युद्ध थमा, संकट नहीं: अब अमेरिका-ईरान रिश्तों का क्या होगा
कई दिनों तक दुनिया की चिंता का केंद्र बने अमेरिका-ईरान तनाव में फिलहाल कुछ राहत जरूर दिखाई दे रही है। युद्ध जैसी स्थिति टलती हुई नजर आ रही है, लेकिन यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि संकट पूरी तरह समाप्त हो गया है। वास्तव में, युद्ध का खतरा भले कम हुआ हो, लेकिन उन मूल मुद्दों का समाधान अभी भी नहीं हुआ है जिन्होंने इस टकराव को जन्म दिया था।
आज स्थिति ऐसी है जहां मिसाइलों और सैन्य कार्रवाई की जगह बातचीत और कूटनीति ने ले ली है। दोनों देशों के बीच अप्रत्यक्ष वार्ताएं जारी हैं और अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थ इस कोशिश में जुटे हैं कि तनाव को स्थायी रूप से कम किया जा सके। लेकिन भरोसे की कमी अब भी सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है।
इस पूरे विवाद के केंद्र में ईरान का परमाणु कार्यक्रम है। अमेरिका लंबे समय से चाहता है कि ईरान अपनी परमाणु गतिविधियों पर सख्त नियंत्रण स्वीकार करे, जबकि ईरान का कहना है कि उसका कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है। इसके अलावा अमेरिकी प्रतिबंध, ईरान की जमी हुई विदेशी संपत्तियां और पश्चिम एशिया में शक्ति संतुलन जैसे कई मुद्दे अभी भी समाधान की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न होर्मुज़ जलडमरूमध्य को लेकर है। दुनिया के तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से गुजरता है। हालिया तनाव के दौरान इस मार्ग पर खतरे की आशंका ने वैश्विक तेल बाजारों को हिला दिया था। फिलहाल स्थिति सामान्य होने की दिशा में बढ़ रही है, लेकिन पूरी तरह स्थिरता अभी भी नहीं लौटी है।
अमेरिका के लिए प्राथमिकता यह है कि ईरान परमाणु हथियार विकसित न कर सके और क्षेत्र में स्थिरता बनी रहे। दूसरी ओर ईरान चाहता है कि उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंध हटाए जाएं, उसकी तेल बिक्री सामान्य हो और उसकी अर्थव्यवस्था को राहत मिले। यही कारण है कि दोनों पक्ष बातचीत जारी रखने के लिए मजबूर भी हैं और इच्छुक भी।
आने वाले महीनों में तीन संभावित रास्ते दिखाई देते हैं।
पहला और सबसे सकारात्मक रास्ता यह है कि बातचीत सफल हो जाए, प्रतिबंधों में धीरे-धीरे ढील मिले और दोनों देश किसी नए समझौते पर पहुंच जाएं। ऐसी स्थिति में तेल की कीमतें स्थिर हो सकती हैं और पूरे पश्चिम एशिया में तनाव कम हो सकता है।
दूसरी संभावना यह है कि बातचीत चलती रहे लेकिन कोई बड़ा समाधान न निकले। इस स्थिति में युद्ध तो नहीं होगा, लेकिन समय-समय पर तनाव और बयानबाजी जारी रहेगी। दुनिया को लगातार अनिश्चितता का सामना करना पड़ेगा।
तीसरी और सबसे चिंताजनक संभावना यह है कि वार्ता विफल हो जाए और कोई नई घटना फिर से सैन्य टकराव को जन्म दे दे। हालांकि फिलहाल दोनों पक्ष युद्ध से बचना चाहते हैं, लेकिन पश्चिम एशिया की राजनीति इतनी जटिल है कि किसी भी अप्रत्याशित घटना से हालात फिर बिगड़ सकते हैं।
भारत के लिए यह संकट विशेष महत्व रखता है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए खाड़ी क्षेत्र पर काफी हद तक निर्भर है। इसके अलावा लाखों भारतीय इस क्षेत्र में काम करते हैं। यदि क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित होती है तो भारत को सस्ते तेल, नियंत्रित महंगाई और बेहतर आर्थिक स्थिरता का लाभ मिल सकता है। लेकिन यदि तनाव फिर बढ़ता है, तो इसका असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों से लेकर आम आदमी के घरेलू बजट तक दिखाई दे सकता है।
फिलहाल सबसे बड़ी सच्चाई यही है कि युद्ध भले रुक गया हो, लेकिन संकट समाप्त नहीं हुआ है।
अब लड़ाई युद्धक्षेत्र में नहीं, बल्कि वार्ता की मेज पर लड़ी जाएगी।
और आने वाले कुछ सप्ताह यह तय कर सकते हैं कि अमेरिका और ईरान शांति की ओर बढ़ते हैं या फिर दुनिया को एक बार फिर नए तनाव का सामना करना पड़ेगा।





