एक्सक्लूसिव स्टोरी: ‘तीजन बाई, इंडिया’… और पेरिस से पहुंच गई चिट्ठी

Exclusive Story Teejan Bai India and a letter arrived from Paris

जिस कलाकार का पता पूरा देश था, आज उसकी आवाज़ हमेशा के लिए खामोश हो गई

रायपुर। कभी दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित सांस्कृतिक मंचों पर गूंजने वाली आवाज़ अब हमेशा के लिए शांत हो गई है। पंडवानी गायन को गांव की चौपाल से उठाकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने वाली पद्म विभूषण तीजन बाई अब इस दुनिया में नहीं रहीं। लेकिन उनके जीवन का एक ऐसा किस्सा आज भी उनकी असाधारण लोकप्रियता का सबसे बड़ा प्रमाण माना जाता है—पेरिस से भेजी गई एक चिट्ठी, जिस पर केवल लिखा था, “Teejan Bai, India”… और वह बिना किसी पते के सीधे तीजन बाई तक पहुंच गई। यही वह सम्मान था, जो किसी सरकारी पहचान से नहीं, बल्कि कला की ताकत से मिला था।

जब नाम ही बन गया पूरा पता

पेरिस में भारत महोत्सव के दौरान तीजन बाई ने पहली बार विदेशी दर्शकों के सामने पंडवानी की प्रस्तुति दी। उन्हें आशंका थी कि छत्तीसगढ़ी भाषा में गाई जाने वाली महाभारत की कथा शायद विदेशी समझ नहीं पाएंगे। लेकिन हुआ बिल्कुल उल्टा। दर्शक मंत्रमुग्ध रह गए। उसी प्रस्तुति के बाद एक विदेशी प्रशंसक ने उन्हें पत्र भेजा। लिफाफे पर सिर्फ इतना लिखा था—“Teejan Bai, India.” न शहर, न गांव, न डाकघर और न ही कोई पिनकोड। फिर भी वह चिट्ठी उनके हाथों तक पहुंच गई। यह सिर्फ डाक व्यवस्था की कहानी नहीं थी, बल्कि उस पहचान की मिसाल थी जिसे तीजन बाई ने अपनी कला से अर्जित किया था।

तंबूरे में बसता था पूरा महाभारत

तीजन बाई जब मंच पर तंबूरा लेकर खड़ी होती थीं तो वह सिर्फ गायिका नहीं रहती थीं, बल्कि महाभारत का हर पात्र उनके भीतर जीवित हो उठता था। कभी भीम का पराक्रम, कभी द्रौपदी का दर्द, कभी अर्जुन की दुविधा और कभी श्रीकृष्ण की नीति—सब कुछ उनके स्वर और अभिनय में दिखाई देता था। उनकी प्रस्तुति में दर्शक केवल कहानी नहीं सुनते थे, बल्कि महाभारत को अपनी आंखों के सामने घटित होते हुए महसूस करते थे।

गांव की बेटी बनी दुनिया की पहचान

दुर्ग जिले के अटारी गांव में जन्मी तीजन बाई का बचपन गरीबी में बीता। खेतों में काम करना, झाड़ू और चटाई बनाना, लोकगीत गाना—यही उनकी दुनिया थी। महाभारत की कथाएं उन्होंने अपनी मां के रिश्तेदार बृजलाल पारधी को सुनते-सुनते याद कर लीं। सिर्फ 13 वर्ष की उम्र में उन्होंने पहली सार्वजनिक पंडवानी प्रस्तुति दी और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

परंपरा तोड़ी, इतिहास रचा

उस दौर में महिलाओं को बैठकर पंडवानी गाने की ही अनुमति थी। लेकिन तीजन बाई ने इस परंपरा को चुनौती दी। उन्होंने खड़े होकर ‘कपालिक शैली’ में पंडवानी प्रस्तुत करनी शुरू की, जिसमें कलाकार अभिनय, संवाद और भाव-भंगिमा के साथ पूरी कथा को जीवंत कर देता है। शुरुआत में विरोध हुआ, सामाजिक तिरस्कार भी मिला, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। यही साहस आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी पहचान बना।

पद्मश्री से पद्म विभूषण तक का सफर

लोककला को नई पहचान देने के लिए भारत सरकार ने उन्हें 1988 में पद्मश्री, 2003 में पद्मभूषण और 2019 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया। संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, डी.लिट. जैसी अनेक उपलब्धियां उनके नाम रहीं। उन्होंने फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी, इटली, स्विट्जरलैंड समेत दुनिया के कई देशों में भारतीय लोक संस्कृति का परचम लहराया।

दर्द से भरा रहा निजी जीवन

विश्व मंचों पर सम्मान पाने वाली तीजन बाई का निजी जीवन संघर्षों से भरा रहा। कम उम्र में विवाह, घरेलू हिंसा, आर्थिक तंगी और सामाजिक विरोध—उन्होंने सब कुछ झेला। उन्होंने एक बार कहा था कि जब उनके पति ने मंच पर आकर उन्हें मारा, उसी दिन उन्होंने तय कर लिया कि वह जीवन में किसी भी कीमत पर पंडवानी नहीं छोड़ेंगी। बाद में पति ने उनसे कहा—“या मुझे चुनो, या पंडवानी।” तीजन बाई ने बिना हिचक पंडवानी को चुना।

‘मिठाई खाते वक्त भी जली रोटी याद रहती है’

विश्व प्रसिद्ध कलाकार बनने के बाद भी तीजन बाई ने भिलाई इस्पात संयंत्र में अपनी चतुर्थ श्रेणी की नौकरी नहीं छोड़ी। जब उनसे पूछा गया कि इतनी प्रसिद्धि के बाद भी यह नौकरी क्यों? तो उनका जवाब आज भी लोगों को भावुक कर देता है— “मैं मिठाई खाती हूं, तब भी जली हुई रोटी की याद मुझे हमेशा रहती है।” इस एक वाक्य में उनकी सादगी, संघर्ष और जमीन से जुड़ाव झलकता था।

अंतिम दिनों में बीमारी से जंग

2018 में दिल का दौरा, फिर बेटे की मौत, उसके बाद पक्षाघात और लगातार गिरती सेहत। पिछले कुछ वर्षों में तीजन बाई का स्वास्थ्य लगातार बिगड़ता गया। रायपुर एम्स में इलाज के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके जाने के साथ केवल एक कलाकार नहीं, बल्कि भारतीय लोक परंपरा का एक पूरा युग विदा हो गया।

एक युग का मौन

आज तंबूरा शांत है, लेकिन उसकी गूंज आने वाली पीढ़ियों तक सुनाई देती रहेगी। तीजन बाई ने साबित किया कि लोककला की कोई सीमा नहीं होती। भाषा बदल सकती है, देश बदल सकते हैं, लेकिन कला सीधे दिल तक पहुंचती है। शायद इसलिए पेरिस से भेजी गई वह चिट्ठी, जिस पर सिर्फ लिखा था “तीजन बाई, इंडिया”, बिना किसी पते के भी सही जगह पहुंच गई थी। क्योंकि उस समय तीजन बाई का पता कोई गांव या शहर नहीं था… उनका पता पूरा भारत था।

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