उत्तर प्रदेश में साक्षरता को सिर्फ स्कूल जाने की उम्र तक सीमित रखने के बजाय 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के उन लोगों तक पहुंचाने की कोशिश की जा रही है, जो किसी कारण से औपचारिक शिक्षा से वंचित रह गए। इसी कड़ी में रविवार को प्रदेश के सभी 75 जिलों में ‘उल्लास-नव भारत साक्षरता कार्यक्रम’ के तहत मूलभूत साक्षरता एवं संख्यात्मकता मूल्यांकन परीक्षा आयोजित की गई, जिसमें करीब 5.10 लाख शिक्षार्थियों ने हिस्सा लिया।
इस अभियान की सबसे खास बात यह रही कि परीक्षा केंद्र केवल परिषदीय विद्यालयों तक सीमित नहीं रहे। कारागारों और बाल सुधार गृहों में भी परीक्षा केंद्र बनाए गए। यानी साक्षरता अभियान ने उन लोगों तक भी पहुंच बनाने की कोशिश की, जो सामान्य शिक्षा व्यवस्था से बाहर हैं। प्रयागराज में महिला शरणालय और कारागार में भी परीक्षा कराए जाने की जानकारी सामने आई है।
अक्षर ज्ञान से आगे, रोजमर्रा की जिंदगी का कौशल
उल्लास कार्यक्रम का उद्देश्य केवल किसी व्यक्ति को पढ़ना-लिखना सिखाना नहीं, बल्कि उसे बुनियादी संख्यात्मक ज्ञान भी देना है। परीक्षा में पढ़ने, लिखने और सामान्य गणितीय क्षमता का आकलन किया गया। यानी किसी व्यक्ति के लिए अपना नाम पढ़ना, जरूरी सूचना समझना, हिसाब-किताब करना या रोजमर्रा के कामों में संख्याओं का इस्तेमाल करना आसान बनाना इस अभियान का अहम हिस्सा है।
उत्तर प्रदेश ने शैक्षणिक सत्र 2026-27 में 10 लाख असाक्षरों को साक्षर बनाने का लक्ष्य रखा है। सितंबर में पहली मूलभूत साक्षरता परीक्षा हुई है, जबकि दूसरी परीक्षा अगले वर्ष मार्च में प्रस्तावित है। कार्यक्रम में महिलाओं की 75 प्रतिशत और पुरुषों की 25 प्रतिशत भागीदारी का लक्ष्य भी निर्धारित किया गया है।
जेल से गांव तक, साक्षरता का दायरा कितना बड़ा?
इस अभियान का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू इसकी पहुंच है। प्रयागराज में 689 केंद्रों पर 5,237 लोगों ने परीक्षा दी और इनमें बुजुर्ग दादा-दादी और नाना-नानी की उम्र के लोग भी शामिल हुए। फर्रुखाबाद में जिला कारागार के बंदियों ने भी परीक्षा दी।
यानी साक्षरता का मतलब यहां सिर्फ कक्षा और किताब नहीं है। अभियान का लक्ष्य उन लोगों को भी शिक्षा के बुनियादी अधिकार से जोड़ना है, जो उम्र, सामाजिक परिस्थिति या जीवन की दूसरी परिस्थितियों के कारण पढ़ाई से दूर रह गए। अब इस अभियान की असली सफलता का पैमाना सिर्फ 5.10 लाख लोगों की परीक्षा में भागीदारी नहीं होगा। बड़ा सवाल यह होगा कि इनमें से कितने लोग वास्तव में पढ़ने-लिखने और बुनियादी गणित में सक्षम बनते हैं और यह ज्ञान उनकी रोजमर्रा की जिंदगी में कितना उपयोगी साबित होता है। यानी यूपी में साक्षरता अभियान अब स्कूल की चारदीवारी से बाहर निकलकर जेल, बाल सुधार गृह और समाज के उन हिस्सों तक पहुंच रहा है, जहां शिक्षा की जरूरत शायद सबसे ज्यादा है।





