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ब्रिक्स का नया एजेंडा: नई दिल्ली से बदली दुनिया की दिशा नई दिल्ली से दुनिया को बहुध्रुवीय संदेश

DigitalDesk by DigitalDesk
September 13, 2026
in मुख्य समाचार
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Xi Jinping and Modi Professor Deepak
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ब्रिक्स देशों के नेताओं की 18वीं बैठक में जारी नई दिल्ली घोषणा सिर्फ एक औपचारिक दस्तावेज नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक व्यवस्था की दिशा का संकेत देने वाला राजनीतिक संदेश है। घोषणा में जिस तरह संप्रभु समानता, पारस्परिक सम्मान, लोकतंत्र, समावेशिता और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की बात की गई है, उससे साफ है कि ब्रिक्स अब केवल आर्थिक सहयोग का मंच नहीं रह गया है। पिछले दो दशकों में संगठन के विस्तार के बाद इसका एजेंडा राजनीति, सुरक्षा, व्यापार, वित्त, तकनीक और वैश्विक दक्षिण की आवाज तक फैल चुका है।

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भेंट को जानकार द्विपक्षीय संबंध बेहतर होने की दिशा में अहम कदम मान रहे हैं। जेएनयू में सेंटर फॉर चाइनीज़ स्टडीज़ के प्रोफसर बीआर दीपक ने सीजीटीएन हिंदी संवाददाता अनिल पांडेय के साथ खास बातचीत में दोनों नेताओं की मुलाकात का सकारात्मक मूल्यांकन किया। बकौल दीपक शी चिनफिंग और नरेंद्र मोदी की भेंट भारत-चीन संबंधों में प्रतिस्पर्धा से नियंत्रित सहयोग की ओर एक व्यावहारिक बदलाव की संभावना पैदा करती है। साथ ही सीमा पर तनाव कम होने से दोनों देशों के रणनीतिक और आर्थिक जोखिम घट सकते हैं। इतना ही नहीं व्यापार, निवेश, विनिर्माण, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऊर्जा और आपूर्ति-श्रृंखला में सहयोग बढ़ने की अच्छी संभावना है। सीधी विमान सेवाओं का संचालन भी हो रहा है, वहीं लोगों के बीच संपर्क और आवाजाही बढ़ने से पर्यटन, शिक्षा व व्यावसायिक संपर्क मजबूत हो सकते हैं। इससे ब्रिक्स, एससीओ के साथ-साथ विभिन्न वैश्विक संस्थाओं में बेहतर समन्वय से विकासशील देशों की आवाज प्रभावी और मजबूत ढंग से उठायी
जा सकती है। जहां तक भारत की बात है, तो उसके लिए स्थिर संबंध रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत करेंगे। जबकि चीन को एशिया में स्थिरता और आर्थिक अवसर प्राप्त होंगे। हालांकि, सीमा विवाद अभी लंबित है, व्यापार असंतुलन, आर्थिक-तकनीकी निर्भरता आदि चुनौतियां बने रहेंगे। उधर अमेरिका-जापान सहित अन्य साझेदारों के साथ संतुलन बनाए रखना भारत के लिए महत्वपूर्ण होगा। ये सब बातें और
कदम दोनों देशों के आपसी संबंधों को काफ़ी हद तक प्रभावित कर सकते हैं। कुल मिलाकर एशिया की इन दो बड़ी शक्तियों के नेताओं की मुलाक़ात बेहतर भविष्य की उम्मीद जगा रही है।

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नई दिल्ली घोषणा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि ब्रिक्स ने वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार की जरूरत को फिर से प्रमुखता से उठाया है। संयुक्त राष्ट्र की केंद्रीय भूमिका बनाए रखने के साथ-साथ विकासशील देशों की भागीदारी और प्रतिनिधित्व बढ़ाने की मांग बताती है कि मौजूदा वैश्विक संस्थाओं में शक्ति संतुलन को लेकर असंतोष बढ़ रहा है।

बहुध्रुवीय दुनिया की तरफ बड़ा कदम

ब्रिक्स की घोषणा में बहुध्रुवीयता और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के लोकतंत्रीकरण पर जोर दिया गया है। इसका सीधा अर्थ है कि वैश्विक फैसलों में कुछ चुनिंदा शक्तियों का दबदबा कम हो और एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका तथा अन्य विकासशील देशों को अधिक प्रभाव मिले।

यही वजह है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में व्यापक सुधार का समर्थन घोषणा का अहम हिस्सा बनता है। अफ्रीकी देशों की एज़ुलविनी आम सहमति और सिर्ते घोषणा में व्यक्त आकांक्षाओं को मान्यता देना भी इसी रणनीति का हिस्सा है।

यहां ब्रिक्स की सोच केवल अपने सदस्य देशों तक सीमित दिखाई नहीं देती। संगठन खुद को वैश्विक दक्षिण की सामूहिक आवाज के रूप में स्थापित करने की कोशिश करता नजर आता है। यानी आने वाले समय में ब्रिक्स की भूमिका सिर्फ आर्थिक साझेदारी तक सीमित रहने के बजाय वैश्विक राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करने वाली हो सकती है।

डॉलर आधारित व्यवस्था को चुनौती का संकेत?

घोषणा का आर्थिक पक्ष भी बेहद महत्वपूर्ण है। ब्रेटन वुड्स संस्थानों में सुधार की मांग और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में उभरते बाजारों तथा विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की आवाज बढ़ाने की अपील सीधे तौर पर मौजूदा वैश्विक आर्थिक ढांचे पर सवाल उठाती है।

आईएमएफ की कोटा व्यवस्था में सुधार, विश्व व्यापार संगठन को मजबूत करने और बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था की रक्षा की बात बताती है कि ब्रिक्स एक ऐसी आर्थिक व्यवस्था चाहता है, जिसमें विकासशील देशों की वास्तविक आर्थिक ताकत के अनुरूप उनकी भूमिका तय हो। एकतरफा टैरिफ और दबाव वाले आर्थिक उपायों का विरोध भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। हालांकि घोषणा सीधे तौर पर किसी एक देश को निशाना नहीं बनाती, लेकिन इसका संदेश स्पष्ट है—व्यापार और आर्थिक संबंधों को राजनीतिक दबाव का हथियार बनाने की प्रवृत्ति का विरोध।

चीन की ओर से 53 अफ्रीकी देशों के लिए शून्य-टैरिफ उपायों की सराहना भी ब्रिक्स के भीतर दक्षिण-दक्षिण आर्थिक सहयोग की बढ़ती भूमिका को दिखाती है।

सुरक्षा से लेकर मध्य पूर्व तक साझा चिंता

नई दिल्ली घोषणा का एक बड़ा हिस्सा वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों पर केंद्रित है। मध्य पूर्व और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव पर चिंता जताते हुए राजनीतिक और कूटनीतिक समाधान की अपील की गई है। इसके साथ ही बढ़ते सैन्य खर्च और परमाणु जोखिम पर चिंता व्यक्त करना भी महत्वपूर्ण है। ऐसे समय में जब दुनिया के कई हिस्सों में युद्ध और सैन्य तनाव बढ़ रहे हैं, ब्रिक्स का निरस्त्रीकरण और परमाणु अप्रसार व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर सामूहिक सुरक्षा के एजेंडे को सामने लाता है। क्यूबा पर एकतरफा नाकाबंदी की निंदा भी इसी व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा है, जिसमें किसी देश पर एकतरफा आर्थिक दबाव के बजाय बहुपक्षीय और कूटनीतिक समाधान की वकालत की गई है।

एआई और विकास: ब्रिक्स का भविष्य का एजेंडा

ब्रिक्स की नई दिशा सिर्फ राजनीति और वैश्विक संस्थाओं के सुधार तक सीमित नहीं है। घोषणा में सतत विकास, स्वास्थ्य, ऊर्जा संक्रमण, नई औद्योगिक क्रांति, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल कनेक्टिविटी जैसे क्षेत्रों को भी प्राथमिकता दी गई है। यानी ब्रिक्स भविष्य की अर्थव्यवस्था को लेकर भी अपना साझा एजेंडा तैयार कर रहा है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल तकनीक आने वाले वर्षों में आर्थिक शक्ति, रोजगार और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए निर्णायक साबित होने वाली हैं। ऐसे में इन क्षेत्रों में सहयोग ब्रिक्स देशों के लिए रणनीतिक महत्व रखता है। न्यू डेवलपमेंट बैंक के दूसरे ‘स्वर्णिम दशक’ का स्वागत और उसके विस्तार का समर्थन भी इस आर्थिक रणनीति को मजबूत करता है। औद्योगिक क्षमता केंद्र, लघु एवं मध्यम उद्यम मंच और व्यावसायिक शिक्षा गठबंधन जैसे मंचों को बढ़ावा देने का मतलब है कि ब्रिक्स अब जमीनी आर्थिक सहयोग को भी संस्थागत रूप देना चाहता है।

भारत के लिए क्यों अहम है नई दिल्ली घोषणा?

भारत की मेजबानी में जारी यह घोषणा कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है। एक तरफ भारत वैश्विक दक्षिण की आवाज को मजबूत करने की बात करता रहा है, वहीं दूसरी तरफ वह वैश्विक संस्थाओं में सुधार की जरूरत भी लगातार उठाता रहा है। ऐसे में नई दिल्ली घोषणा भारत की कूटनीतिक प्राथमिकताओं से भी काफी हद तक मेल खाती दिखाई देती है। सबसे बड़ा सवाल अब घोषणा के क्रियान्वयन का है। क्या ब्रिक्स अपने साझा बयानों को वास्तविक आर्थिक और राजनीतिक सहयोग में बदल पाएगा? क्या सदस्य देशों के बीच मौजूद मतभेदों के बावजूद साझा रणनीति बन पाएगी? और क्या ब्रिक्स वैश्विक दक्षिण के लिए एक प्रभावी वैकल्पिक मंच बन सकेगा?

इन सवालों का जवाब आने वाले वर्षों में मिलेगा। लेकिन इतना साफ है कि नई दिल्ली घोषणा ने ब्रिक्स के एजेंडे को और व्यापक बना दिया है। अब यह मंच सिर्फ व्यापार और निवेश की चर्चा तक सीमित नहीं, बल्कि वैश्विक शासन, आर्थिक न्याय, सुरक्षा, तकनीक और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की बहस का महत्वपूर्ण केंद्र बनता जा रहा है। 2027 में चीन की अध्यक्षता और 19वीं ब्रिक्स बैठक की घोषणा के साथ अब इस प्रक्रिया का अगला चरण शुरू होगा। असली परीक्षा यही होगी कि नई दिल्ली में व्यक्त सिद्धांत कितनी तेजी से ठोस नीतियों और वास्तविक सहयोग में बदलते हैं। अगर ऐसा होता है, तो ब्रिक्स आने वाले दशक में वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित करने वाली सबसे महत्वपूर्ण व्यवस्थाओं में से एक बन सकता है।

(अनिल पांडेय, चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)

Tags: #Xi Jinping and Modi
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