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श्री जानकी मंदिर से चुनावी रणभूमि तक: बिहार में NDA का ‘सीता कार्ड… क्या महागठबंधन की रणनीति होगी फेल?

DigitalDesk by DigitalDesk
August 9, 2025
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Will the foundation stone laying of Shri Janaki temple give BJP an edge in Bihar on the path of Hindutva
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श्री जानकी मंदिर शिलान्यास से क्या हिंदुत्व की राह पर बीजेपी को बिहार में बढ़त मिलेगी? चुनावी समीकरण, सामाजिक तानेबाने और सियासी संदेश का विश्लेषण

 सीतामढ़ी से संदेश, पटना तक हलचल!

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बिहार में जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे राजनीतिक दलों की रणनीतियां भी खुलकर सामने आने लगी हैं। शुक्रवार को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने सीतामढ़ी के पुनौरा धाम में माता जानकी मंदिर के भव्य पुनर्निर्माण की आधारशिला रखी। यह कार्यक्रम महज धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आने वाले चुनावों में संभावित सियासी लाभ का बड़ा माध्यम माना जा रहा है।

पुनौरा धाम: श्रद्धा और रणनीति का संगम

पुनौरा धाम, जिसे माता सीता का जन्मस्थान माना जाता है, बिहार के सीतामढ़ी जिले में भारत-नेपाल सीमा के करीब स्थित है। वर्षों से उपेक्षित रहे इस तीर्थ स्थल को अब ‘रामायण सर्किट’ का हिस्सा बनाकर पर्यटन और धार्मिक आस्था के केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है। जानकी मंदिर के भव्य पुनर्निर्माण का ऐलान पिछले साल हुआ था, लेकिन शिलान्यास अमित शाह के हाथों होना सिर्फ संयोग नहीं, बल्कि रणनीति का संकेत है।

हिंदुत्व का कार्ड: क्या सफल होगा बिहार में?
बिहार, जो अब तक जातीय समीकरण और समाजवादी सोच पर आधारित राजनीति का गढ़ रहा है, वहां हिंदुत्व का मुद्दा कभी निर्णायक भूमिका में नहीं रहा। लेकिन अब बीजेपी इस रिक्त स्थान को भरने की कोशिश में है। अमित शाह द्वारा जानकी मंदिर का शिलान्यास और माता सीता के महत्व को प्रमुखता से प्रस्तुत करना, इस बात का संकेत है कि पार्टी राम नहीं, सीता के नाम पर भी जनभावनाओं को जोड़ने का प्रयास कर रही है।

राजनीति बनाम श्रद्धा: कांग्रेस और विपक्ष का रुख
इस मुद्दे पर कांग्रेस पहले ही सक्रिय हो चुकी है। भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल गांधी ने स्पष्ट तौर पर यह मुद्दा उठाया था कि आरएसएस और बीजेपी ‘जय सिया राम’ नहीं बोलते। उनका तर्क था कि सीता को राम की तुलना में भुला दिया गया है। अब जब बीजेपी खुद सीता के नाम को आगे बढ़ा रही है, तो यह कांग्रेस के ही नैरेटिव का इस्तेमाल उनके खिलाफ किया जा रहा है।

जानकी मंदिर प्रोजेक्ट: धार्मिक विकास या चुनावी निवेश?
यह प्रोजेक्ट न सिर्फ धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि इसका आर्थिक और राजनीतिक पक्ष भी महत्वपूर्ण है। नीतीश कुमार की कैबिनेट ने जुलाई 2025 में इस योजना के लिए 882.87 करोड़ रुपये स्वीकृत किए।
इसमें 137 करोड़ मंदिर व आसपास के परिसर की मरम्मत के लिए
728 करोड़ पर्यटन, सड़क, होटल, कैफेटेरिया, पार्किंग, गार्डन और 3D शो जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास के लिए
मंदिर को बिहार स्टेट टूरिज्म डेवलपमेंट कॉरपोरेशन के जरिए विकसित किया जा रहा है, और इसे केंद्र की ‘रामायण सर्किट’ योजना में भी जोड़ा गया है।

चुनावी नजरिए से BJP को कितना फायदा?

इतिहास पर नजर डालें तो बीजेपी को बिहार में तब बड़ी सफलता मिली जब 2015 में पार्टी को 91 सीटें मिली थीं। लेकिन 1995 जैसे समय में, बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद भी भाजपा को महज 41 सीटें ही मिल सकी थीं। इसका अर्थ यही है कि सिर्फ हिंदुत्व या धार्मिक भावनाओं पर चुनाव जीतना बिहार में अब तक संभव नहीं हुआ।

*जातीय समीकरणों का दबदबा*
बिहार की राजनीति आज भी यादव, कुशवाहा, कुर्मी, दलित और महादलित वोटों के संतुलन पर टिकी हुई है। ऐसे में बीजेपी को जानकी मंदिर जैसे कदमों से सिर्फ प्रतीकात्मक लाभ हो सकता है, जब तक कि वह इसे विकास और रोजगार से भी न जोड़े।

क्या महागठबंधन को नुकसान होगा?

RJD और JDU की राजनीति अब तक सामाजिक न्याय, पिछड़े वर्गों के हक और जातीय संतुलन पर केंद्रित रही है। लेकिन यदि धार्मिक भावनाएं जनसाधारण में गहराई से बैठ जाती हैं, तो यह महागठबंधन के लिए परेशानी का कारण बन सकता है। खासकर वे युवा और महिलाएं, जो धार्मिक स्थलों के विकास को सकारात्मक नजर से देखते हैं।

महिला वोटर को साधने की कोशिश?
माता सीता की छवि एक आदर्श पत्नी, आदर्श बहू और मां के रूप में होती है। जानकी मंदिर के विकास के जरिए बीजेपी खासकर महिला मतदाताओं को भावनात्मक रूप से जोड़ने की कोशिश कर सकती है, जैसा उसने उज्ज्वला योजना या हर घर शौचालय जैसे अभियानों के माध्यम से किया था।

सीता बनाम राम: नया नैरेटिव?
अब तक बीजेपी ने श्रीराम के नाम पर बड़ी सियासत की है — अयोध्या में राम मंदिर इसका उदाहरण है। लेकिन बिहार में ‘सीता’ के नाम पर चुनावी पिच तैयार करना न सिर्फ नया प्रयोग है, बल्कि यह उस वर्ग तक भी पहुंचने की कोशिश है जो महिला सशक्तिकरण, परंपरा और मर्यादा में संतुलन देखना चाहता है।

विपक्ष की रणनीति क्या होगी?
महागठबंधन अब तक इस मुद्दे पर संयम बरते हुए दिख रहा है। कोई तीखी प्रतिक्रिया नहीं आई है, क्योंकि मंदिर के निर्माण को खुलकर विरोध करना खुद उनके लिए आत्मघाती हो सकता है। अब देखना होगा कि वे इसे विकास का मुद्दा बताकर बीजेपी की ‘हिंदुत्व योजना’ को बेअसर करने में सफल हो पाते हैं या नहीं।
जानकी मंदिर का शिलान्यास एक धार्मिक पहल जरूर है, लेकिन इसके पीछे स्पष्ट राजनीतिक उद्देश्य भी छिपा है। यह देखा जाना अभी बाकी है कि क्या माता सीता के नाम पर बिहार में बीजेपी हिंदुत्व के नए अध्याय की शुरुआत कर पाएगी या फिर जातीय और सामाजिक समीकरण एक बार फिर उसकी राह रोकेंगे। लेकिन इतना तय है कि इस एक कार्यक्रम ने बिहार की चुनावी फिजा में एक नया मोड़ जरूर दे दिया है।

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Tags: #BJP in Bihar on the path of Hindutva#Foundation Stone#Shree Janaki temple
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