‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद फिर नूर खान एयरबेस पर
हलचल…
एयरबेस से शांति वार्ता तक बदलता भू-राजनीतिक समीकरण
पाकिस्तान के रावलपिंडी स्थित नूर खान एयरबेस एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में है। यह वही एयरबेस है, जिसे मई 2025 में भारत के ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान भारी नुकसान झेलना पड़ा था। अब लगभग 11 महीने बाद यहां अमेरिकी वायुसेना का विशेष विमान ‘चार्ल्सटन’ लैंड करता है, जिससे कई तरह के कयास तेज हो गए हैं। खास बात यह है कि इसी दिन इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच अहम शांति वार्ता भी आयोजित की गई।
‘ऑपरेशन सिंदूर’ की गूंज अब भी कायम
मई 2025 में भारत द्वारा चलाए गए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने पाकिस्तान के इस महत्वपूर्ण एयरबेस को गंभीर रूप से प्रभावित किया था। उस समय भारतीय हमलों में एयरबेस के कई अहम हिस्से क्षतिग्रस्त हो गए थे। नूर खान एयरबेस पाकिस्तान वायु सेना (PAF) के एयर मोबिलिटी कमांड का मुख्यालय है, इसलिए इसकी रणनीतिक अहमियत बेहद ज्यादा मानी जाती है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, मार्च 2026 तक भी यह एयरबेस पूरी तरह से सामान्य स्थिति में नहीं लौट पाया है और मरम्मत का काम जारी है।
11 महीने बाद अमेरिकी विमान की एंट्री
शुक्रवार 10 अप्रैल को अमेरिकी वायुसेना का विशेष विमान, जिसके टेल पर ‘चार्ल्सटन’ लिखा हुआ था, इस एयरबेस पर उतरा। इस विमान के लैंड होने के बाद से ही सवाल उठने लगे कि आखिर इसमें कौन सवार था। हालांकि आधिकारिक तौर पर यात्रियों की जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है, लेकिन कूटनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि इसमें अमेरिकी अधिकारी या मध्य-पूर्व से जुड़े विशेष दूत मौजूद हो सकते हैं।
अमेरिका-ईरान वार्ता से जुड़ा कनेक्शन?
इसी दिन इस्लामाबाद के एक लग्जरी होटल में अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता आयोजित की गई। पाकिस्तान ने इस वार्ता की मेजबानी कर एक बार फिर खुद को क्षेत्रीय कूटनीति के केंद्र में लाने की कोशिश की है।
विशेषज्ञों का मानना है कि नूर खान एयरबेस पर अमेरिकी विमान का उतरना और उसी दिन वार्ता का होना महज संयोग नहीं हो सकता। यह संकेत देता है कि पाकिस्तान इस पूरी प्रक्रिया में लॉजिस्टिक और सुरक्षा सपोर्ट दे रहा है।
तालिबान ड्रोन हमले ने बढ़ाई चिंता
नूर खान एयरबेस की स्थिति को लेकर एक और बड़ा पहलू सामने आया है। हाल ही में इस एयरबेस को अफगान तालिबान के ड्रोन हमले का भी सामना करना पड़ा था। इससे साफ है कि यह इलाका अब भी सुरक्षा के लिहाज से संवेदनशील बना हुआ है।
ऐसे में अमेरिकी विमान का यहां उतरना इस बात का संकेत भी हो सकता है कि सुरक्षा व्यवस्था को लेकर अमेरिका और पाकिस्तान के बीच समन्वय बढ़ा है।
रणनीतिक महत्व और संदेश
नूर खान एयरबेस केवल पाकिस्तान के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया के लिए रणनीतिक दृष्टि से बेहद अहम है। यहां से सैन्य और लॉजिस्टिक ऑपरेशन संचालित होते हैं।
भारत के ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद इस एयरबेस को जो नुकसान हुआ, उसने यह दिखाया कि क्षेत्र में सैन्य संतुलन किस तरह तेजी से बदल सकता है। अब अमेरिकी विमान की मौजूदगी यह संकेत देती है कि अंतरराष्ट्रीय ताकतें इस क्षेत्र में अपनी सक्रियता बनाए रखना चाहती हैं।
क्या संकेत दे रही है यह हलचल?
विश्लेषकों के मुताबिक, इस घटनाक्रम के कई मायने हो सकते हैं। पहला, अमेरिका-ईरान वार्ता के लिए पाकिस्तान एक सुरक्षित और तटस्थ मंच उपलब्ध करा रहा है। दूसरा, अमेरिका इस क्षेत्र में अपनी रणनीतिक उपस्थिति को मजबूत बनाए रखना चाहता है। तीसरा, भारत-पाकिस्तान के बीच पिछले साल हुए सैन्य तनाव के बाद भी यह इलाका अंतरराष्ट्रीय ध्यान का केंद्र बना हुआ है।
आगे क्या?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह घटनाक्रम केवल कूटनीतिक गतिविधियों तक सीमित रहेगा या इसके पीछे कोई बड़ा रणनीतिक बदलाव छिपा है। नूर खान एयरबेस पर अमेरिकी विमान की लैंडिंग और समानांतर चल रही अमेरिका-ईरान वार्ता ने यह स्पष्ट कर दिया है कि दक्षिण एशिया और मध्य-पूर्व की राजनीति एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई है। कुल मिलाकर, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद खामोश पड़े नूर खान एयरबेस पर फिर से हलचल तेज हो गई है। अमेरिकी विमान की मौजूदगी और शांति वार्ता का आयोजन इस बात का संकेत है कि यह क्षेत्र आने वाले समय में भी वैश्विक राजनीति का अहम केंद्र बना रहेगा। अब नजर इस बात पर है कि इस कूटनीतिक गतिविधि से क्या ठोस परिणाम निकलते हैं और इसका असर क्षेत्रीय समीकरणों पर कैसे पड़ता है।





