भारत में संतों की कमी कभी नहीं रही। कोई जंगल चला गया, कोई हिमालय में साधना करने लगा, किसी ने शास्त्र लिखे तो किसी ने मठ बनाए। लेकिन नीम करौली बाबा की कहानी इन सबसे कुछ अलग है। न कोई बड़ा मंच… न चमकदार प्रवचन… न अपने नाम का साम्राज्य। अक्सर कंबल ओढ़े नजर आने वाले बाबा को उनके भक्त प्यार से महाराजजी कहते थे। उनसे जुड़ी कई कहानियां आज भी कही जाती हैं। कुछ घटनाएं ऐसी हैं जिन्हें भक्त चमत्कार मानते हैं, जबकि उनके ऐतिहासिक प्रमाण अलग सवाल खड़े करते हैं। लेकिन इन सबके बीच उनकी सबसे बड़ी पहचान रही—प्रेम, सेवा और हनुमान भक्ति।
लक्ष्मण दास से नीम करौली बाबा तक
नीम करौली बाबा का असली नाम लक्ष्मण नारायण शर्मा बताया जाता है। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के अकबरपुर गांव में करीब 1900 के आसपास बताया जाता है। कम उम्र में विवाह हुआ और बाद में उन्होंने घर छोड़कर साधु जीवन अपना लिया। लेकिन उनका जीवन पूरी तरह गृहस्थी से कट जाने वाला नहीं था। एक दौर में वे वापस घर लौटे और गृहस्थ जीवन भी जिया। उनके दो बेटे और एक बेटी हुए। लोग उन्हें अलग-अलग नामों से जानते रहे—लक्ष्मण दास, नीब करौरी बाबा और महाराजजी। आगे चलकर नीम करौली बाबा नाम ही उनकी सबसे बड़ी पहचान बन गया।
ट्रेन वाली कहानी… और नाम की पहचान
बाबा के भक्तों में एक प्रसिद्ध कथा ट्रेन से जुड़ी है। कहा जाता है कि बिना टिकट यात्रा करने पर रेलवे कर्मचारियों ने उन्हें नीब करौरी के पास ट्रेन से उतार दिया। इसके बाद ट्रेन आगे नहीं बढ़ी। परंपरा के मुताबिक रेलवे अधिकारियों ने बाबा से दोबारा ट्रेन में बैठने का आग्रह किया और उनके बैठने के बाद ट्रेन चल पड़ी। इस घटना की ऐतिहासिक पुष्टि अलग विषय है, लेकिन इस कथा ने बाबा की लोकप्रिय छवि में एक महत्वपूर्ण जगह बनाई। नीब करौरी से जुड़ा नाम आगे चलकर दुनिया भर में नीम करौली बाबा के रूप में जाना जाने लगा।
उनका संदेश क्या था?
बाबा के आसपास की परंपरा में तीन शब्द बार-बार सामने आते हैं—
प्रेम… सेवा… भक्ति।
खासकर हनुमान भक्ति उनके जीवन और आश्रमों का केंद्रीय हिस्सा रही। लेकिन सेवा उनके लिए सिर्फ धार्मिक कर्मकांड नहीं थी। उनके अनुयायियों के अनुसार बाबा का संदेश था कि अगर ईश्वर को हर जगह देखना है, तो इंसान की सेवा भी उसी भावना से करनी होगी। यही वजह थी कि उनके पास आने वालों में अमीर-गरीब, भारतीय-विदेशी और अलग-अलग धर्मों से जुड़े लोग शामिल रहे।
फिर भारत आया एक अमेरिकी प्रोफेसर
1960 और 70 के दशक में पश्चिमी दुनिया में आध्यात्मिक खोज का दौर था। इसी दौर में अमेरिका से एक व्यक्ति भारत पहुंचा—रिचर्ड अलपर्ट। अलपर्ट हार्वर्ड विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान पढ़ा चुके थे और टिमोथी लेरी के साथ साइकेडेलिक ड्रग्स के प्रभावों पर प्रयोगों से जुड़े थे। विवादों के बाद हार्वर्ड से उनका रिश्ता खत्म हुआ और उनकी खोज उन्हें भारत तक ले आई। 1967 में भारत आने के बाद उनकी मुलाकात नीम करौली बाबा से हुई। यहीं रिचर्ड अलपर्ट को नया नाम मिला—राम दास। और यहीं से नीम करौली बाबा की कहानी भारत की पहाड़ियों से निकलकर पश्चिमी दुनिया तक पहुंचने लगी।
कुछ घंटे… और जिंदगी बदल गई
राम दास के अनुसार उन्होंने महाराजजी के आसपास नवंबर 1967 से मार्च 1968 के बीच समय बिताया। उनके साथ प्रत्यक्ष समय बहुत लंबा नहीं था, लेकिन प्रभाव बेहद गहरा रहा। आगे चलकर राम दास ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘Be Here Now’ लिखी, जो 1971 में प्रकाशित हुई। अमेरिका में उस समय एक पूरी पीढ़ी युद्ध, पारंपरिक मूल्यों और भौतिक जीवन से जुड़े सवालों से जूझ रही थी। ऐसे दौर में योग, ध्यान, भक्ति और भारतीय अध्यात्म पश्चिम के लिए आकर्षण का केंद्र बन रहे थे। ‘Be Here Now’ इसी आध्यात्मिक खोज की एक महत्वपूर्ण किताब बन गई।
और इस कहानी के पीछे थे—नीम करौली बाबा।
बाबा की असली ताकत—सेवा
बाबा के करीबी भक्तों में प्रोफेसर दादा मुखर्जी का नाम महत्वपूर्ण माना जाता है। उनके संस्मरणों में बाबा का एक सहज और मानवीय रूप सामने आता है। वे हंसते थे… मजाक करते थे… कभी डांटते थे… और कभी बिल्कुल घर के बुजुर्ग की तरह व्यवहार करते थे। भोजन और सेवा उनके जीवन में खास स्थान रखते थे। बाबा से जुड़ी परंपरा में यह भावना बार-बार आती है कि जो व्यक्ति सामने आया है, उसे खाली पेट वापस नहीं जाना चाहिए। यानी उनके लिए आध्यात्मिकता सिर्फ ध्यान में बैठना नहीं थी। भूखे को खाना खिलाना भी साधना थी।
स्टीव जॉब्स और नीम करौली बाबा
नीम करौली बाबा की कहानी जब आधुनिक दुनिया से जुड़ती है तो सबसे चर्चित नामों में से एक है—स्टीव जॉब्स। जॉब्स 1974 में भारत आए। वे आध्यात्मिक खोज में थे और नीम करौली बाबा से मिलने की इच्छा रखते थे। लेकिन जब वे भारत पहुंचे, तब तक बाबा 1973 में शरीर छोड़ चुके थे। यानी जॉब्स की बाबा से प्रत्यक्ष मुलाकात नहीं हुई। इसके बावजूद बाद के वर्षों में दोनों को जोड़कर कई कहानियां सामने आईं। मसलन, एप्पल के लोगो से लेकर जॉब्स की आध्यात्मिक यात्रा तक कई दावे किए जाते हैं। लेकिन इन दावों को प्रमाणित इतिहास मानना उचित नहीं है। इतना जरूर है कि जॉब्स की भारत यात्रा और उनकी आध्यात्मिक खोज उनके जीवन की चर्चित घटनाओं में रही।
मार्क जकरबर्ग और कैंची धाम
फिर आता है एक और बड़ा नाम—मार्क जकरबर्ग। जकरबर्ग ने बताया था कि स्टीव जॉब्स की सलाह पर उन्होंने उत्तराखंड के कैंची धाम की यात्रा की थी। यह यात्रा फेसबुक के मुश्किल दौर के बीच हुई थी और जकरबर्ग ने बाद में इसे अपने जीवन का महत्वपूर्ण अनुभव बताया। यहीं से कैंची धाम का नाम दुनिया की टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री के कुछ सबसे बड़े नामों के साथ जुड़ गया।
कैंची धाम—जहां पहाड़ और आस्था मिलते हैं
नैनीताल के पास स्थित कैंची धाम नीम करौली बाबा की सबसे प्रमुख पहचान बन चुका है। 1960 के दशक में यहां आश्रम और हनुमान मंदिर की स्थापना हुई। आज यह स्थान भारत ही नहीं, विदेशों से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए भी आस्था का बड़ा केंद्र है। और यहीं नीम करौली बाबा की कहानी का सबसे बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है। एक तरफ कंबल ओढ़े एक संत… दूसरी तरफ दुनिया बदलने वाली टेक्नोलॉजी कंपनियों के संस्थापक और उनके अनुयायी।
चमत्कारों से बड़ी उनकी विरासत
नीम करौली बाबा से जुड़ी ट्रेन रोकने, अचानक कहीं पहुंचने या मन की बात जान लेने जैसी कई कहानियां प्रचलित हैं। लेकिन किसी संत की विरासत को केवल चमत्कारों की कहानियों से मापना शायद अधूरा होगा। सवाल यह है कि दशकों बाद भी उनकी बात बची या नहीं? और यहां जवाब साफ दिखाई देता है। कैंची धाम आज भी श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। राम दास की किताबें दुनिया भर में पढ़ी जाती हैं। सेवा और भक्ति से जुड़ी उनकी परंपरा आगे बढ़ रही है।
कैंची की पहाड़ी से सिलिकॉन वैली तक
शायद नीम करौली बाबा की सबसे बड़ी कहानी यही है। उन्होंने लोगों को दुनिया छोड़ने की बात नहीं कही। उन्होंने दुनिया को देखने का नजरिया बदलने की बात की।
प्रेम को भावना नहीं, व्यवहार बनाइए।
सेवा को दान नहीं, साधना मानिए।
और भक्ति को सिर्फ पूजा नहीं, जीवन का हिस्सा बनाइए।
एक तरफ अमेरिका की चमचमाती सिलिकॉन वैली थी… और दूसरी तरफ उत्तराखंड की कैंची की पहाड़ियां। इन दोनों के बीच एक पुल बना—एक ऐसे संत के नाम से, जिसके पास न कोई कंपनी थी, न कोई पद, न कोई चमकदार मंच। था तो सिर्फ एक कंबल… हनुमान की भक्ति… और इंसान से प्रेम करने का संदेश। शायद यही नीम करौली बाबा की सबसे बड़ी ‘सिद्धि’ है।





