12 साल पहले चली रणनीति, अब दिख रहा बड़ा असर
साल 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की विदेश नीति में बड़ा बदलाव करते हुए ‘लुक ईस्ट पॉलिसी’ को ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ में बदल दिया था। उस समय इसे केवल कूटनीतिक पहल माना गया, लेकिन अब यह रणनीति भारत के रक्षा उद्योग के लिए बड़ा आर्थिक अवसर बनती दिखाई दे रही है। दक्षिण-पूर्व एशिया के देश अब भारतीय रक्षा तकनीक और स्वदेशी हथियारों में लगातार दिलचस्पी दिखा रहे हैं। भारत न केवल रणनीतिक साझेदारी मजबूत कर रहा है, बल्कि रक्षा निर्यात के जरिए वैश्विक बाजार में अपनी मजबूत मौजूदगी भी दर्ज करा रहा है।
इंडोनेशिया डील से मिला बड़ा संकेत
हालिया भारत-इंडोनेशिया रक्षा सहयोग इस बदलती तस्वीर का बड़ा उदाहरण माना जा रहा है। दोनों देशों के बीच ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल और अस्त्र एयर-टू-एयर मिसाइल से जुड़े समझौतों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत अब केवल हथियार आयात करने वाला देश नहीं, बल्कि आधुनिक रक्षा तकनीक का प्रमुख निर्यातक भी बन रहा है। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के देशों के साथ बढ़ता रक्षा सहयोग भारत की सामरिक स्थिति को मजबूत करने के साथ-साथ रक्षा उद्योग को भी नई ऊंचाइयों तक पहुंचा रहा है।
पूरब के देशों ने बढ़ाई भारतीय हथियारों की मांग
पिछले कुछ वर्षों के आंकड़े इस बदलाव को और मजबूत करते हैं। 2020 से 2025 के बीच भारत के कुल रक्षा निर्यात का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा म्यांमार, फिलीपींस और वियतनाम जैसे देशों को गया। इससे पहले 2014-19 के दौरान यह हिस्सा केवल 16 प्रतिशत के आसपास था। म्यांमार भारत का सबसे बड़ा रक्षा आयातक बना हुआ है, जबकि फिलीपींस ब्रह्मोस मिसाइल सौदे के बाद तेजी से दूसरे स्थान पर पहुंच गया है। वियतनाम भी लगातार भारतीय रक्षा उपकरणों की खरीद बढ़ा रहा है। यह संकेत है कि दक्षिण-पूर्व एशिया भारत के रक्षा निर्यात का सबसे बड़ा बाजार बनता जा रहा है।
जहाजों से आगे बढ़ा भारत, अब मिसाइलों पर दुनिया का भरोसा
भारत के रक्षा निर्यात की प्रकृति भी तेजी से बदली है। पहले विमान और नौसैनिक प्लेटफॉर्म निर्यात का बड़ा हिस्सा थे, लेकिन अब तस्वीर अलग है। वर्तमान में जहाज अभी भी महत्वपूर्ण निर्यात उत्पाद हैं, लेकिन मिसाइल, आर्टिलरी सिस्टम और एयर डिफेंस सिस्टम की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है। ब्रह्मोस जैसी सुपरसोनिक मिसाइलें, आधुनिक तोप प्रणालियां और स्वदेशी एयर डिफेंस सिस्टम भारत की नई पहचान बन चुके हैं। इससे साफ है कि दुनिया अब भारत से केवल सैन्य प्लेटफॉर्म नहीं, बल्कि अत्याधुनिक रक्षा तकनीक खरीदने में भी भरोसा जता रही है।
रक्षा निर्यात से अर्थव्यवस्था और कूटनीति दोनों को मजबूती
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियों के बीच दक्षिण-पूर्व एशियाई देश अपनी सुरक्षा क्षमताओं को मजबूत करना चाहते हैं और भारत उनके लिए विश्वसनीय रक्षा साझेदार बनकर उभरा है। रक्षा निर्यात से जहां देश को अरबों रुपये की विदेशी आय मिलने की संभावना है, वहीं भारत की सामरिक पहुंच भी तेजी से बढ़ रही है। ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के तहत विकसित स्वदेशी हथियार अब वैश्विक बाजार में अपनी पहचान बना रहे हैं। आने वाले वर्षों में यदि इंडो-पैसिफिक देशों के साथ ऐसे और रक्षा समझौते होते हैं, तो भारत विश्व के प्रमुख रक्षा निर्यातकों की श्रेणी में और मजबूती से अपनी जगह बना सकता है।





