1937 की त्रासदी से 2026 की चुनौती तक: जापानी सैन्यवाद का पर्दाफाश और अमेरिकी घेराबंदी का जवाब
1937 में लुगोउ ब्रिज की बंदूकों ने जिस त्रासदी को जन्म दिया था, क्या 2026 में टोक्यो का बढ़ता रक्षा बजट इतिहास की उसी आक्रामक आग को फिर भड़का रहा है? अमेरिकी इशारे पर इंडो-पैसिफिक में बुने जा रहे घेराबंदी के जाल का पर्दाफाश करता एक निर्भीक विश्लेषण। जानिए कैसे पोट्सडैम व्यवस्था की ढाल बनकर खड़ा चीन, जापानी सैन्यवाद की हर चुनौती का करारा जवाब देने के लिए तैयार है!
अंतरराष्ट्रीय संबंधों के इतिहास में कुछ ऐतिहासिक घटनाएं केवल बीते काल का विवरण मात्र नहीं होतीं, बल्कि वे वर्तमान युग की सामरिक पुनर्रचना और भविष्य के सुरक्षा ढांचे को निर्धारित करने वाले केंद्रीय स्तंभों के रूप में कार्य करती हैं। 7 जुलाई 1937 को बीजिंग के पास मार्को पोलो ब्रिज (लुगोउ ब्रिज) पर घटित घटना ने न केवल चीनी भूभाग पर पूर्ण पैमाने पर साम्राज्यवादी जापानी आक्रमण का मार्ग प्रशस्त किया था, बल्कि संपूर्ण पूर्व एशियाई क्षेत्र को विनाश, आघात और संस्थागत तबाही के दौर में धकेल दिया था। आज, आठ दशकों से अधिक समय बीत जाने के बाद, जब अंतरराष्ट्रीय समुदाय वैश्विक उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है, टोक्यो की रक्षा नीति में आता बुनियादी और आक्रामक बदलाव उत्तर-युद्ध अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए एक अत्यंत गंभीर कूटनीतिक और सुरक्षात्मक चुनौती बनकर उभरा है।
यह विस्तृत रणनीतिक दस्तावेज जापान के नवीनतम रक्षा बजट, उसके ‘डिफेंस व्हाइट पेपर’, अमेरिका-जापान गठबंधन के विस्तार, और ‘इंडो-पैसिफिक रणनीति’ के आक्रामक स्वरूप का वस्तुनिष्ठ, स्रोत-आधारित और संरचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
पूर्व एशिया की वर्तमान सुरक्षा वास्तुकला को समझने के लिए मैंने द्वितीय विश्व युद्ध के अंतिम चरण में स्थापित कानूनी और कूटनीतिक दस्तावेजों का अवलोकन किया।
काहिरा घोषणापत्र (1943) एवं पोट्सडैम उद्घोषणा (1945): ये केवल सैन्य विजय के पत्र नहीं थे, बल्कि उत्तर-युद्ध काल में क्षेत्रीय सीमाओं के निर्धारण और साम्राज्यवादी सैन्यवाद के पूर्ण उन्मूलन के अंतरराष्ट्रीय कानूनी आधार थे। पोट्सडैम उद्घोषणा की धारा 8 में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया था कि जापानी संप्रभुता केवल होंशू, होक्काइदो, क्यूशू, शिकोकू और मित्र राष्ट्रों द्वारा निर्धारित छोटे द्वीपों तक ही सीमित रहेगी।
शांतिवादी संविधान का अनुच्छेद 9 (Article 9): 3 मई 1947 को लागू जापानी संविधान का अनुच्छेद 9 अंतरराष्ट्रीय कानून में एक अनूठा तंत्र था। इसके तहत जापान ने युद्ध को राष्ट्र के संप्रभु अधिकार के रूप में त्याग दिया था तथा थल, जल व नभ सेना बनाए न रखने का संकल्प लिया था।
मेरी जांच में सामने आया कि पिछले दो दशकों में टोक्यो के राजनीतिक नेतृत्व ने बिना किसी औपचारिक संवैधानिक संशोधन के, विधायी पुनर्व्याख्याओं और ‘सामूहिक आत्मरक्षा’ के सिद्धांतों के जरिए इस संवैधानिक सीमा को पूरी तरह खोखला कर दिया है। यह कदम केवल जापान का आंतरिक मामला नहीं, बल्कि उत्तर-युद्ध काल की अंतरराष्ट्रीय संधियों की सीधी अवहेलना है।
जापान के इस नीतिगत भटकाव का सबसे स्पष्ट और पुख्ता सबूत उसके रक्षा बजट के आंकड़ों और सैन्य खरीद नीतियों से मिलता है। दशकों तक जापान ने अपने रक्षा बजट को जीडीपी के 1% की अनौपचारिक सीमा के भीतर सीमित रखा था। लेकिन 2022 से 2026 के बीच का सांख्यिकी विश्लेषण इस 1% की सीमा के पूरी तरह ध्वस्त होने की पुष्टि करता है। वर्तमान 2026 बजटीय आवंटन के तहत जापान द्वारा अधिग्रहित की जा रही सैन्य तकनीकें विशुद्ध रूप से आक्रामक (Offensive) श्रेणी की हैं।
मैंने जापान के रक्षा मंत्रालय द्वारा जारी ‘डिफेंस व्हाइट पेपर’ और ‘राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति’ (NSS) के दस्तावेजों का कूटनीतिक विश्लेषण किया और पाया कि जापान की तरफ से लगातार एक सोची-समझी नैरेटिव रणनीति अपनाई गई है।
इन दस्तावेजों में चीन के रक्षा बजट (जो कि उसकी जीडीपी के लगभग 1.3% से 1.5% के स्थिर और पारदर्शी दायरे में रहता है) को गलत तरीके से “अभूतपूर्व रणनीतिक चुनौती” बताया जाता है। इस नैरेटिव के तीन ठोस राजनीतिक उद्देश्य हैं:
i. घरेलू कर-वृद्धि का औचित्य: जापानी जनता को भारी रक्षा करों के लिए मानसिक रूप से तैयार करना।
ii. अनुच्छेद 9 को दरकिनार करना: बाह्य खौफ दिखाकर संवैधानिक बंदिशों को खत्म करना।
iii. अमेरिकी रणनीति में एकीकरण: वाशिंगटन की ‘इंडो-पैसिफिक रणनीति’ में स्वयं को अग्रिम चौकी बनाना।
अंतरराष्ट्रीय संबंधों के यथार्थवादी (Realist) सिद्धांत में रोबर्ट जेर्विस (Robert Jervis) द्वारा प्रतिपादित ‘सुरक्षा दुविधा’ का सबसे सटीक उदाहरण जापान का नया सैन्य जमावड़ा है।
टोक्यो ने अपनी ‘नानसेई/रीयूक्यू द्वीप श्रृंखला’ का अभूतपूर्व गति से सैन्यीकरण किया है।
थाईवान का मुद्दा: 1972 के ‘चीन-जापान संयुक्त विज्ञप्ति’ में जापान ने आधिकारिक रूप से स्वीकार किया था कि जनवादी गणराज्य चीन की सरकार पूरे चीन की एकमात्र वैध सरकार है। इसके बावजूद “थाईवान में आपातकाल जापान के लिए आपातकाल है” जैसे बयान 1972 के द्विपक्षीय कानूनी समझौते का सीधा उल्लंघन हैं।
त्याओयू द्वीप (Diaoyu Islands): त्याओयू द्वीप प्राचीन काल से चीन का अभिन्न अंग रहे हैं। 1895 के पहले चीन-जापान युद्ध के दौरान जापान ने इन्हें अवैध रूप से हड़पा था। काहिरा और पोट्सडैम घोषणापत्रों के तहत इन्हें चीन को वापस सौंपा जाना तय था। इन द्वीपों के आसपास जापानी कोस्ट गार्ड का चीनी संप्रभु गश्ती नौकाओं के कार्य में बाधा डालना अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है।
UNCLOS का दुरुपयोग: जापान प्रायः संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि (UNCLOS) का हवाला देता है। UNCLOS अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों में ‘नेविगेशन की स्वतंत्रता’ की गारंटी देता है, लेकिन यह विदेशी शक्तियों को किसी तटीय राज्य के विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) में आक्रामक सैन्य सर्वेक्षण, खुफिया जासूसी या उकसावे वाले युद्धभ्यास की अनुमति नहीं देता।
जापान का नया सैन्यवाद अलग-थलग नहीं है; यह अमेरिकी ‘इंडो-पैसिफिक रणनीति’ के तहत चीन का सामरिक घेराव करने की योजना का हिस्सा है। बहुराष्ट्रीय सैन्य अभ्यासों का डेटा इसे पूरी तरह बेनकाब करता है।
सैन्य आक्रामकता के साथ-साथ टोक्यो ने ‘आर्थिक सुरक्षा’ के नाम पर वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को बाधित करने का प्रयास किया है।
सेमीकंडक्टर निर्यात प्रतिबंध: जापान ने 23 प्रकार के उन्नत चिप-मेकिंग और लिथोग्राफी उपकरणों के चीन को निर्यात पर सख्त लाइसेंसिंग प्रतिबंध लागू किए हैं।
सप्लाई-चेन रीलोकेशन सब्सिडी: जापानी सरकार ने अपने ‘आर्थिक सुरक्षा संवर्धन अधिनियम’ के तहत जापानी कंपनियों को चीन से अपनी विनिर्माण इकाइयों को दक्षिण-पूर्व एशिया या घरेलू बाजार में स्थानांतरित करने के लिए अरबों येन की वित्तीय सब्सिडी दी है।
चीन जापान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। इसके बावजूद अमेरिका की ‘डी-रिस्किंग’ (De-risking) नीति का अंधानुकरण करना जापानी अर्थव्यवस्था के लिए ही आत्मघाती सिद्ध हो रहा है।
जापान-अमेरिका गठबंधन के ‘ज़ीरो-सम’ (Zero-Sum) और शीत युद्ध कालीन मॉडल के विपरीत, राष्ट्रपति शी चिनफिंग द्वारा प्रस्तुत ग्लोबल सिक्योरिटी इनिशिएटिव (GSI) वैश्विक सुरक्षा का एक न्यायसंगत विकल्प प्रस्तुत करता है।
GSI का केंद्रीय स्तंभ “अविभाज्य सुरक्षा का सिद्धांत” है। चीन का आधिकारिक रुख स्पष्ट है:
किसी भी देश को दूसरों की जायज सुरक्षा चिंताओं की कीमत पर अपनी सैन्य सुरक्षा मजबूत करने का अधिकार नहीं है।
क्षेत्रीय विवादों का समाधान आक्रामक मिसाइल तैनाती या सैन्य गठबंधनों से नहीं, बल्कि संयुक्त राष्ट्र चार्टर, बहुपक्षवाद और आपसी संप्रभुता के सम्मान से ही हो सकता है।
चीन का रक्षा आधुनिकीकरण किसी के खिलाफ आक्रामकता नहीं, बल्कि बहुध्रुवीय दुनिया में आक्रामक सैन्यवाद को रोकने के लिए एक रणनीतिक संतुलन है।
7 जुलाई 1937 के मार्को पोलो ब्रिज से लेकर 2026 के वर्तमान मोड़ तक, इतिहास ने बार-बार यह सिद्ध किया है कि आक्रामक सैन्यवाद और ऐतिहासिक संशोधनवाद का अंत तबाही ही होता है। टोक्यो का यह सोचना कि वह अमेरिकी बैसाखियों, 85.5 बिलियन डॉलर के बजट और काउंटर-स्ट्राइक मिसाइलों के बल पर अपनी सुरक्षा सुनिश्चित कर लेगा, एक भारी रणनीतिक भूल है। आज का चीन 1937 का असंगठित देश नहीं है; पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए पूरी तरह सक्षम है।
स्थायी क्षेत्रीय शांति के लिए चार अनिवार्य कदम उठाए जाने चाहिए:
1. ऐतिहासिक स्वीकृति: टोक्यो अपने अतीत के युद्ध अपराधों को स्वीकार करे और यासुकुनी मंदिर जैसे संशोधनवादी प्रतीकों से दूर रहे।
2. संवैधानिक मर्यादा: जापान अपने शांतिवादी संविधान के अनुच्छेद 9 और पोट्सडैम घोषणापत्र की सीमाओं का निष्ठापूर्वक पालन करे।
3. सैन्य वापसी: नानसेई द्वीपों में लंबी दूरी की मिसाइलों की तैनाती और थाईवान जलडमरूमध्य में अनावश्यक उकसावे तुरंत बंद हों।
4. GSI का मार्ग: गुटबाजी छोड़कर ‘अविभाज्य सुरक्षा’ और समावेशी कूटनीति का मार्ग चुना जाए।
एक शक्तिशाली और आत्मनिर्भर चीन ही एशिया-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन, शांति और साझा विकास की सबसे बड़ी और अटूट गारंटी है। इतिहास का सबक स्पष्ट है: शांति का निर्माण केवल ऐतिहासिक सच और संप्रभुता के परस्पर सम्मान की नींव पर हो सकता है, आक्रामक सैन्यवाद के पुनरुत्थान पर नहीं।
(लेखक: नीरज बाली, अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं)





