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13% बारिश की कमी… क्या मानसून ने बदली चाल? सूखी हवाओं के बीच सितंबर पर टिकी उम्मीद

DigitalDesk by DigitalDesk
August 19, 2026
in कृषि
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rainfall deficit Has the monsoon changed course Hopes
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देश में मानसून अब अपने सबसे अहम पड़ाव पर है… लेकिन मौसम के बदलते मिजाज ने नई चिंता खड़ी कर दी है। इस बार अब तक देश में सामान्य से करीब 13 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई है। अगस्त के मध्य में उत्तर-पश्चिम भारत की तरफ बढ़ती सूखी हवाओं ने संकेत दिए हैं कि मानसून की रफ्तार कुछ धीमी पड़ सकती है। सवाल है… क्या ये मानसून  की विदाई की शुरुआत है? क्या बारिश का सीजन अब कमजोर पड़ गया है? या फिर बंगाल की खाड़ी से उठने वाले नए सिस्टम सितंबर से पहले बारिश की कमी को पूरा कर सकते हैं?  क्योंकि भारत की खेती, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और जल संसाधन… तीनों की उम्मीद अब अगस्त के बचे हुए दिनों और सितंबर की बारिश पर टिकी है।

मानसून की रफ्तार क्यों पड़ी धीमी?

देश में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की शुरुआत के बाद से अब तक बारिश का आंकड़ा सामान्य से करीब 13 फीसदी पीछे चल रहा है। हालांकि यह कमी पूरे देश में समान नहीं है। कुछ इलाकों में मॉनसून ने शानदार प्रदर्शन किया है, खासकर पश्चिम और मध्य भारत के कई हिस्सों में बारिश सामान्य के आसपास रही है। लेकिन उत्तर भारत के मैदानी इलाकों, पूर्वोत्तर राज्यों और दक्षिणी प्रायद्वीपीय क्षेत्रों के कई हिस्सों में बारिश का घाटा चिंता बढ़ा रहा है। अगस्त का दूसरा पखवाड़ा मॉनसून के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी दौरान बनने वाले कम दबाव के क्षेत्र और डिप्रेशन देश के बड़े हिस्से में बारिश पहुंचाते हैं। लेकिन इस बार उत्तर-पश्चिम भारत में सूखी हवाओं का प्रभाव बढ़ने लगा है। ये सूखी हवाएं वातावरण में नमी को कम करती हैं। जब नमी कम होती है तो बादलों के बनने की प्रक्रिया कमजोर पड़ती है और बारिश की गतिविधियां घट सकती हैं।

विदाई शुरू हो गई है क्या मॉनसून की

मौसम में बदलाव को देखकर कई लोगों के मन में सवाल है कि क्या मॉनसून अब लौटने लगा है? है। कमजोर पड़ना और मॉनसून की आधिकारिक विदाई… दोनों अलग-अलग घटना हैं। मौसम विभाग के अनुसार उत्तर-पश्चिम भारत से मॉनसून की वापसी आमतौर पर सितंबर के आसपास शुरू होती है। इसके लिए लगातार कई दिनों तक बारिश की गतिविधियों का खत्म होना, हवा के पैटर्न में बदलाव और एंटी-साइक्लोनिक परिस्थितियों का बनना जरूरी होता है। इसलिए अगस्त में सूखी हवाओं का असर दिखना सिर्फ मॉनसून के कमजोर चरण का संकेत है। इसे अभी मॉनसून की वापसी नहीं माना जा सकता।

सूखी हवाएं क्यों बढ़ा रही हैं चिंता?

मॉनसून पूरी तरह नमी पर निर्भर प्रणाली है। समुद्र से आने वाली नम हवाएं जब जमीन तक पहुंचती हैं तो बादल बनते हैं और बारिश होती है। लेकिन जब उत्तर-पश्चिम से सूखी हवाओं का दबाव बढ़ता है तो वातावरण की नमी कम होने लगती है। इसका सीधा असर बारिश की तीव्रता पर पड़ता है। यही कारण है कि मौसम वैज्ञानिक उत्तर-पश्चिम भारत में सूखी हवाओं की एंट्री को मॉनसून ब्रेक के संकेत के तौर पर देख रहे हैं। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि बारिश खत्म हो गई है। मॉनसून अभी सक्रिय है और बंगाल की खाड़ी में बनने वाले नए सिस्टम कभी भी इसकी रफ्तार बढ़ा सकते हैं।

बंगाल की खाड़ी दे सकती है नई उम्मीद

मॉनसून की सबसे बड़ी ताकत बंगाल की खाड़ी में बनने वाले कम दबाव के क्षेत्र और  डिप्रेशन होते हैं। जब बंगाल की खाड़ी में मजबूत सिस्टम बनते हैं तो वे पूर्वी भारत से होते हुए मध्य भारत, उत्तर भारत और कई अन्य हिस्सों तक बारिश पहुंचाते हैं। हाल के दिनों में बंगाल की खाड़ी में बने डीप डिप्रेशन ने ओडिशा, पश्चिम बंगाल, झारखंड और आसपास के राज्यों में बारिश की गतिविधियां बढ़ाई हैं। यही सिस्टम मॉनसून की कमी को कम करने की सबसे बड़ी उम्मीद बने हुए हैं। अगर अगस्त के आखिरी दिनों और सितंबर की शुरुआत में ऐसे सिस्टम लगातार बनते रहे, तो बारिश के मौजूदा घाटे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

13 फीसदी बारिश की कमी कितनी बड़ी चिंता?

सवाल ये है कि आखिर 13 फीसदी कम बारिश का मतलब क्या है? भारत जैसे कृषि प्रधान देश में मॉनसून सिर्फ मौसम नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था का आधार है।

पहला असर — खेती पर

खरीफ फसलों के लिए अगस्त और सितंबर की बारिश बेहद अहम होती है। धान, सोयाबीन, कपास, मक्का और अन्य फसलों को इस समय पर्याप्त नमी की जरूरत होती है। अगर बारिश कम रहती है तो मिट्टी की नमी घट सकती है और फसलों की उत्पादकता प्रभावित हो सकती है।

दूसरा असर — जल संसाधनों पर

कम बारिश का असर जलाशयों, बांधों और भूजल स्तर पर पड़ सकता है। बारिश कम होने से गर्मियों में पानी की उपलब्धता को लेकर चुनौती बढ़ सकती है।

तीसरा असर — ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर

किसानों की आय सीधे उत्पादन से जुड़ी होती है। अगर उत्पादन प्रभावित होता है तो ग्रामीण बाजार, कृषि आधारित उद्योग और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ सकता है।

किन राज्यों पर सबसे ज्यादा नजर?

मॉनसून की असली तस्वीर सिर्फ राष्ट्रीय औसत से नहीं समझी जा सकती। कुछ राज्यों में सामान्य बारिश हो सकती है, लेकिन उसी राज्य के दूसरे हिस्से में बारिश की भारी कमी हो सकती है। फिलहाल सबसे ज्यादा नजर उन क्षेत्रों पर है जहां बारिश का घाटा बना हुआ है।

  • उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्र
  • पूर्वोत्तर भारत
  • दक्षिणी प्रायद्वीपीय इलाके
  • बारिश की कमी वाले कृषि क्षेत्र

वहीं मध्य भारत के कई हिस्सों में आने वाले दिनों की बारिश बेहद महत्वपूर्ण होगी।

क्या सितंबर बचा पाएगा मानसून?

मॉनसून का सीजन सितंबर के अंत तक चलता है। इतिहास बताता है कि अगस्त के आखिरी हिस्से और सितंबर में कई बार मॉनसून अचानक सक्रिय हुआ है और बारिश की कमी काफी हद तक कम हुई है। इसलिए अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि इस साल बारिश का घाटा पूरा नहीं होगा। लेकिन चुनौती भी कम नहीं है। अगर आने वाले हफ्तों में बंगाल की खाड़ी में पर्याप्त सिस्टम नहीं बनते और सूखी हवाओं का प्रभाव बढ़ता रहता है, तो 13 फीसदी की कमी को पाटना मुश्किल हो सकता है।

सबसे बड़ा सवाल — आगे क्या होगा?

फिलहाल मॉनसून एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। एक तरफ उत्तर-पश्चिम भारत में सूखी हवाएं मॉनसून की रफ्तार धीमी कर रही हैं। दूसरी तरफ बंगाल की खाड़ी से आने वाले सिस्टम अभी भी उम्मीद बनाए हुए हैं। यानी तस्वीर अभी पूरी तरह साफ नहीं है। अगले 15 से 30 दिन यह तय करेंगे कि देश बारिश की कमी से उबर पाएगा या नहीं। फिलहाल मॉनसून खत्म नहीं हुआ है… लेकिन उसकी परीक्षा जरूर शुरू हो गई है। अगस्त की बाकी बारिश और सितंबर के बादल तय करेंगे कि इस साल का मानसून राहत देगा या चिंता बढ़ाएगा।

Tags: #13% deficit in rainfall #Has the monsoon changed its course? #Hopes pinned on September amidst dry winds.
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