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नीले रंग की सियासत… अखिलेश-मायावती आमने-सामने, रंग के पीछे छिपी है लंबी राजनीतिक कहानी…

DigitalDesk by DigitalDesk
September 14, 2026
in उत्तर प्रदेश, मुख्य समाचार, राजनीति, लखनऊ
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politics of the color blue Akhilesh and Mayawati face of a long political saga lies behind the color
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नीले रंग पर अखिलेश-मायावती की सीधी टक्कर

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सियासत के रंग तेजी से बदल रहे हैं. लेकिन इस बार बहस लाल, भगवा या हरे रंग से आगे बढ़कर नीले रंग तक पहुंच गई है. समाजवादी पार्टी ने अपने छात्र संगठन के लिए नीली टी-शर्ट और जींस को नई पहचान देने की कोशिश की, तो बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने इस पर कड़ा ऐतराज जताया.

मायावती का कहना है कि नीला रंग बीएसपी के साथ उसकी स्थापना के समय से जुड़ा है. जबकि अखिलेश यादव ने नीले रंग को लोकतंत्र, संविधान और बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर की विचारधारा से जोड़ते हुए इसे अपनाने की वजह बताई. यानी मामला सिर्फ कपड़ों के रंग का नहीं है. असली लड़ाई उस राजनीतिक और सामाजिक आधार की है, जिसे नीला रंग दशकों से अपने साथ लेकर चलता आया है.

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लाल टोपी से नीली जींस तक… SP की नई रणनीति

समाजवादी पार्टी लंबे समय से लाल टोपी और लाल रंग को अपनी पहचान के तौर पर इस्तेमाल करती रही है. खुद अखिलेश यादव लाल रंग को क्रांति का प्रतीक बता चुके हैं. अब पार्टी के छात्र संगठन की नई वेशभूषा में लाल टोपी के साथ नीली टी-शर्ट और जींस दिखाई दे रही है. अखिलेश यादव ने जींस के कपड़े को मजदूरों के संघर्ष और प्रतिरोध से जोड़ा. जबकि नीले रंग को लोकतंत्र, संविधान और डॉ. आंबेडकर से जोड़ते हुए कहा कि वर्दी केवल वर्दी नहीं होती. उसके पीछे विचारधारा भी होती है. सियासी तौर पर देखें तो यह बदलाव समाजवादी पार्टी के पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण को मजबूत करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है. यूपी की राजनीति में दलित वोट लंबे समय तक बीएसपी का सबसे मजबूत आधार रहा है. लेकिन पिछले कुछ चुनावों में यह वोट पूरी तरह एक पार्टी के साथ नहीं रहा. यही वह राजनीतिक खाली जगह है, जहां अखिलेश यादव अपनी पैठ बढ़ाना चाहते हैं.

मायावती का पलटवार… ‘रंग बदलने से अंबेडकरवादी नहीं बनेंगे’

अखिलेश यादव की नीले रंग की पहल पर मायावती ने सोशल मीडिया के जरिए तीखा हमला बोला. मायावती ने कहा कि नीला रंग बीएसपी के साथ शुरुआत से जुड़ा रहा है. सिर्फ नीले कपड़े पहन लेने से कोई व्यक्ति या पार्टी अंबेडकरवादी नहीं बन जाती. उन्होंने समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और दूसरी पार्टियों पर भी निशाना साधा और आरोप लगाया कि ये पार्टियां जरूरत के हिसाब से रंग बदलती हैं. मायावती का हमला दरअसल सिर्फ नीली टी-शर्ट तक सीमित नहीं है. इसके पीछे दलित राजनीति की उस विरासत पर दावा है, जिस पर बीएसपी लंबे समय से अपना अधिकार जताती रही है. लेकिन सवाल यही है कि क्या नीला रंग सिर्फ बीएसपी का है?  इतिहास इसका जवाब कुछ और देता है.

बाबा साहेब और नीले रंग का रिश्ता कितना पुराना है?

डॉ. भीमराव आंबेडकर की राजनीति में नीला रंग हमेशा से अकेला रंग नहीं था. उनकी इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी के झंडे का संबंध लाल रंग से था. क्योंकि उस दौर में लाल रंग दुनिया भर के मजदूर आंदोलनों से जुड़ा हुआ था. बाद में जब डॉ. आंबेडकर ने अनुसूचित जातियों के लिए अलग राजनीतिक मंच खड़ा किया, तो नीला रंग प्रमुख होता गया. 1942 में बनी शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन का झंडा नीला था. इसके बाद डॉ. आंबेडकर के स्वयंसेवी संगठन समता सैनिक दल से जुड़े दस्तावेजों में भी गहरे नीले रंग के झंडे का उल्लेख मिलता है. इसमें नीले रंग को स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के लक्ष्य से जोड़ा गया था. यानी नीला रंग धीरे-धीरे दलित मुक्ति और सामाजिक समानता की राजनीति का प्रतीक बनता चला गया.

मजदूरों के कपड़ों से दलित प्रतिरोध तक

नीले रंग की कहानी सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है. दुनिया के कई हिस्सों में नीला रंग मजदूर वर्ग के कपड़ों से जुड़ा रहा. नीले कपड़े पसीने और गंदगी को अपेक्षाकृत कम दिखाते थे और सस्ते रंगों में शामिल थे. यही वजह रही कि कारखानों, खदानों और रेलवे जैसे क्षेत्रों में काम करने वाले मजदूरों की पोशाक में नीला रंग आम हुआ. इसी से आगे चलकर ‘ब्लू कॉलर’ जैसी पहचान सामने आई. भारत में जाति व्यवस्था और श्रम का रिश्ता बेहद गहरा रहा है. ऐसे में आंबेडकर की राजनीति के साथ नीले रंग का जुड़ना सामाजिक न्याय की लड़ाई का प्रतीक बन गया. दलित चिंतकों ने नीले रंग को आकाश की विशालता से भी जोड़ा. यानी ऐसा समाज जहां समानता और स्वतंत्रता की कोई सीमा न हो.

कांशीराम से मायावती तक…BSP ने नीले रंग को बनाया पहचान

डॉ. आंबेडकर के निधन के बाद उनकी राजनीतिक विरासत से जुड़े संगठनों ने भी नीले रंग को आगे बढ़ाया. 1957 में रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के गठन के साथ यह रंग दलित राजनीति में और मजबूत हुआ. इसके बाद 1984 में कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की… बीएसपी ने नीले रंग को अपनी राजनीतिक पहचान का अहम हिस्सा बनाया. बाद में हाथी चुनाव चिह्न के साथ ‘नीला झंडा-हाथी निशान’ जैसी पहचान भी सामने आई. यही वजह है कि मायावती नीले रंग को बीएसपी की राजनीतिक विरासत से जोड़ती हैं. लेकिन अब नीले रंग के दावेदार सिर्फ मायावती नहीं हैं. आजाद समाज पार्टी भी नीले रंग को इस्तेमाल करती है. कांग्रेस और समाजवादी पार्टी भी अलग-अलग मौकों पर नीले रंग को अपनी राजनीतिक अभिव्यक्ति का हिस्सा बना चुकी हैं.

यूपी की चुनावी जमीन पर नीले रंग की असली लड़ाई

2027 के विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले छिड़ी यह बहस इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तर प्रदेश में दलित मतदाता चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की बड़ी ताकत रखते हैं. बीएसपी का दलित वोट बैंक पहले जितना एकजुट नहीं माना जाता. वहीं बीजेपी ने भी अनुसूचित जाति और पिछड़े वर्ग के बड़े हिस्से में अपनी राजनीतिक पकड़ बनाई है. समाजवादी पार्टी की कोशिश है कि पीडीए के जरिए पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक मतदाताओं को एक साथ जोड़ा जाए. ऐसे में नीले रंग को अपनाना केवल छात्र संगठन की वर्दी बदलने का फैसला नहीं माना जा सकता. यह उस सामाजिक वर्ग तक पहुंच बनाने का राजनीतिक संकेत भी है, जिसे लंबे समय तक बीएसपी की सबसे मजबूत ताकत माना जाता रहा है. यही वजह है कि मायावती ने तुरंत प्रतिक्रिया दी.

नीला सिर्फ रंग नहीं… एक राजनीतिक संदेश है

भारत में रंगों की अपनी राजनीतिक भाषा है. लाल रंग लंबे समय से वामपंथ और समाजवादी विचारधारा से जुड़ा रहा है. भगवा हिंदुत्व की राजनीतिक पहचान का प्रतीक बन चुका है. और नीला सामाजिक न्याय, दलित चेतना, संविधान और आंबेडकरवादी राजनीति से जुड़ गया है. खेल की दुनिया में भी भारत की टीमें लंबे समय से नीली जर्सी पहनती रही हैं. इसे तिरंगे के अशोक चक्र और समानता के प्रतीक से जोड़कर देखा जाता है. सिनेमा में भी नीला रंग प्रतिरोध का प्रतीक बना है. निर्देशक पा. रंजीत की फिल्म ‘काला’ में नीला रंग दलित प्रतिरोध और आंबेडकरवादी विचारधारा की ताकत के रूप में सामने आता है. लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती.

रंगों की जंग के पीछे 2027 का बड़ा संदेश

अखिलेश यादव और मायावती के बीच नीले रंग को लेकर हुई तकरार को सिर्फ रंगों की लड़ाई समझना राजनीतिक भूल होगी. असल सवाल है—दलित राजनीति की विरासत पर किसका दावा मजबूत होगा?  मायावती के सामने अपनी पुरानी राजनीतिक जमीन बचाने की चुनौती है. अखिलेश यादव के सामने पीडीए को चुनावी ताकत में बदलने की चुनौती है… बीजेपी के सामने अपने दलित-पिछड़े सामाजिक आधार को मजबूत बनाए रखने की चुनौती है. यानी 2027 की यूपी की लड़ाई में नीला रंग सिर्फ झंडे, टी-शर्ट या जींस पर नजर नहीं आएगा. यह वोट, विचारधारा और सामाजिक न्याय की राजनीति में भी दिखाई देगा. और शायद यही वजह है कि अखिलेश की नीली जींस और मायावती का नीला झंडा. उत्तर प्रदेश की सियासत में आने वाले चुनाव का एक बड़ा राजनीतिक संकेत बन गए हैं. क्योंकि राजनीति में रंग कभी सिर्फ रंग नहीं होता उसके पीछे इतिहास भी होता है… विचारधारा भी.और वोट का गणित भी.

Tags: #politics of the color blue #Akhilesh and Mayawati #political saga lies behind the color
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