केंद्र सरकार और चुनाव आयोग के खिलाफ कथित वोट चोरी तथा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर विपक्षी दल एक मंच पर नजर आ रहे हैं। 1 नवंबर 2026 को दिल्ली के रामलीला मैदान में INDIA गठबंधन की बड़ी रैली हुई, जिसमें कई विपक्षी दलों के नेताओं ने हिस्सा लिया। अब गठबंधन इस मुद्दे पर आंदोलन को दूसरे राज्यों तक ले जाने की तैयारी कर रहा है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या यह एकता सिर्फ साझा मुद्दों तक सीमित रहेगी या विधानसभा चुनावों में भी विपक्षी दल एक साथ खड़े दिखाई देंगे? राष्ट्रीय स्तर पर एक मुद्दे पर साथ आना और राज्य के चुनाव में सीटों का बंटवारा करना दोनों अलग-अलग चुनौतियां हैं। INDIA गठबंधन के सामने आने वाले महीनों में यही सबसे बड़ी परीक्षा होगी।
वोट चोरी के मुद्दे पर विपक्ष एक मंच पर
विपक्षी दलों ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR और चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर सवाल उठाए हैं। गठबंधन का आरोप है कि मतदाता सूची में गड़बड़ियां हुई हैं। चुनाव आयोग और केंद्र सरकार की ओर से इन आरोपों को लेकर अलग पक्ष रखा गया है। इसलिए इस मुद्दे पर विपक्ष की एकजुटता फिलहाल राजनीतिक विरोध का साझा आधार बनी हुई है।
क्या यह एकता विधानसभा चुनाव तक कायम रहेगी?
लोकसभा चुनाव में साथ लड़ने वाले दलों के सामने विधानसभा चुनाव में स्थानीय समीकरण आ जाते हैं। मुख्यमंत्री पद, सीटों की संख्या और क्षेत्रीय नेतृत्व जैसे सवाल एकता को चुनौती दे सकते हैं। ऐसे में गठबंधन की असली मजबूती चुनावी समझौते के समय सामने आएगी।
उत्तर प्रदेश में सपा-कांग्रेस की परीक्षा
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सीटों के बंटवारे पर बातचीत चल रही है। कांग्रेस ने अपनी पसंद की सीटों की सूची सपा को सौंपी है। दोनों दलों के बीच सम्मानजनक समझौते की कोशिश है, लेकिन सीटों की संख्या और उम्मीदवारों के चयन पर सहमति बनाना आसान नहीं होगा।
क्या अखिलेश और राहुल की दोस्ती चुनाव में भी काम आएगी?
2024 के लोकसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस ने मिलकर उत्तर प्रदेश में 43 सीटें जीती थीं। इस प्रदर्शन ने दोनों दलों को साथ रहने का आधार दिया है। लेकिन विधानसभा चुनाव में 403 सीटों का बंटवारा अधिक जटिल हो सकता है।
पंजाब में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी आमने-सामने
पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार है और कांग्रेस उसकी प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी है। दोनों दलों के बीच राज्य में सत्ता की प्रतिस्पर्धा है। इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता के बावजूद पंजाब में साथ चुनाव लड़ना मुश्किल दिखाई देता है।
आम आदमी पार्टी की INDIA गठबंधन से दूरी
आम आदमी पार्टी को लेकर भी स्थिति स्पष्ट करना जरूरी है। सितंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, AAP पिछले साल INDIA गठबंधन से अलग हो चुकी थी। पंजाब में कांग्रेस और AAP के बीच राजनीतिक मुकाबला जारी है। ऐसे में दोनों दलों का एक साथ चुनाव लड़ना बड़ी चुनौती हो सकता है।
उत्तराखंड में भी सीटों का गणित आसान नहीं
उत्तराखंड में कांग्रेस के सामने अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने की चुनौती है। विपक्षी दलों के बीच सीटों और स्थानीय नेतृत्व को लेकर सहमति बनाना जरूरी होगा। केवल राष्ट्रीय स्तर पर साथ आने से राज्य में चुनावी जीत सुनिश्चित नहीं हो सकती।
दक्षिण भारत में विपक्षी दलों के बीच एक जैसे समीकरण नहीं हैं। केरल में कांग्रेस और वामपंथी दल अलग-अलग राजनीतिक मोर्चों पर हैं। तमिलनाडु में भी 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने DMK के नेतृत्व वाले मोर्चे से अलग होकर TVK के नेतृत्व वाले गठबंधन का साथ चुना। इससे साफ है कि राष्ट्रीय गठबंधन की एकता हर राज्य में एक जैसी नहीं है।
क्षेत्रीय दल अपनी राजनीतिक ताकत नहीं छोड़ना चाहते
कई राज्यों में क्षेत्रीय दलों का अपना मजबूत जनाधार और नेतृत्व है। वे अपने राज्य में अधिक सीटें और राजनीतिक प्रभाव चाहते हैं। कांग्रेस सहित दूसरे राष्ट्रीय दल भी अपना संगठन मजबूत करना चाहते हैं। यही वजह है कि सीट बंटवारे के दौरान मतभेद सामने आ सकते हैं।
INDIA गठबंधन का भविष्य किन बातों पर निर्भर करेगा?
गठबंधन की मजबूती इस बात पर निर्भर करेगी कि उसके सहयोगी दल आपसी मतभेद कितनी समझदारी से सुलझाते हैं। यदि सभी दल सीट बंटवारे, नेतृत्व और चुनावी रणनीति पर सहमति बना लेते हैं तो एकता कायम रह सकती है। लेकिन यदि राज्यों में एक-दूसरे के खिलाफ उम्मीदवार उतारे जाते हैं तो राष्ट्रीय स्तर की एकजुटता कमजोर पड़ सकती है।
क्या फिर बिखर जाएगा विपक्ष?
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि INDIA गठबंधन कुछ महीनों में टूट जाएगा। दिल्ली की रैली और दूसरे राज्यों में प्रस्तावित प्रदर्शन बताते हैं कि साझा मुद्दों पर विपक्षी दल साथ आ सकते हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश, पंजाब और दक्षिण भारत के चुनावी समीकरण गठबंधन की असली परीक्षा लेंगे। आने वाले समय में यह साफ होगा कि विपक्ष की एकता केवल सरकार और चुनाव आयोग के खिलाफ आंदोलन तक सीमित रहती है या चुनावी मैदान में भी कायम रहती है।