भारत की राजधानी नई दिल्ली के भारत मंडपम् में आयोजित ब्रिक्स देशों के
पर्यावरण मंत्रियों की बैठक के कई मायने हैं। इस बैठक से साबित होता है कि
ब्रिक्स संगठन सिर्फ आर्थिक सहयोग और सहभागिता का मंच नहीं है। बल्कि
पर्यावरण और सतत विकास के अपने मानदंडों की बुनियाद पर एकजुट होकर
न्यायसंगत, व्यावहारिक और संतुलित वैश्विक पर्यावरण व्यवस्था बनाने की
ओर आगे बढ़ रहे हैं।
भारत की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण
अफ्रीका, संयुक्त अरब अमीरात, इंडोनेशिया, ईरान, सऊदी अरब, मिस्र और
इथियोपिया के पर्यावरण और जलवायु मंत्री तथा वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए।
साफ है कि सदस्य देश अपने पर्यावरण के लिए चिंतित भी हैं। सदस्य देशों की
भागीदारी और उनकी मुखरता के चलते स्पष्ट हो गया है कि आने वाले दिनों में
ब्रिक्स और मजबूती से उभरेगा।
बारहवें ब्रिक्स पर्यावरण मंत्रियों के सम्मेलन में सिर्फ ब्रिक्स देशों के पर्यावरण
मंत्री ही नहीं, बल्कि सदस्य देशों के वरिष्ठ अधिकारी, नीति निर्माता और विशेषज्ञ
भी शामिल हुए और उन्होंने पर्यावरण के मोर्चे पर दिख रही वैश्विक चुनौतियों के
समाधान की दिशा में सार्थक चर्चा के जरिए पर्यावरण सहयोग के मोर्चे पर आम
सहमति बनाने का प्रयास किया। इस सम्मेलन की अध्यक्षता भार के पर्यावरण,
वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने की। भारत की अध्यक्षता में
ब्रिक्स का साल 2026 का विषय है ‘लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के
लिए निर्माण’। जाहिर है कि पर्यावरण मंत्रियों की बैठक में इसी मुद्दे पर पूरी
चर्चाएं हुईं।
ब्रिक्स पर्यावरण मंत्रियों की बैठक को संबोधित करते हुए भूपेंद्र यादव ने सतत
विकास की अवधारणा की महत्ता पर जोर दिया। भारत ने जो विचार जाहिर किया,
कमोबेश पूरे ब्रिक्स संगठन का यही विचार है। जिसका मानना है कि ऐसी सतत
पृथ्वी के विकास की दिशा में काम किया जाए, जिसमें मानवता प्रधान हो और
इसके लिए नीति, प्रौद्योगिकी और जनभागीदारी में समन्वय हो।
ब्रिक्स के पर्यावरण मंत्रियों की बैठक में खुले, रचनात्मक और सर्वसम्मति-
आधारित संवाद को बढ़ावा देने की दिशा में काम करने पर जोर दिया गया। इस दौरान पर्यावरण पर केंद्रित चार ज्ञान संकलनों का लोकार्पण किया गया।
(लेखक— उमेश चतुर्वेदी)





