आज खेतों में ड्रोन उड़ रहे हैं, सेंसर मिट्टी की नमी बता रहे हैं और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की
मदद से किसान मौसम से लेकर फसल की बीमारियों तक का अनुमान लगा रहे हैं। खेती तेजी से बदल
रही है। जिस काम में पहले घंटों लगते थे, वह अब कुछ ही मिनटों में हो सकता है। लेकिन इस
आधुनिक खेती के बीच एक सवाल आज भी परेशान करता है। जब दुनिया के पास इतना अनाज उगाने
की क्षमता है, तो करोड़ों लोगों को भरपेट भोजन क्यों नहीं मिल पाता? क्या तकनीक सचमुच भूख
मिटा सकती है, या इस समस्या की जड़ खेतों से कहीं आगे तक जाती है?
हर साल 16 अक्टूबर को विश्व खाद्य दिवस मनाया जाता है। वर्ष 2026 का संदेश है, “Innovate
today, Nourish tomorrow”, यानी आज नवाचार करें, ताकि कल हर किसी को पर्याप्त भोजन मिल
सके। यह संदेश केवल खेती में नई तकनीक अपनाने की बात नहीं करता, बल्कि हमें यह भी सोचने पर
मजबूर करता है कि खेत से निकला अनाज हर जरूरतमंद की थाली तक कैसे पहुंचे।
स्मार्ट फार्मिंग ने खेती के तौर-तरीकों को बदलना शुरू कर दिया है। मोबाइल ऐप किसानों को मौसम
और बाजार की जानकारी देते हैं। खेतों में लगे सेंसर बताते हैं कि मिट्टी में कितनी नमी है और फसल
को कब पानी या खाद की जरूरत है। इससे संसाधनों की बचत होती है और फसल को नुकसान पहुंचने
का खतरा भी कम हो सकता है।
लेकिन तकनीक कितनी भी आधुनिक क्यों न हो, उसका फायदा तभी है जब किसान उसे अपना सकें।
महंगी मशीनें और डिजिटल सुविधाएं अगर छोटे किसानों की पहुंच से बाहर रहें, तो खेती में बदलाव का
लाभ कुछ लोगों तक ही सीमित रह जाएगा।
चीन ने आधुनिक कृषि तकनीक और वैज्ञानिक अनुसंधान के जरिए अनाज उत्पादन बढ़ाने में
उल्लेखनीय प्रगति की है। वर्ष 2025 में वहां अनाज का उत्पादन रिकॉर्ड 71 करोड़ टन से अधिक रहा।
कृषि ड्रोन, बेहतर बीज, आधुनिक मशीनें और खेती में अनुसंधान इस बदलाव के अहम हिस्से हैं।
हालांकि, इस सफलता का श्रेय केवल मशीनों को नहीं दिया जा सकता। किसानों की मेहनत, सरकारी
नीतियों और कृषि ढांचे की भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है।
भारत के सामने चुनौती कुछ अलग है। यहां बड़ी संख्या में छोटे और सीमांत किसान हैं, जिनके लिए
महंगे उपकरण खरीदना आसान नहीं है। ऐसे में तकनीक को साझा सेवाओं के रूप में उपलब्ध कराना
उपयोगी हो सकता है।
'नमो ड्रोन दीदी' योजना इसी दिशा में एक पहल है। इसके तहत 15 हजार महिला स्वयं सहायता समूहों
को कृषि ड्रोन उपलब्ध कराने की योजना बनाई गई है। ये महिलाएं किसानों को ड्रोन सेवाएं देकर कमाई
का नया जरिया बना सकती हैं। इससे किसानों को खुद महंगा ड्रोन खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती और
ग्रामीण महिलाओं को तकनीकी प्रशिक्षण के साथ रोजगार के अवसर भी मिलते हैं।
भूख की समस्या का एक दूसरा पहलू भी है, जिस पर अक्सर कम ध्यान दिया जाता है। वह है खाने की
बर्बादी। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2022 में
दुनिया भर में लगभग 105 करोड़ टन भोजन बर्बाद हुआ। इसमें घरों, रेस्तरां और दुकानों से फेंका गया
खाना शामिल था। इतनी बड़ी मात्रा में भोजन की बर्बादी के बीच भूख का बने रहना हमें अपनी व्यवस्था
पर सवाल उठाने के लिए मजबूर करता है।
आधुनिक कोल्ड स्टोरेज फलों और सब्जियों को लंबे समय तक सुरक्षित रखने में मदद करते हैं।
डिजिटल प्लेटफॉर्म अतिरिक्त भोजन को जरूरतमंदों तक पहुंचाने में उपयोगी हो सकते हैं। बेहतर
परिवहन और भंडारण से भी फसल की बर्बादी घटाई जा सकती है।
लेकिन इस जिम्मेदारी का एक हिस्सा हमारे हाथ में भी है। घर हो या रेस्तरां, उतना ही भोजन लेना
चाहिए जितना खाया जा सके। भोजन की कद्र केवल अच्छी आदत नहीं, बल्कि उन लोगों के प्रति
संवेदनशीलता भी है जिनके पास दो वक्त की रोटी तक नहीं है।
यहां एक जरूरी सवाल उठता है। अगर तकनीक इतनी मददगार है, तो भूख अब तक खत्म क्यों नहीं
हुई? इसका जवाब है कि भूख केवल अनाज की कमी से पैदा नहीं होती। गरीबी, युद्ध, सामाजिक
असमानता और कमजोर वितरण व्यवस्था भी इसके बड़े कारण हैं। किसी बाजार में अनाज उपलब्ध हो
सकता है, लेकिन गरीब परिवार के पास उसे खरीदने के पैसे नहीं होते। कहीं संघर्ष के कारण खाद्य
आपूर्ति बाधित हो जाती है, तो कहीं खराब सड़कों और भंडारण की कमी के कारण फसल खेतों से बाजार
तक नहीं पहुंच पाती।
इसलिए भूख मिटाने के लिए स्मार्ट खेती के साथ किसानों को उचित मूल्य, लोगों को रोजगार, बेहतर
परिवहन, मजबूत खाद्य वितरण व्यवस्था और जरूरतमंदों के लिए प्रभावी सहायता भी जरूरी है।
तकनीक भोजन पैदा करने और बचाने में मदद कर सकती है, लेकिन यह सुनिश्चित करना समाज और
सरकारों की जिम्मेदारी है कि कोई भूखा न रहे।
विश्व खाद्य दिवस 2026 का संदेश हमें भविष्य की ओर देखने के साथ वर्तमान की समस्याओं पर भी
ध्यान देने की याद दिलाता है। असली सफलता तब होगी, जब किसान की मेहनत का उचित मूल्य
मिले, भोजन की बर्बादी घटे और हर व्यक्ति को पौष्टिक भोजन उपलब्ध हो।
(अखिल पाराशर, CGTN हिन्दी संवाददाता, पेइचिंग)