युद्ध की त्रासदी को कभी नहीं भुलाया जाना चाहिए
साल 2026 में 7 जुलाई की घटना की 89वीं वर्षगांठ मनाई गई। इतिहास में इसे उस घटना के रूप में देखा जाता है जिसके बाद 1937 में जापान और चीन के बीच पूर्ण पैमाने पर युद्ध (द्वितीय चीन-जापान युद्ध)शुरू हुआ। यह घटनाक्रम पेइचिंग के पास स्थित मार्को पोलो ब्रिज (Lugou Bridge) के निकट हुआ था और इसे आधुनिक एशियाई इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में गिना जाता है।
इतिहासकारों के अनुसार इस युद्ध ने चीन को भारी मानवीय और आर्थिकनुकसान पहुंचाया। लाखों लोग युद्ध की चपेट में आए और इसका असर केवल चीन तक सीमित नहीं रहा बल्कि एशिया के कई हिस्सों पर भी पड़ा। यही वजह है कि चीन हर साल 7 जुलाई को इस इतिहास को याद करता है और युद्ध से मिले
सबक पर जोर देता है।
89वीं वर्षगांठ के मौके पर चीन ने एक बार फिर इतिहास को याद करते हुए कहा कि युद्ध की त्रासदी को कभी नहीं भुलाया जाना चाहिए। चीन का कहना है कि अतीत की घटनाएं यह याद दिलाती हैं कि शांति और स्थिरता बनाए रखना कितना जरूरी है। चीन का मानना है कि इतिहास से मिले सबक आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े फैसलों में उन्हें ध्यान में रखा जाना चाहिए।
इसी बीच चीन ने जापान सरकार द्वारा तैयार की जा रही नई रक्षा श्वेत पत्र (Defense White Paper)पर भी कड़ी प्रतिक्रिया दी है। चीन के अनुसार ऐसा करके जापान अपनी रक्षा और सुरक्षा नीतियों में बड़े बदलाव तथा सैन्य क्षमताओं के विस्तार को उचित ठहराने की कोशिश कर रहा है। चीन ने इस पर कड़ी असंतुष्टि और स्पष्ट विरोध जताया है।
पिछले कुछ वर्षों में जापान ने अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति, रक्षा बजट और सैन्य क्षमताओं में कई बदलाव किए हैं। जापान का कहना है कि बदलते क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा माहौल को देखते हुए उसकी रक्षा तैयारियों को मजबूत करना आवश्यक है। दूसरी ओर चीन का आधिकारिक रुख है कि जापान की यह नीति
युद्ध के बाद बनी सुरक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव की ओर इशारा करती है।
चीन का आरोप है कि जापान तेजी से पुनः सैन्यीकरण की दिशा में आगे बढ़ रहा है। चीन का कहना है कि यदि जापान सैन्य क्षमताओं का लगातार विस्तार करता है तो इसका असर पूरे एशिया-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा पर पड़ सकता है। चीन ने यह भी कहा है कि क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने के लिए सभी देशों को इतिहास से सीख
लेनी चाहिए और तनाव बढ़ाने वाले कदमों से बचना चाहिए। चीन ने अपने बयान में यह भी कहा कि 89 वर्ष पहले इतिहास ने जो चेतावनी दी थी उसे आज भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन और जापान के संबंधों में इतिहास आज भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा बना हुआ है। युद्धकालीन घटनाएं, सुरक्षा नीतियां और क्षेत्रीय रणनीति जैसे विषय समय-समय पर दोनों देशों के बीच विवाद का कारण बनते रहे हैं। ऐसे में जुलाई 7 की 89वीं वर्षगांठ केवल एक ऐतिहासिक स्मरण नहीं है बल्कि वर्तमान एशियाई सुरक्षा व्यवस्था, रक्षा नीतियों और क्षेत्रीय संतुलन को लेकर जारी बहस का भी महत्वपूर्ण अवसर बन गई है।
(साभार—चाइना मीडिया ग्रुप ,पेइचिंग) (लेखक— डी के)
Post Views: 15