रूस की 5 लाख सैनिकों की तैयारी—क्या यूक्रेन युद्ध अब ‘लंबी जंग’ की ओर?
रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की का यह दावा बेहद महत्वपूर्ण है कि रूस सितंबर 2026 के संसदीय चुनावों के बाद 3 लाख अतिरिक्त सैनिकों की भर्ती/लामबंदी की तैयारी कर रहा है और 2027 तक यह संख्या बढ़कर 5 लाख तक पहुंच सकती है। यह दावा अभी रूस की ओर से आधिकारिक रूप से पुष्ट नहीं हुआ है, इसलिए इसे रूस की घोषित नीति नहीं बल्कि यूक्रेन का आकलन मानना जरूरी है। लेकिन अगर यह आकलन सही साबित होता है, तो इसका अर्थ सिर्फ सैनिकों की संख्या बढ़ाना नहीं होगा। यह संकेत होगा कि मॉस्को युद्ध को जल्द खत्म करने के बजाय लंबे समय तक चलने वाले सैन्य संघर्ष के लिए अपनी मानव-शक्ति और उत्पादन क्षमता तैयार कर रहा है।
1. 3 लाख से 5 लाख—आंकड़ा क्यों महत्वपूर्ण है?
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पहले से ही युद्ध के लिए बड़ी संख्या में सैनिकों की भर्ती कर रहे हैं।। नई योजना का कथित पैमाना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि 3 लाख अतिरिक्त सैनिक किसी छोटे सैन्य सुदृढ़ीकरण के बराबर नहीं हैं। जेलेंस्की के मुताबिक, सितंबर के मध्य में होने वाले रूसी संसदीय चुनावों के बाद यह प्रक्रिया तेज हो सकती है और 2027 में अतिरिक्त भर्ती के साथ कुल लक्ष्य 5 लाख तक पहुंच सकता है। रूस के संसदीय चुनाव 18 से 20 सितंबर 2026 के बीच निर्धारित हैं।
यहां चुनाव की टाइमिंग राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। यदि मॉस्को वास्तव में बड़े पैमाने पर लामबंदी करना चाहता है, तो चुनाव के बाद का समय घरेलू स्तर पर संदेश और राजनीतिक प्रबंधन के लिहाज से अधिक सुविधाजनक हो सकता है।
2. ‘पेरिफेरल मोबिलाइजेशन’ का मतलब क्या?
जेलेंस्की ने इसे ‘पेरिफेरल मोबिलाइजेशन’ बताया है। यानी संभावित भर्ती का भार मॉस्को और सेंट पीटर्सबर्ग जैसे बड़े शहरों के बजाय रूस के दूरदराज और क्षेत्रीय इलाकों पर अधिक डाला जा सकता है।
यह रणनीति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बड़े शहरों में व्यापक लामबंदी सामाजिक और राजनीतिक प्रतिक्रिया पैदा कर सकती है। इसके विपरीत छोटे शहरों और दूरस्थ क्षेत्रों से क्रमिक भर्ती को अपेक्षाकृत कम दिखाई देने वाले तरीके से संचालित किया जा सकता है। इस मॉडल का लक्ष्य सिर्फ सैनिक जुटाना नहीं होगा, बल्कि राजधानी और बड़े शहरी केंद्रों पर सामाजिक दबाव को सीमित रखते हुए युद्ध के लिए मानव संसाधन जुटाना हो सकता है। हालांकि यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि यह Zelenskyy का आकलन है; स्वतंत्र रूप से इस कथित 5 लाख के लक्ष्य की पुष्टि उपलब्ध रिपोर्ट में नहीं हुई है।
3. असली सवाल—रूस को इतने सैनिकों की जरूरत क्यों?
इसका सबसे सीधा जवाब है—युद्ध की वर्तमान प्रकृति। रूस पूर्वी यूक्रेन के डोनबास क्षेत्र में आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है और यूक्रेन लगातार रूसी सैनिकों को भारी नुकसान पहुंचने का दावा कर रहा है। जेलेंस्की ने भी कहा है कि रणनीतिक शहरों की दिशा में रूसी अभियान में बड़ी संख्या में सैनिकों का नुकसान हो रहा है।
ऐसे युद्ध में जमीन पर कब्जे के लिए सिर्फ आधुनिक हथियार पर्याप्त नहीं होते। सैनिकों को अग्रिम मोर्चे पर तैनात करना, रिजर्व तैयार रखना, घायल सैनिकों को बदलना और कब्जाए क्षेत्रों में सैन्य उपस्थिति बनाए रखना—इन सभी के लिए लगातार मानव-बल चाहिए। इसलिए 3 लाख की संभावित भर्ती को रूस की ‘मैनपावर स्ट्रैटेजी’ के रूप में देखना अधिक उचित होगा।
4. युद्ध अब सिर्फ सैनिकों की संख्या का खेल नहीं
लेकिन यहां एक बड़ा सवाल है—क्या 5 लाख सैनिक जुटा लेना रूस को निर्णायक जीत दिला देगा? जरूरी नहीं। आधुनिक रूस-यूक्रेन युद्ध में ड्रोन, मिसाइल, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर, आर्टिलरी, एयर डिफेंस और खुफिया क्षमता उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितनी सैनिकों की संख्या। इसी रिपोर्ट में जेलेंस्की ने दावा किया कि रूस अपनी बैलिस्टिक मिसाइल उत्पादन क्षमता को सालाना 1,300 मिसाइलों तक ले जाने की दिशा में काम कर रहा है। दूसरी ओर यूक्रेन अमेरिकी निर्मित Patriot इंटरसेप्टर की कमी से जूझ रहा है। यानी रूस की कथित रणनीति तीन स्तरों पर दिखाई देती है— मानव-बल + मिसाइल उत्पादन + ड्रोन/लंबी दूरी के हमले। अगर ये तीनों समानांतर बढ़ते हैं, तो युद्ध की तीव्रता और अवधि दोनों बढ़ सकती हैं।
5. यूक्रेन के सामने दोहरी चुनौती
यूक्रेन की समस्या केवल रूसी सैनिकों की संभावित नई लहर नहीं है। एक तरफ उसे अग्रिम मोर्चे पर रूसी दबाव का सामना करना है, दूसरी तरफ शहरों और ऊर्जा ढांचे को मिसाइल और ड्रोन हमलों से बचाना है। जेलेंस्की ने आने वाली सर्दियों में ऊर्जा ढांचे पर संभावित रूसी हमलों की चिंता जताई है और करीब 360 मिसाइल इंटरसेप्टर की जरूरत बताई है। उन्होंने यह भी कहा कि यूक्रेन को 2026 में लगभग 27 अरब डॉलर के रक्षा वित्तीय अंतर का सामना करना पड़ रहा है।
इसका अर्थ है कि युद्ध अब सिर्फ मैदान पर नहीं लड़ा जा रहा। यह अर्थव्यवस्था, ऊर्जा, हथियार उत्पादन और वित्तीय सहायता की भी लड़ाई बन चुका है।
6. रूस के लिए भी 5 लाख सैनिक जुटाना आसान नहीं
इस पूरे दावे का दूसरा पहलू रूस की अपनी क्षमता है। सैनिकों की भर्ती का अर्थ केवल लोगों को सेना में शामिल करना नहीं है। हर नए सैनिक के लिए प्रशिक्षण, हथियार, वर्दी, भोजन, परिवहन, आवास, चिकित्सा सुविधा और वेतन चाहिए। युद्ध के दौरान बड़ी संख्या में सैनिक जुटाने से रूस के सरकारी बजट पर भी दबाव बढ़ेगा। यदि भर्ती के लिए आर्थिक प्रोत्साहन बढ़ाए जाते हैं तो सैन्य खर्च और सामाजिक खर्च के बीच संतुलन चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इसलिए 5 लाख सैनिकों की संभावित लामबंदी रूस की सैन्य ताकत के साथ-साथ उसकी आर्थिक सहनशक्ति की भी परीक्षा होगी।
7. भारत के लिए इसका क्या मतलब?
रूस की संभावित नई लामबंदी का असर भारत पर प्रत्यक्ष सैन्य खतरे के रूप में नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और रणनीतिक समीकरण के माध्यम से अधिक दिखाई दे सकता है। लंबा युद्ध तेल, गैस, खाद्य वस्तुओं, शिपिंग, हथियार बाजार और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर असर डाल सकता है। भारत-रूस संबंधों के लिहाज से भी घटनाक्रम महत्वपूर्ण है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर 23-24 अगस्त को रूस की यात्रा पर हैं, जहां भारत-रूस अंतर-सरकारी आयोग की बैठक सहित द्विपक्षीय आर्थिक, तकनीकी और रणनीतिक सहयोग पर चर्चा हो रही है।
ऐसे समय में भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण रणनीति होगी—रूस के साथ रणनीतिक संबंध बनाए रखना, लेकिन युद्ध के बढ़ते वैश्विक आर्थिक प्रभावों से अपने हितों को सुरक्षित रखना।
8. सबसे बड़ा संकेत—मॉस्को शायद ‘लंबी जंग’ के लिए तैयार हो रहा है। यदि Zelenskyy का दावा सही साबित होता है, तो सबसे बड़ा संदेश यह होगा कि रूस युद्ध को समाप्त करने के लिए केवल कूटनीतिक रास्ते पर निर्भर नहीं है । बल्कि वह सैन्य क्षमता को और बढ़ाकर 2027 तक युद्ध लड़ने की तैयारी कर रहा है। यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे गंभीर पहलू है। 3 लाख की संभावित नई भर्ती और 5 लाख तक पहुंचने का लक्ष्य रूस की तरफ से यह संकेत दे सकता है कि क्रेमलिन मानता है कि यूक्रेन के खिलाफ निर्णायक सैन्य परिणाम हासिल करने के लिए अभी और समय, सैनिक और संसाधन लगेंगे।
रूस की कथित 3 लाख सैनिकों की नई भर्ती को केवल ‘नई लामबंदी’ के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसके पीछे एक व्यापक रणनीति दिखाई देती है—अग्रिम मोर्चे पर दबाव, दूरदराज क्षेत्रों से मानव-बल, मिसाइल उत्पादन में वृद्धि और यूक्रेन के ऊर्जा ढांचे पर दबाव।
लेकिन फिलहाल सबसे जरूरी सावधानी यही है कि 5 लाख सैनिकों की योजना रूस की आधिकारिक रूप से घोषित नीति नहीं है। यह यूक्रेनी राष्ट्रपति का आकलन है और स्वतंत्र पुष्टि का इंतजार है। अगर यह योजना वास्तविक रूप लेती है, तो रूस-यूक्रेन युद्ध का चरित्र और अधिक दीर्घकालिक, संसाधन-प्रधान और औद्योगिक युद्ध में बदल सकता है। ऐसे में 2027 केवल अगला साल नहीं होगा—बल्कि यह तय करने वाला महत्वपूर्ण दौर बन सकता है कि युद्ध सैन्य दबाव से किस दिशा में जाता है और क्या किसी टिकाऊ राजनीतिक समाधान की गुंजाइश बनती है।





