या किसी हिस्से में संदिग्ध गतिविधि दिखी…

तो सूचना गांव तक पहुंचाई जाती है और ग्रामीण मिलकर आग पर काबू पाने की कोशिश करते हैं। यानी आग को बड़ा दावानल बनने का इंतजार नहीं किया जाता। पहली चिंगारी पर कार्रवाई तिरिया की रणनीति का अहम हिस्सा है।

फायर लाइन बनी आग के रास्ते की दीवार

जंगल की आग को फैलने से रोकने के लिए ग्रामीणों ने फायर लाइन तैयार की। फायर लाइन का मतलब जंगल के एक हिस्से में ऐसी पट्टी तैयार करना है जहां सूखी घास, पत्तियां और दूसरी ज्वलनशील सामग्री हटा दी जाती है। इससे आग के पास आगे बढ़ने के लिए ईंधन कम हो जाता है और उसके फैलाव को रोकने में मदद मिलती है। तिरिया के ग्रामीणों ने स्थानीय परिस्थितियों और अपने अनुभव के आधार पर ऐसी व्यवस्थाओं को अपनाया। यानी आधुनिक तकनीक के साथ-साथ स्थानीय ज्ञान और सामुदायिक भागीदारी यहां बड़ा हथियार बनी।

दावानल के खिलाफ गांव बना एकजुट

तिरिया मॉडल की सबसे खास बात है कि जंगल बचाने की जिम्मेदारी किसी एक व्यक्ति की नहीं है। गश्ती दल है… सूचना का नेटवर्क है… फायर लाइन है… और सबसे ऊपर पूरा समुदाय है। कहीं आग दिखाई देने पर सूचना तेजी से गांव तक पहुंचती है और ग्रामीण सामूहिक रूप से आग बुझाने में जुट जाते हैं। यही वजह है कि छोटी घटनाओं को बड़े दावानल में बदलने से रोकने में मदद मिलती है। यह मॉडल एक महत्वपूर्ण सवाल भी खड़ा करता है—क्या जंगलों की सुरक्षा सिर्फ सरकारी निगरानी से संभव है, या स्थानीय समुदाय को अधिकार और जिम्मेदारी देकर ज्यादा प्रभावी परिणाम हासिल किए जा सकते हैं?

तिरिया की कहानी सिर्फ जंगल की आग की नहीं

तिरिया की कहानी को केवल दावानल रोकने की सफलता के तौर पर देखना अधूरा होगा। यह कहानी बताती है कि जब किसी समुदाय को अपने प्राकृतिक संसाधनों से अधिकार और जिम्मेदारी का रिश्ता मिलता है, तो संरक्षण की भावना भी मजबूत हो सकती है। यहां ग्रामीणों के लिए जंगल कोई दूर खड़ा सरकारी संसाधन नहीं है। यही जंगल उनके जीवन, रोजगार, परंपरा और भविष्य से जुड़ा है। इसलिए जंगल बचाना उनके लिए किसी अभियान का हिस्सा नहीं, बल्कि अपनी जिंदगी बचाने जैसा काम है।

तिरिया से निकलता बड़ा संदेश

बस्तर के तिरिया गांव का अनुभव यह संदेश देता है कि जंगल की सुरक्षा में स्थानीय समुदाय को भागीदार बनाना कितना महत्वपूर्ण हो सकता है। CFR ने ग्रामीणों को अधिकार का आधार दिया.. सामुदायिक गश्ती ने निगरानी का ढांचा दिया… फायर लाइन ने आग के फैलाव को रोकने का उपाय दिया… और जंगल से जुड़ी आजीविका ने संरक्षण की मजबूत वजह दी। यानी कानूनी अधिकार + सामुदायिक जिम्मेदारी + स्थानीय ज्ञान = जंगल संरक्षण का मजबूत मॉडल। तिरिया ने दिखाया है कि जंगल को बचाने के लिए सिर्फ बाहर से पहरा लगाने की जरूरत नहीं होती… कभी-कभी जंगल की सबसे मजबूत सुरक्षा उसी समुदाय के हाथों में होती है, जिसकी जिंदगी जंगल से जुड़ी होती है। और यही वजह है कि बस्तर का तिरिया गांव सिर्फ दावानल से लड़ने की कहानी नहीं लिख रहा… बल्कि समुदाय और जंगल के बीच नए रिश्ते की मिसाल भी पेश कर रहा है।

Tags: #Chhattisgarh Government Initiative Tiriya shows the way to save the forest villagers defeat wildfires after securing CFR rights
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