हथियार या मजबूरी… पेलेट गन पर बड़ा सवाल
दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए छात्र प्रदर्शन के बाद पेलेट गन का इस्तेमाल एक बार फिर देशव्यापी बहस का मुद्दा बन गया है। प्रदर्शनकारियों पर पेलेट गन चलाए जाने के आरोपों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि भीड़ नियंत्रण के लिए इस्तेमाल होने वाला यह हथियार कितना उचित है? क्या भारत में कानून इस तरह प्रदर्शन के दौरान पेलेट गन चलाने की अनुमति देता है?? संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार संगठन इसे किस नजर से देखते हैं? और सुप्रीम कोर्ट ने इस पर क्या कहा है?
क्या होती है पेलेट गन?
पेलेट गन एक शॉटगन आधारित हथियार है, जिसमें छोटे-छोटे धातु के छर्रे यानी पेलेट दागे जाते हैं। इसका उद्देश्य आमतौर पर भीड़ को नियंत्रित करना और घातक हथियारों के इस्तेमाल से बचना बताया जाता है। हालांकि, इसके छर्रे शरीर में गंभीर चोट पहुंचा सकते हैं, खासकर आंखों को नुकसान पहुंचाने का खतरा सबसे ज्यादा होता है।
कश्मीर में इस्तेमाल से शुरू हुआ विवाद
भारत में पेलेट गन सबसे ज्यादा चर्चा में साल 2016 के बाद आई, जब जम्मू-कश्मीर में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। आतंकी कमांडर बुरहान वानी की मौत के बाद घाटी में हिंसक प्रदर्शन और पत्थरबाजी की घटनाएं हुईं। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए सुरक्षा बलों ने पेलेट गन का इस्तेमाल किया। इस दौरान बड़ी संख्या में लोग घायल हुए। कई प्रदर्शनकारियों की आंखों में छर्रे लगे और कुछ लोगों की आंखों की रोशनी तक चली गई। इसके बाद मानवाधिकार संगठनों ने पेलेट गन के इस्तेमाल पर गंभीर सवाल उठाए।
मानवाधिकार संगठनों की आपत्ति
कई अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने पेलेट गन को लेकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि भीड़ नियंत्रण के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले हथियारों का प्रयोग बेहद सावधानी से होना चाहिए और ऐसा तरीका नहीं अपनाया जाना चाहिए जिससे स्थायी शारीरिक नुकसान हो। मानवाधिकार संगठनों का तर्क है कि आंखों जैसी संवेदनशील जगहों पर चोट लगने की संभावना के कारण पेलेट गन अत्यधिक नुकसान पहुंचाने वाला हथियार बन सकती है। उनका कहना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कम नुकसान वाले विकल्पों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
संयुक्त राष्ट्र का नजरिया
संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार मानकों में भीड़ नियंत्रण के दौरान बल प्रयोग को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं। संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि सुरक्षा बलों को बल प्रयोग करते समय आवश्यकता, समानुपातिकता और जिम्मेदारी के सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार किसी भी हथियार का इस्तेमाल आखिरी विकल्प के रूप में होना चाहिए और नागरिकों को अनावश्यक नुकसान से बचाना सुरक्षा एजेंसियों की जिम्मेदारी है।
भारतीय कानून क्या कहता है?
भारत में पुलिस और सुरक्षा बलों को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए बल प्रयोग का अधिकार दिया गया है। भारतीय न्याय संहिता और पुलिस नियमों के तहत परिस्थितियों के अनुसार भीड़ को नियंत्रित करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जा सकते हैं। हालांकि, बल प्रयोग असीमित नहीं है। पुलिस को यह सुनिश्चित करना होता है कि कार्रवाई स्थिति के अनुरूप हो और जरूरत से ज्यादा बल का इस्तेमाल न किया जाए। भीड़ नियंत्रण के दौरान पुलिस और सुरक्षा बलों के लिए स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर यानी एसओपी जारी किए गए हैं, जिनमें बल प्रयोग की परिस्थितियों और तरीकों का उल्लेख होता है।
सुप्रीम कोर्ट का रुख
पेलेट गन के इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी समय-समय पर सुनवाई हुई है। अदालत ने सुरक्षा बलों की चुनौतियों को समझते हुए कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जरूरत को स्वीकार किया है, लेकिन साथ ही नागरिकों के जीवन और अधिकारों की रक्षा पर भी जोर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में कहा है कि राज्य की कार्रवाई संविधान में मिले मौलिक अधिकारों के अनुरूप होनी चाहिए। किसी भी परिस्थिति में बल प्रयोग न्यूनतम और आवश्यक होना चाहिए।
क्या पेलेट गन पर पूरी तरह रोक है?
भारत में पेलेट गन पर पूरी तरह प्रतिबंध नहीं लगाया गया है। सुरक्षा बल परिस्थितियों के अनुसार इसका इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन इसके उपयोग को लेकर लगातार समीक्षा और बहस होती रही है। समय-समय पर विशेषज्ञों ने भीड़ नियंत्रण के लिए वैकल्पिक तकनीकों के इस्तेमाल की सलाह दी है, ताकि कानून व्यवस्था भी बनी रहे और आम नागरिकों को गंभीर नुकसान से बचाया जा सके।
सबसे बड़ा सवाल… सुरक्षा या मानवाधिकार?
पेलेट गन को लेकर बहस दो हिस्सों में बंटी हुई है। सुरक्षा एजेंसियों का तर्क है कि हिंसक भीड़ को नियंत्रित करने के लिए गैर-घातक हथियार जरूरी हैं। वहीं मानवाधिकार संगठन और कई विशेषज्ञ मानते हैं कि इसके इस्तेमाल से होने वाली चोटें गंभीर और स्थायी हो सकती हैं।
दिल्ली की घटना के बाद एक बार फिर यही सवाल सामने है कि भीड़ नियंत्रण के लिए इस्तेमाल होने वाले हथियारों में संतुलन कैसे बनाया जाए। लोकतंत्र में प्रदर्शन का अधिकार और कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी दोनों महत्वपूर्ण हैं। अब चुनौती यही है कि सुरक्षा और नागरिक अधिकारों के बीच ऐसा रास्ता निकले, जिसमें किसी भी पक्ष को अनावश्यक नुकसान न उठाना पड़े।





