सालों बाद मोदी सरकार के काम की तारीफ
भारतीय राजनीति में कभी मोदी सरकार के मुखर आलोचक रहे पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा के सुर इस बार बदले-बदले नजर आए। दिल्ली में आयोजित BRICS सम्मेलन को लेकर सिन्हा ने केंद्र सरकार की विदेश नीति और भारत की कूटनीतिक भूमिका की खुलकर तारीफ की।
खास बात यह है कि जिस सरकार की नीतियों को लेकर सिन्हा लंबे समय तक सवाल उठाते रहे, उसी सरकार के नेतृत्व में आयोजित BRICS सम्मेलन को उन्होंने सफल बताया। उनके बयान को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि वह भाजपा से अलग होने के बाद मोदी सरकार के आलोचकों में प्रमुख चेहरा रहे हैं।
BRICS की सफलता के गिनाए तीन कारण
यशवंत सिन्हा ने BRICS सम्मेलन की सफलता के पीछे तीन प्रमुख वजहें गिनाईं। पहला, जिन राष्ट्राध्यक्षों को भारत ने आमंत्रित किया था, उनमें रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी शामिल थे और दोनों सम्मेलन में पहुंचे।
दूसरी बड़ी उपलब्धि साझा घोषणापत्र को बताया गया। सिन्हा के मुताबिक, मई में BRICS विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान मतभेदों के चलते साझा बयान नहीं आ सका था। ऐसे में सम्मेलन के बाद सर्वसम्मति से साझा घोषणापत्र जारी होना भारत की कूटनीतिक क्षमता की सफलता के रूप में देखा जा सकता है।
तीसरा महत्वपूर्ण पहलू द्विपक्षीय बैठकों को माना गया। सम्मेलन के दौरान कई देशों के साथ भारत की द्विपक्षीय वार्ताएं हुईं, लेकिन सबसे ज्यादा महत्व मोदी-शी जिनपिंग मुलाकात को मिला।
चीन के सामने भारत ने मजबूती दिखाई
यशवंत सिन्हा ने चीन को लेकर भारत की नीति की तारीफ करते हुए एक महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने साफ कहा कि चीन पर भरोसा नहीं किया जा सकता, लेकिन बातचीत बंद भी नहीं होनी चाहिए।
उनका कहना था कि भारत ने चीन के सामने अपने मुद्दे मजबूती से रखे। चीन के मुद्दों को भी बातचीत में उठाया गया। सिन्हा के मुताबिक, इसी वजह से दोनों देशों के बीच बातचीत में तल्खी और तनाव की स्थिति बनी होगी।
यह टिप्पणी इसलिए अहम है क्योंकि लंबे समय से भारत-चीन संबंधों में सीमा विवाद, रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और आपसी अविश्वास प्रमुख मुद्दे रहे हैं।
जिनपिंग की नाराजगी की चर्चा
सिन्हा ने यह भी कहा कि ऐसी खबरें सामने आईं कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत की ओर से मजबूती से मुद्दे उठाए जाने से खुश नहीं थे। उन्होंने यहां तक कहा कि कुछ लोगों का मानना है कि रात्रिभोज में जिनपिंग की अनुपस्थिति की वजह भी यही नाराजगी हो सकती है।
हालांकि इस तरह की राजनीतिक व्याख्याओं को आधिकारिक पुष्टि से अलग रखकर देखना जरूरी है। लेकिन सिन्हा का यह कहना जरूर महत्वपूर्ण है कि भारत ने चीन के सामने अपने हितों को मजबूती से रखा।
ईरान और पश्चिम एशिया पर भी संतुष्ट दिखे सिन्हा
BRICS सम्मेलन के दौरान ईरान की मौजूदगी और पश्चिम एशिया के मुद्दे पर भारत के रुख की भी यशवंत सिन्हा ने तारीफ की।
उन्होंने कहा कि भारत का रुख अपनी पारंपरिक स्थिति की ओर लौटता दिखाई दिया। खास तौर पर इजरायल की गाजा और लेबनान में कार्रवाई की आलोचना को उन्होंने संतोष का विषय बताया।
यहां सिन्हा ने भारत की उस विदेश नीति पर भी ध्यान दिलाया, जिसमें लंबे समय से फिलिस्तीन के मुद्दे पर संतुलित रुख और पश्चिम एशिया में सभी पक्षों के साथ संबंध बनाए रखने की कोशिश दिखाई देती रही है।
आलोचक की तारीफ क्यों बनी चर्चा का विषय
यशवंत सिन्हा का बयान इसलिए भी राजनीतिक चर्चा में है क्योंकि वह मोदी सरकार के शुरुआती वर्षों से ही उसके आलोचक रहे हैं। उन्होंने 2018 में भाजपा छोड़ी थी और बाद में तृणमूल कांग्रेस से जुड़े। 2022 के राष्ट्रपति चुनाव में वह विपक्ष के उम्मीदवार भी रहे।
ऐसे राजनीतिक सफर के बाद उनका भारत की BRICS अध्यक्षता की तारीफ करना सामान्य बयान से ज्यादा महत्व रखता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि सिन्हा ने मोदी सरकार की अपनी पूरी राजनीतिक आलोचना वापस ले ली है। लेकिन यह जरूर दिखाता है कि विदेश नीति जैसे मुद्दों पर राजनीतिक मतभेदों के बावजूद किसी सरकार की कूटनीतिक सफलता को स्वीकार किया जा सकता है।
BRICS से भारत की कूटनीतिक ताकत का संदेश
BRICS सम्मेलन भारत के लिए सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय बैठक नहीं था। इसमें रूस, चीन, ईरान समेत ग्लोबल साउथ के महत्वपूर्ण देशों की मौजूदगी के बीच भारत ने अपनी प्राथमिकताओं को सामने रखने की कोशिश की।
यशवंत सिन्हा की टिप्पणी इसी पहलू को रेखांकित करती है। उनका आकलन है कि भारत ने अध्यक्ष के तौर पर ऐसी भाषा और सहमति तैयार करने में सफलता हासिल की, जिसे अलग-अलग हितों वाले देश स्वीकार कर सके।
यानी जिस BRICS को लेकर सम्मेलन से पहले कई तरह की आशंकाएं थीं, उसे भारत ने संवाद और सहमति के मंच के रूप में संचालित किया।
यशवंत सिन्हा का बदला हुआ सुर भारतीय विदेश नीति की एक दिलचस्प तस्वीर सामने रखता है। राजनीतिक विरोध अपनी जगह है, लेकिन जब भारत की कूटनीतिक भूमिका की बात आती है तो सरकार के आलोचक भी उसकी उपलब्धि को स्वीकार कर रहे हैं। सिन्हा का संदेश साफ है। चीन से बातचीत जरूरी है, लेकिन भरोसा नहीं। और BRICS में भारत ने अपनी बात मजबूती से रखते हुए अपनी कूटनीतिक क्षमता का प्रदर्शन किया है।





