क्या भारतीय महिला क्रिकेट अब सचमुच अपने सुनहरे दौर में पहुंच गया है?
एक समय था जब भारत में महिला क्रिकेट को शायद ही कोई गंभीरता से लेता था। मैचों का प्रसारण मुश्किल से होता था, खिलाड़ियों के नाम आम लोग नहीं जानते थे और क्रिकेट खेलने का सपना देखने वाली लड़कियों के सामने अवसर भी बेहद सीमित थे। लेकिन अब पूरी तरह तस्वीर बदल चुकी है।
स्मृति मंधाना, हरमनप्रीत कौर, जेमिमा रोड्रिग्स, ऋचा घोष और शेफाली वर्मा जैसे नाम अब केवल क्रिकेट प्रेमियों तक सीमित नहीं हैं। वे लाखों युवा लड़कियों के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं। सोशल मीडिया से लेकर विज्ञापनों तक, महिला क्रिकेटरों की मौजूदगी लगातार बढ़ी है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अब भारतीय महिला टीम से केवल अच्छा प्रदर्शन करने की उम्मीद नहीं की जाती, बल्कि ट्रॉफी जीतने की उम्मीद की जाती है।
इस बदलाव की शुरुआत अचानक नहीं हुई। 2017 के विश्व कप फाइनल में भारत की शानदार यात्रा ने पहली बार देश का ध्यान महिला क्रिकेट की ओर खींचा। मिताली राज, झूलन गोस्वामी और हरमनप्रीत कौर जैसी खिलाड़ियों ने यह साबित किया कि महिला क्रिकेट भी उतना ही रोमांचक और प्रतिस्पर्धी हो सकता है जितना पुरुषों का क्रिकेट।
इसके बाद भारतीय क्रिकेट बोर्ड ने महिला क्रिकेट में निवेश बढ़ाया। खिलाड़ियों को बेहतर सुविधाएं मिलीं, मैचों का प्रसारण बढ़ा और धीरे-धीरे दर्शकों की संख्या भी बढ़ने लगी।
लेकिन असली क्रांति तब आई जब महिला प्रीमियर लीग (WPL) की शुरुआत हुई। पहली बार भारतीय महिला क्रिकेटरों को एक ऐसा मंच मिला जहां वे दुनिया की सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों के साथ खेल सकें। इससे न केवल खिलाड़ियों की आय बढ़ी बल्कि खेल का स्तर भी ऊपर गया। छोटे शहरों और कस्बों की लड़कियों को भी यह विश्वास मिला कि क्रिकेट अब उनके लिए एक वास्तविक करियर बन सकता है।
आज भारत की महिला टीम दुनिया की सबसे मजबूत टीमों में गिनी जाती है। ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड और दक्षिण अफ्रीका जैसी टीमों के खिलाफ जीत अब कोई बड़ी खबर नहीं रह गई है। भारतीय टीम अब हर बड़े टूर्नामेंट में दावेदार के रूप में उतरती है।
हालांकि यह कहना भी जल्दबाजी होगी कि सारी चुनौतियां खत्म हो गई हैं। पुरुष क्रिकेट की तुलना में महिला क्रिकेट को अभी भी कम प्रायोजन मिलता है। घरेलू स्तर पर सुविधाओं और दर्शकों की संख्या में भी अंतर है। कई प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को अब भी संसाधनों की कमी का सामना करना पड़ता है।
फिर भी यह मानने में अब कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि भारतीय महिला क्रिकेट एक नए दौर में प्रवेश कर चुका है।
यह अब केवल एक खेल नहीं, बल्कि एक आंदोलन बन चुका है। एक ऐसा आंदोलन जिसने लाखों भारतीय लड़कियों को यह विश्वास दिया है कि वे भी क्रिकेट के मैदान पर देश का नाम रोशन कर सकती हैं।
शायद यही किसी भी खेल के “कमिंग ऑफ एज” यानी परिपक्व होने की सबसे बड़ी पहचान होती है।
महिला क्रिकेट अब भारत में किसी की सहानुभूति या समर्थन का मोहताज नहीं है। उसने अपनी जगह खुद बनाई है।
और यही उसकी सबसे बड़ी जीत है।





