नई दिल्ली। “महंगाई डायन खाए जात है…” यह मशहूर पंक्ति एक बार फिर देश के करोड़ों गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों की वास्तविकता बनती दिखाई दे रही है। मई 2026 के दौरान खुदरा महंगाई दर (रिटेल इंफ्लेशन) बढ़कर 3.93 प्रतिशत पर पहुंच गई है। अप्रैल में यह दर 3.48 प्रतिशत थी। आंकड़े भले ही भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के 4 प्रतिशत के लक्ष्य से नीचे हों, लेकिन आम परिवारों के लिए बढ़ती कीमतों ने घरेलू बजट का संतुलन बिगाड़ना शुरू कर दिया है।
मई में बढ़ी खुदरा महंगाई दर
खाने-पीने की वस्तुएं हुईं महंगी
गरीब और मध्यमवर्ग पर सीधा असर
पश्चिम एशिया संकट का असर
राहत और चिंता के बीच अर्थव्यवस्था
देश में महंगाई बढ़ने की सबसे बड़ी वजह खाने-पीने की वस्तुओं की कीमतों में तेजी बताई जा रही है। नेशनल स्टैटिस्टिकल ऑफिस (NSO) के अनुसार मई में खाद्य महंगाई बढ़कर 4.78 प्रतिशत हो गई, जो अप्रैल में 4.2 प्रतिशत थी। यानी सबसे ज्यादा असर उन वस्तुओं पर पड़ा है जिन्हें हर घर में रोजाना इस्तेमाल किया जाता है।
रसोई का बजट बिगड़ने लगा
महंगाई का सबसे पहला असर घर की रसोई पर दिखाई देता है। गरीब परिवार हो या वेतनभोगी मध्यमवर्ग, दोनों की आय सीमित होती है लेकिन खर्च लगातार बढ़ते जा रहे हैं। सब्जियां, फल, दालें, खाद्य तेल, दूध और अन्य आवश्यक वस्तुओं के दाम बढ़ने से मासिक बजट पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है।
भोपाल, लखनऊ, पटना, दिल्ली, जयपुर और देश के अन्य शहरों में रहने वाले लाखों मध्यमवर्गीय परिवार पहले ही बच्चों की पढ़ाई, मकान किराया, बिजली बिल, चिकित्सा और परिवहन खर्चों से जूझ रहे हैं। ऐसे में खाद्य वस्तुओं की कीमतों में मामूली वृद्धि भी परिवारों की बचत को प्रभावित करती है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण है। यहां आय के स्रोत सीमित हैं और अधिकांश परिवार दैनिक मजदूरी या कृषि आय पर निर्भर हैं। खाद्य वस्तुओं की बढ़ती कीमतें उनके जीवन स्तर को सीधे प्रभावित करती हैं।
आखिर क्यों बढ़ रही है महंगाई?
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि वर्तमान महंगाई के पीछे घरेलू कारणों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां भी जिम्मेदार हैं। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान, अमेरिका तथा इजरायल के बीच जारी टकराव का असर वैश्विक बाजारों पर दिखाई दे रहा है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। जैसे ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, उसका असर पेट्रोल, डीजल, परिवहन और उत्पादन लागत पर पड़ता है। इसके बाद यह लागत धीरे-धीरे हर वस्तु के दाम में शामिल हो जाती है।
विशेषज्ञों के अनुसार तेल की कीमतों में वृद्धि केवल ईंधन तक सीमित नहीं रहती बल्कि खाद्य पदार्थों, उपभोक्ता वस्तुओं, निर्माण सामग्री और परिवहन सेवाओं को भी प्रभावित करती है।
गरीब परिवारों के लिए सबसे बड़ी चुनौती
महंगाई का प्रभाव सभी वर्गों पर पड़ता है, लेकिन गरीब परिवार सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। कारण यह है कि उनकी आय का बड़ा हिस्सा भोजन और आवश्यक जरूरतों पर खर्च होता है।
यदि किसी परिवार की मासिक आय 10 से 15 हजार रुपये है और खाद्य वस्तुओं के खर्च में 10 से 15 प्रतिशत की वृद्धि हो जाती है, तो उनके लिए बचत करना लगभग असंभव हो जाता है। कई बार उन्हें स्वास्थ्य, शिक्षा या अन्य जरूरी खर्चों में कटौती करनी पड़ती है।
महंगाई बढ़ने पर सबसे पहले पौष्टिक भोजन प्रभावित होता है। गरीब परिवार दूध, फल, दाल और प्रोटीनयुक्त खाद्य पदार्थों की खपत कम करने लगते हैं, जिसका असर बच्चों और बुजुर्गों के स्वास्थ्य पर पड़ सकता है।
मध्यमवर्ग की बढ़ती चिंता
मध्यमवर्ग को अक्सर अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहा जाता है, लेकिन महंगाई का सबसे जटिल प्रभाव इसी वर्ग पर पड़ता है। गरीबों के लिए कई सरकारी योजनाएं उपलब्ध होती हैं जबकि उच्च आय वर्ग पर महंगाई का असर अपेक्षाकृत कम पड़ता है।मध्यमवर्गीय परिवारों को गृह ऋण की ईएमआई, बच्चों की फीस, बीमा प्रीमियम, चिकित्सा खर्च और रोजमर्रा की जरूरतों के बीच संतुलन बनाना पड़ता है। ऐसे में खाद्य महंगाई बढ़ने से उनकी मासिक बचत घटती है और भविष्य की वित्तीय योजनाएं प्रभावित होती हैं।
क्या RBI के लिए राहत की बात है?
हालांकि खुदरा महंगाई दर बढ़ी है, लेकिन यह अभी भी RBI के निर्धारित लक्ष्य 4 प्रतिशत के आसपास बनी हुई है। यही कारण है कि फिलहाल केंद्रीय बैंक पर ब्याज दरों में आक्रामक वृद्धि का दबाव नहीं है। भारत सरकार ने RBI को 4 प्रतिशत महंगाई दर का लक्ष्य दिया है, जिसमें 2 प्रतिशत ऊपर और नीचे का मार्जिन स्वीकार्य है। वर्तमान स्तर को देखते हुए केंद्रीय बैंक के पास नीतिगत लचीलापन बना हुआ है। लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि पश्चिम एशिया का संकट लंबा खिंचता है और कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ती हैं तो आने वाले महीनों में महंगाई 4 प्रतिशत के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर सकती है।
भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती भी उम्मीद
महंगाई के बीच एक सकारात्मक पहलू यह है कि भारत की अर्थव्यवस्था अभी भी मजबूत स्थिति में मानी जा रही है। देश की आर्थिक वृद्धि दर लगभग 7.8 प्रतिशत बताई जा रही है, जो दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज़ वृद्धि दरों में शामिल है। मजबूत आर्थिक विकास, बढ़ता निवेश, इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं और डिजिटल अर्थव्यवस्था भारत को वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद सहारा दे रही हैं। हालांकि विकास का वास्तविक लाभ तब महसूस होगा जब आम नागरिक की जेब पर महंगाई का बोझ कम होगा।
आने वाले महीनों में सबकी नजरें तीन महत्वपूर्ण कारकों पर रहेंगी। पश्चिम एशिया में तनाव की स्थिति। कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें। खाद्य वस्तुओं की घरेलू आपूर्ति। मानसून यदि सामान्य रहता है और कृषि उत्पादन बेहतर होता है तो खाद्य महंगाई पर कुछ हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है। लेकिन यदि वैश्विक हालात बिगड़ते हैं तो महंगाई फिर नई चुनौती बन सकती है।
मई 2026 के महंगाई आंकड़े यह संकेत दे रहे हैं कि आर्थिक मोर्चे पर सतर्क रहने की जरूरत है। आंकड़े अभी नियंत्रण में हैं, लेकिन खाने-पीने की वस्तुओं के बढ़ते दाम गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों की चिंता बढ़ा रहे हैं। सरकार, RBI और नीति निर्माताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि आर्थिक विकास की रफ्तार भी बनी रहे और आम आदमी की रसोई का बजट भी न बिगड़े। फिलहाल महंगाई की आहट सुनाई दे रही है, लेकिन यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो यह आहट आने वाले दिनों में बड़ी चुनौती में बदल सकती है।





