छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के सुदूर ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में बदलाव की एक ऐसी तस्वीर सामने आ रही है, जिसमें गांव की महिलाएं अब सिर्फ परिवार संभालने वाली गृहिणी नहीं, बल्कि परिवार की कमाई का मजबूत आधार और गांव की स्थानीय अर्थव्यवस्था की नई ताकत बन रही हैं। केंद्र और राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी ‘लखपति दीदी’ पहल ने महिलाओं को कमाई के नए रास्ते दिए हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस बदलाव की शुरुआत किसी बड़े शहर या औद्योगिक क्षेत्र से नहीं, बल्कि स्वयं सहायता समूहों के जरिए गांवों से हो रही है। गरियाबंद जैसे वन और आदिवासी बहुल जिले में इस पहल का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है, क्योंकि यहां लंबे समय तक ग्रामीण परिवारों की आय पारंपरिक खेती, मजदूरी और मौसमी रोजगार पर निर्भर रही है। महिलाओं की आर्थिक भूमिका अक्सर परिवार के भीतर श्रम तक सीमित दिखाई देती थी। अब तस्वीर बदल रही है। महिलाएं उत्पादन कर रही हैं, कारोबार चला रही हैं, बैंकिंग सेवाएं दे रही हैं, तकनीक अपना रही हैं और अपने उत्पादों को बाजार तक पहुंचा रही हैं।
SHG बना बदलाव का सबसे बड़ा इंजन
इस परिवर्तन के केंद्र में स्वयं सहायता समूह यानी SHG मॉडल है। ‘बिहान’ और राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं को समूहों से जोड़कर उन्हें बचत, ऋण, प्रशिक्षण और आजीविका के अवसरों से जोड़ा जा रहा है। यही मॉडल ‘लखपति दीदी’ अभियान को महज सरकारी योजना के बजाय महिलाओं को आर्थिक रूप से सक्षम बनाने का प्लेटफॉर्म बनाता है। अकेली महिला के पास पूंजी और बाजार तक पहुंच सीमित हो सकती है, लेकिन समूह के स्तर पर महिलाएं बचत करती हैं, ऋण लेती हैं, प्रशिक्षण प्राप्त करती हैं और सामूहिक रूप से कारोबार शुरू कर सकती हैं। इसका सबसे बड़ा असर यह है कि महिला अब केवल लाभार्थी नहीं रह जाती, बल्कि उद्यमी की भूमिका में आ जाती है।
खेती से कारोबार तक बदली महिलाओं की भूमिका
गरियाबंद की महिलाओं के लिए आय बढ़ाने का रास्ता सिर्फ पारंपरिक खेती नहीं रह गया है। पशुपालन, डेयरी, मुर्गी और बकरी पालन जैसे काम ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नियमित आय का माध्यम बन रहे हैं। कृषि के क्षेत्र में भी महिलाओं का फोकस सिर्फ फसल उगाने तक सीमित नहीं है। उन्नत सब्जी उत्पादन, टमाटर की खेती और जैविक खेती जैसे विकल्प उन्हें ज्यादा मूल्य वाली कृषि गतिविधियों से जोड़ रहे हैं। लेकिन गरियाबंद जैसे वन क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण संभावना लघु वनोपज में दिखाई देती है। महुआ, इमली और अन्य वन उत्पाद ग्रामीण परिवारों के लिए पहले से ही आय का स्रोत रहे हैं। फर्क यह है कि अब महिलाओं को इन उत्पादों के प्रसंस्करण, पैकेजिंग और बाजार से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है। यानी पहले जहां कच्चा माल बेचकर सीमित आमदनी होती थी, वहीं प्रसंस्करण और ब्रांडिंग के जरिए उसी उत्पाद की कीमत बढ़ाई जा सकती है। यही ‘लखपति दीदी’ मॉडल का असली आर्थिक तर्क है—सिर्फ उत्पादन नहीं, बल्कि वैल्यू एडिशन।
‘बैंक सखी’ से ‘ड्रोन दीदी’ तक नया दौर
महिला सशक्तिकरण का यह बदलाव सिर्फ खेती और पशुपालन तक सीमित नहीं है। ग्रामीण महिलाएं अब बैंक सखी, कृषि सखी और ड्रोन दीदी जैसी भूमिकाओं में भी आगे बढ़ रही हैं। यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे ग्रामीण महिलाओं की पहचान तकनीक और सेवाओं से जुड़े पेशेवरों के रूप में बन रही है। बैंक सखी गांव में वित्तीय सेवाओं को आसान बनाती है। कृषि सखी किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों से जोड़ती है। वहीं ड्रोन तकनीक जैसे नए क्षेत्र महिलाओं को ग्रामीण अर्थव्यवस्था के बिल्कुल नए हिस्से में प्रवेश का अवसर देते हैं। इसका संदेश स्पष्ट है—गांव की महिला अब सिर्फ खेत में काम करने वाली श्रमिक नहीं, बल्कि तकनीकी सेवा देने वाली उद्यमी भी हो सकती है।
गरियाबंद से पूरे छत्तीसगढ़ तक असर
गरियाबंद की कहानी किसी एक जिले की कहानी नहीं है। उपलब्ध राज्य स्तरीय आंकड़ों के मुताबिक छत्तीसगढ़ में 13 लाख 85 हजार से अधिक महिलाएं लखपति दीदी बन चुकी हैं, जबकि 31 लाख से अधिक महिलाएं स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी हैं। अगर इन आंकड़ों को व्यापक नजरिए से देखें तो यह केवल महिलाओं की आय बढ़ने का आंकड़ा नहीं है। यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ने का संकेत है। राज्य सरकार द्वारा ‘मुख्यमंत्री लखपति दीदी भ्रमण योजना’ के लिए 5 करोड़ रुपये का बजट प्रावधान भी इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। बेहतर उद्यमों को देखने, नई तकनीक समझने और सफल मॉडलों से सीखने का अवसर महिलाओं को अपने गांव से बाहर की कारोबारी दुनिया से जोड़ सकता है।
सबसे बड़ा बदलाव बैंक खाते से आगे है
‘लखपति दीदी’ अभियान की सफलता को केवल इस आधार पर नहीं मापा जाना चाहिए कि कितनी महिलाएं सालाना एक लाख रुपये कमा रही हैं। असली बदलाव उससे कहीं बड़ा है। जब महिला की अपनी आय होती है तो परिवार में उसके फैसलों की अहमियत बढ़ती है। बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य, घरेलू खर्च और भविष्य की बचत जैसे मामलों में उसकी भूमिका मजबूत होती है। आर्थिक आत्मनिर्भरता सामाजिक आत्मविश्वास को भी बढ़ाती है। यही वजह है कि स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं की बढ़ती आर्थिक भूमिका का असर ग्राम पंचायत और सामुदायिक निर्णयों तक दिखाई दे सकता है।
चुनौती अब ‘लखपति’ से ‘करोड़पति उद्यमी’ तक पहुंचने की
हालांकि यहां अगली चुनौती भी साफ दिखाई देती है। किसी महिला को एक लाख रुपये सालाना आय तक पहुंचाना पहला पड़ाव है। असली सफलता तब होगी जब ये महिलाएं अपने छोटे कारोबार को स्थायी और बड़े ग्रामीण उद्यम में बदल सकें। इसके लिए बाजार की स्थायी उपलब्धता, उत्पाद की गुणवत्ता, पैकेजिंग, ब्रांडिंग, डिजिटल मार्केटिंग, परिवहन और आसान वित्तीय व्यवस्था जरूरी होगी। केवल प्रशिक्षण देने से कारोबार लंबे समय तक नहीं चलता; बाजार से जोड़ना सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। इसलिए गरियाबंद की ‘लखपति दीदियों’ की कहानी को सिर्फ सरकारी योजना की सफलता के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह ग्रामीण भारत में आर्थिक शक्ति के बदलते समीकरण की कहानी है। एक समय जिन महिलाओं की मेहनत परिवार की चारदीवारी में दिखाई नहीं देती थी, वही महिलाएं आज आय पैदा कर रही हैं, कारोबार खड़ा कर रही हैं और ग्रामीण बाजार को नई दिशा दे रही हैं।
यही इस अभियान की सबसे बड़ी उपलब्धि है—महिला के हाथ में सिर्फ कमाई नहीं, बल्कि आर्थिक निर्णय की ताकत आना। गरियाबंद से उठती यह तस्वीर बताती है कि विकसित छत्तीसगढ़ की राह सिर्फ बड़े उद्योगों और निवेश से नहीं, बल्कि गांव की उन महिलाओं से भी होकर गुजरती है, जो अब अपने परिवार की आर्थिक रीढ़ बनने के साथ-साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था की नई उद्यमी शक्ति बन रही हैं।





