विधानसभा चुनाव 2027: यूपी की सियासत में नारों का सत्ता-सूत्र…कभी जाति की हुंकार तो कभी विकास का दावा…!

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देश में उत्तर भारत की राजनीति को सीधे तौर पर प्रभावित करती है। अगर देश की सत्ता को देखे तो राज करने के लिए भी उत्तरप्रदेश में जीत जरूरी है। यूपी की राजनीति आमतौर पर जातिगत समीकरणों के खासा असर पड़ता है और उससे मजेदार बात ये है कि इस जातिगत राजनीति के हिसाब से ही राजनीतिक दल टिकट बंटवारे से लेकर गठबंधन की शर्ते तय करते हैं।

इंदिरा से योगी-अखिलेश तक बदली चुनावी भाषा की चाल
2027 में किसका संदेश जनता के मन तक पहुंचेगा?

ऐसे में हर पार्टी हर साल एक नए नारे के साथ चुनावी मैदान में होती है। मजेदार बात ये है कि इन नारों में नेताओं के नाम तो होते ही हैं लेकिन उसके साथ ही साथ राजनीति में जाति से जुड़े नारों का भी भरपूर उपयोग होता है। ऐसे में आइये जानते हैं कि अब तक जितने भी सियासी नारे चुनाव से पहले बुलंद किये गये रहे वो किस किस समय और कैसे लिखे गए थे। उन नारों का इम्पैक्ट यानी प्रभाव कितना रहा। साथ ही अब 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव में आखिर कौन सा नारे का जोर देखने को मिलेगा।

उत्तरप्रदेश की राजनीति में विभिन्न चुनावों और आंदोलनों के दौरान कई नारे बेहद सुर्खियों में रहे हैं। समय-समय पर प्रमुख राजनीतिक दलों द्वारा दिए गए चर्चित नारे इस प्रकार हैं:
1980 के दशक काा नारा
“जब तक सूरज चांद रहेगा, इंदिरा तेरा नाम रहेगा” – कांग्रेस का बेहद लोकप्रिय नारा।
1990 के दशक का नारा
“राम लला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे” (1991) – भारतीय जनता पार्टी (BJP) और राम मंदिर आंदोलन से जुड़ा ऐतिहासिक नारा।
“मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्री राम” (1993) – समाजवादी पार्टी (SP) और बहुजन समाज पार्टी (BSP) के गठबंधन के समय का नारा।

2007 के विधानसभा चुनाव का नारा

मायावती की पार्टी बीएसपी ने सोशल इंजीनियरिंग साधने के लिए नारा दिया था हाथी नहीं गणेश है…ब्रह्मा विष्णु महेश है। इसके साथ ही ब्राह्मण शंख बजाएगा…हाथी बढ़ता जाएगा।

2017 के विधानसभा चुनाव का नारा

बीजेपी ने अबकी बार 300 के पार का नारा बुलंद किया।

समाजवादी पार्टी के समर्थकों ने नारा लगाया कि जिसका जलवा कायम है। उसका बाप मुलायम है। जीत की चाभी डिंपल भाभी इसके साथ ही यूपी की मजबूरी है अखिलेश यादव जरूरी है का नारा भी सपा समर्थकों ने लगाया।

2022 के विधानसभा चुनाव का नारा

फिर एक बार योगी सरकार” और “यूपी + योगी = उपयोगी” – यह नारा बीजेपी ने लगाया था।

समाजवादी पार्टी की ओर से नारा बुलंद किया गया कि आ रहे हैं अखिलेश साथ ही बाइस में बाइसकल का नारा भी चर्चा में रहा। वहीं “नई हवा है, नई सपा है का नारा समाजवादी पार्टी के समर्थकों ने बुलंद किया था।

कांग्रेस की ओर से प्रियंका गांधी ने लड़की हूँ, लड़ सकती हूँ का नारा दिया था, हालांकि यह कारगर साबित नहीं हुआ। बीएसपी का नारा था…बहन जी हैं सबकी आस, लेकिन बीएसपी को मायूस होना पड़ा।

राजनीति में नारे महज शब्द नहीं रहे। कभी इन्होंने जातीय समीकरणों को आवाज दी, कभी सामाजिक न्याय की बहस को धार दी, तो कभी सत्ता परिवर्तन की आकांक्षा को जन-जन तक पहुंचाया। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव में चुनावी सभाओं से लेकर पार्टियों ने पोस्टर्स और सोशल मीडिया तक सियासी नारे के के माध्यम से अपना संदेश को कम शब्दों में अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने का काम शुरु कर दिया है।

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