श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व 4 सितंबर, शुक्रवार को मनाया जाएगा। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप लड्डू गोपाल की पूजा के साथ व्रत रखने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं में कहा गया है कि श्रद्धा और नियमों के साथ व्रत करने से भगवान कृष्ण की कृपा प्राप्त होती है। खास बात यह है कि जन्माष्टमी के व्रत की तैयारी पर्व वाले दिन से नहीं, बल्कि सप्तमी तिथि से ही शुरू मानी जाती है। ऐसे में अगर आप भी इस बार व्रत रखने वाले हैं, तो खानपान से लेकर पूजा और पारण तक इन बातों का ध्यान रखें।
जन्माष्टमी से एक दिन पहले ही सात्विक भोजन शुरू करें और तामसिक चीजों से पूरी तरह दूरी बनाएं
जन्माष्टमी व्रत रखने वालों को सप्तमी तिथि से ही अपने खानपान में बदलाव करने की सलाह दी जाती है। इस दिन से मांसाहार, शराब, लहसुन और प्याज जैसी चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए। भोजन सात्विक रखने के साथ आचरण में भी संयम बनाए रखने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार सप्तमी के दिन बैंगन और मूली जैसी सब्जियों से भी परहेज करना उचित माना जाता है।
व्रत वाले दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और भगवान कृष्ण के नाम पर व्रत का संकल्प लें
4 सितंबर को व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को सुबह उठकर स्नान करना चाहिए और साफ कपड़े पहनने चाहिए। इसके बाद पूजा की तैयारी कर भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लिया जाता है। संकल्प के दौरान हाथ में जल और पुष्प लेकर निर्धारित मंत्र का जाप करने की परंपरा है। इसके बाद पूरे दिन भगवान कृष्ण के नाम का स्मरण करते हुए व्रत के नियमों का पालन करना चाहिए।
अपनी क्षमता के अनुसार फलाहार या निर्जला व्रत रखें और पूरे दिन मन को भगवान की भक्ति में लगाए रखें
जन्माष्टमी पर हर व्यक्ति अपनी क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार व्रत रख सकता है। कुछ श्रद्धालु फल और पानी का सेवन करते हुए फलाहार व्रत रखते हैं, जबकि कुछ लोग निर्जला उपवास करते हैं। दिनभर सात्विक विचार रखने और भगवान कृष्ण के मंत्रों का जाप करने की परंपरा है। शाम के समय भी स्नान करके पूजा की तैयारी करने की बात कही गई है।
सूर्यास्त के बाद भगवान के जन्म तक संयम रखें और मध्य रात्रि की पूजा के लिए पहले से पूरी तैयारी कर लें
जन्माष्टमी पर भगवान कृष्ण का जन्म मध्य रात्रि में होने की मान्यता है। दिए गए नियमों के अनुसार, व्रत रखने वाले श्रद्धालु सूर्यास्त के बाद से कृष्ण जन्म तक निर्जल रहने का पालन करते हैं। इस दौरान भजन, कीर्तन और भगवान कृष्ण का स्मरण किया जाता है। मध्य रात्रि में जन्म के समय लड्डू गोपाल की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है और उन्हें भोग लगाया जाता है।
कृष्ण जन्म के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देने के साथ व्रत पूरा करें और फिर पारण की परंपरा निभाएं
भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के बाद पूजा संपन्न करने की परंपरा है। इसके बाद चंद्रमा के दर्शन करके उन्हें अर्घ्य दिया जाता है। अर्घ्य देने के बाद व्रत खोलने यानी पारण की प्रक्रिया शुरू होती है। अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में जन्माष्टमी व्रत के नियमों में कुछ अंतर हो सकता है, इसलिए अपनी परंपरा के अनुसार पूजा और पारण करना उचित माना जाता है।
नोट: जन्माष्टमी व्रत और पूजा से जुड़े नियम धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित हैं। इन्हें निश्चित धार्मिक तथ्य या भविष्यवाणी के रूप में न लें।





