राहुल गांधी का मनुस्मृति को लेकर दिया गया बयान एक बार फिर उस बहस को सामने ले आया है, जो भारतीय राजनीति में लंबे समय से मौजूद है—मनुस्मृति वास्तव में क्या कहती है और उसमें महिलाओं की स्थिति कैसी बताई गई है? पुणे में छात्रों से संवाद के दौरान राहुल गांधी ने महिलाओं की स्वतंत्रता और समानता पर बात करते हुए मनुस्मृति के एक प्रसिद्ध श्लोक का हवाला दिया। उनका तर्क था कि भारतीय समाज में महिलाओं को पुरुषों के रिश्तों के आधार पर परिभाषित करने वाली सोच को चुनौती देने की जरूरत है।
राहुल गांधी ने जिस कथन का उल्लेख किया, उसका भावार्थ यह है कि बचपन में महिला पिता के संरक्षण में, युवावस्था में पति के संरक्षण में और पति की मृत्यु के बाद पुत्रों के संरक्षण में रहती है तथा उसे स्वतंत्र नहीं होना चाहिए। इस कथन को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर तीखी बहस स्वाभाविक है। लेकिन इस विषय को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि संबंधित श्लोक का मूल संदर्भ क्या है और मनुस्मृति को इतिहास में किस तरह समझा गया है।
मनुस्मृति क्या है?
मनुस्मृति को सामान्यतः मनव धर्मशास्त्र या Manusmriti के नाम से जाना जाता है। यह संस्कृत में रचित एक प्राचीन धर्मशास्त्रीय ग्रंथ है, जिसमें सामाजिक आचार, कर्तव्य, विवाह, परिवार, राजा, दंड, उत्तराधिकार और विभिन्न सामाजिक नियमों से संबंधित प्रावधान मिलते हैं।
इसके रचनाकाल को लेकर इतिहासकारों में पूरी तरह एकमत नहीं है। सामान्यतः इसे ईसा पूर्व की अंतिम शताब्दियों से लेकर ईस्वी की शुरुआती शताब्दियों के बीच विकसित धर्मशास्त्रीय परंपरा से जोड़ा जाता है। आज उपलब्ध पाठ अलग-अलग संस्करणों और पांडुलिपि परंपराओं के आधार पर संख्या में भी भिन्न हो सकते हैं। इसलिए यह कहना कि इसके श्लोकों की संख्या हर संस्करण में बिल्कुल समान है, सही नहीं होगा।
महिलाओं के बारे में क्या कहा गया?
मनुस्मृति का सबसे अधिक उद्धृत श्लोकों में से एक अध्याय 9 का श्लोक 3 है, जिसमें महिला के जीवन को पिता, पति और पुत्र के संरक्षण से जोड़ा गया है। इसका सामान्य भावार्थ यही है कि महिला को स्वतंत्र रूप से नहीं रहने देना चाहिए और उसके जीवन के अलग-अलग चरणों में पुरुष अभिभावक की भूमिका बताई गई है।
यही वह आधार है जिसके कारण आलोचक मनुस्मृति को महिलाओं की स्वतंत्रता के विरुद्ध मानते हैं। आधुनिक लोकतांत्रिक और लैंगिक समानता के नजरिए से देखें तो यह विचार स्पष्ट रूप से आज की संवैधानिक अवधारणा—व्यक्ति की स्वतंत्रता और समान अधिकार—से टकराता है।
इसलिए यदि राहुल गांधी इस श्लोक को महिलाओं की स्वतंत्रता पर प्राचीन सामाजिक दृष्टिकोण का उदाहरण बताते हैं, तो उसका मूल पाठ में आधार मौजूद है। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी भी जरूरी है—मनुस्मृति के पूरे ग्रंथ को केवल एक श्लोक के आधार पर समझना भी उचित नहीं होगा।
क्या मनुस्मृति में स्त्री सम्मान की बात भी है?
यही इस बहस का दूसरा पक्ष है। मनुस्मृति के तीसरे अध्याय में प्रसिद्ध श्लोक मिलता है—
“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।”
इसका सामान्य अर्थ है कि जहां महिलाओं का सम्मान होता है, वहां देवताओं का वास माना जाता है।
इसी तरह आगे के श्लोकों में परिवार और महिलाओं के सम्मान को लेकर सकारात्मक बातें भी मिलती हैं। इसलिए मनुस्मृति में महिलाओं के बारे में केवल एक ही प्रकार की धारणा मौजूद है, ऐसा कहना ग्रंथ के व्यापक स्वरूप को सरल बना देना होगा।
लेकिन यहां भी एक महत्वपूर्ण अंतर है। स्त्री का सम्मान और स्त्री की स्वतंत्रता दो अलग अवधारणाएं हैं। किसी ग्रंथ में महिला के सम्मान की बात होना अपने आप यह सिद्ध नहीं करता कि उसे आधुनिक अर्थों में स्वतंत्रता, समान नागरिक अधिकार या व्यक्तिगत स्वायत्तता भी प्राप्त थी।
फिर राहुल गांधी का दावा कितना सही?
राहुल गांधी द्वारा उद्धृत विचार मनुस्मृति के एक प्रसिद्ध श्लोक के भावार्थ से मेल खाता है। इसलिए यह कहना कि उन्होंने बिल्कुल काल्पनिक बात कही, उचित नहीं होगा। लेकिन राजनीतिक बहस में किसी प्राचीन ग्रंथ के एक उद्धरण को पूरे ग्रंथ या पूरे भारतीय समाज की अंतिम तस्वीर के रूप में प्रस्तुत करना भी ऐतिहासिक रूप से सावधानी मांगता है।
मनुस्मृति स्वयं कोई आधुनिक संविधान नहीं थी। यह धर्मशास्त्रीय साहित्य की एक रचना थी और भारतीय इतिहास में सामाजिक नियमों के अनेक स्रोत रहे हैं। अलग-अलग कालखंडों, क्षेत्रों और समुदायों में व्यवहारिक सामाजिक व्यवस्था हमेशा किसी एक ग्रंथ के अनुसार नहीं चली।
मनुस्मृति राजनीति में क्यों आती है?
मनुस्मृति का राजनीतिक महत्व केवल उसके ऐतिहासिक पाठ में नहीं, बल्कि आधुनिक भारत में उसके प्रतीकात्मक अर्थ में भी है। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने जाति व्यवस्था और सामाजिक असमानता की आलोचना करते हुए मनुस्मृति को ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था के प्रतीक के रूप में देखा। 1927 में महाड़ में मनुस्मृति दहन का आयोजन इसी वैचारिक संघर्ष का महत्वपूर्ण प्रतीक बना।
इसके बाद मनुस्मृति भारतीय राजनीति में सामाजिक न्याय, जाति व्यवस्था, महिला अधिकार और हिंदू सामाजिक परंपरा को लेकर होने वाली बहसों में बार-बार सामने आती रही है।
यही वजह है कि जब कोई बड़ा राजनीतिक नेता मनुस्मृति का उल्लेख करता है तो बहस केवल एक प्राचीन ग्रंथ की व्याख्या तक सीमित नहीं रहती। इसके साथ जाति, लैंगिक समानता, सामाजिक न्याय और संविधान बनाम पारंपरिक व्यवस्था जैसे बड़े राजनीतिक सवाल जुड़ जाते हैं।
आधा सच नहीं, पूरा संदर्भ जरूरी
मनुस्मृति में महिलाओं को पिता, पति और पुत्र के संरक्षण से जोड़ने वाला श्लोक मौजूद है। आधुनिक स्वतंत्रता और समानता के मानकों से इस विचार पर सवाल उठना स्वाभाविक है। दूसरी ओर, उसी ग्रंथ में महिलाओं के सम्मान की बात करने वाले श्लोक भी मौजूद हैं। इसलिए इस पूरे विवाद को “मनुस्मृति महिलाओं के खिलाफ थी” या “मनुस्मृति महिलाओं का सम्मान करती थी”—इन दो सरल निष्कर्षों में बांटना इतिहास को अत्यधिक सरल बना देगा।
असल बात यह है कि मनुस्मृति में महिलाओं के बारे में सम्मान, संरक्षण, पारिवारिक भूमिका और स्वतंत्रता को लेकर अलग-अलग प्रकार के कथन मिलते हैं। आधुनिक भारत का संविधान इससे अलग आधार पर नागरिकों को समानता और स्वतंत्रता देता है। इसलिए राहुल गांधी के बयान की तथ्यात्मक जांच करते समय संबंधित श्लोक का मूल पाठ देखना जरूरी है, लेकिन उतना ही जरूरी है पूरे ग्रंथ और उसके ऐतिहासिक संदर्भ को समझना। राजनीतिक बहस में मनुस्मृति का इस्तेमाल जितना भावनात्मक है, उतना ही यह इतिहास और संविधान के बीच अंतर समझने का विषय भी है।





