अबकी बार, किसके किए-धरे की सरकार
बस दो दिन और बचे हैं। शुक्रवार को मध्यप्रदेश की सियासी किस्मत ईवीएम में कैद हो जाएगी। आज शाम को चुनाव प्रचार भी थम जाएंगे। इसके बाद चुनावी मैदान में नेता नहीं वोटरों की बारी आएगी। प्रदेश के पांच करोड़ 43 लाख वोटर तय करेंगे कि वे किस कमल को अपने विकास की बागडोर सौंपने जा रहे हैं। वोटरों का फैसला तो 3 दिसंबर को आ जाएगा, अगर हम इससे पहले हुए कुछ चुनावी सर्वे के आधार पर भावी सरकार की संभावना टटोलें तो तस्वीर थोड़ी धुंधली सी सही, नजर आने लगती है।
चार सर्वे हुए, एक में भाजपा, तीन में कांग्रेस को आगे बताया
एमपी की सियासत पर बीते एक महीने में अलग अलग न्यूज चैनल और एजेंसी ने 4 सर्वे किए हैं। सबसे पहले के तीन ओपिनियन पोल में कांग्रेस को बढ़त दिखाई गई है। वहीं चौथे और सबसे आखिर में आए सर्वे ने पहले के तीनों पोल से इतर बीजेपी के लिए बड़ी बढ़त लेते हुए फिर सरकार बनाने का दावा किया है। इंडिया टीवी-CNX के इस सर्वे में बीजेपी को 119 सीटें मिलने की बात कही गई है। कांग्रेस दूसरे नंबर पर दिख रही। अन्य को 4 सीटें दी जा रही हैं। यह तथ्य भी गौरतलब है कि इससे पहले के तीन सर्वे, जिनमें कांग्रेस की बढ़त दिखाई गई, उनमें भी भाजपा बहुत पीछे नहीं थी। एक में कांग्रेस को 115, भाजपा को 110, अन्य को 5 सीटें, दूसरे में भाजपा को 107-115, कांग्रेस को 112-122 और तीसरे में कांग्रेस को 113-125, वहीं भाजपा को 104-116 सीटें मिलती दिखीं। यानी भाजपा कभी भी टक्कर से बाहर नहीं दिखी। किसी भी सर्वे में भाजपा सरकार बनाने के बहुमत यानी 116 सीटों से बहुत पीछे नहीं दिख रही। वैसे भी पिछली बार भाजपा सीटों की संख्या में भले कांग्रेस से पिछड़ गई हो, वोट प्रतिशत में वह आगे ही थी। यानी उस वक्त भी एंटी इंकमबेंसी जैसा कोई माहौल नहीं थी। उल्टे भाजपा कांग्रेस से करीब 47 हजार ज्यादा वोट पाकर भी सत्ता से बाहर हो गई थी। ऐसे में इस बार वह आसानी से सत्ता में बहाली कर पाएगी, ऐसा न मानने के कोई ठोस कारण नहीं दिख रहे।
वोटर सर्वे से नहीं, अपने हितों को देखकर वोट देगा
अगर सर्वे से इतर वोटर के नजरिए से दोनों पार्टियों की तुलना करें तो तीन पैमानों पर इन्हें देखा जा सकता है। हर वोटर देखेगा कि किस पार्टी ने अब तक उसके लिए क्या किया है, अभी क्या कर रही है और आगे क्या कर सकती है। यानी भूत, वर्तमान और भविष्य। वोटर इतना तो समझदार हो ही चुका है कि नेताओं के लुभावने वादों पर अपने परिवार, समाज के हित को वरीयता दे। अगर दोनों पार्टियों को भूतकाल यानी अब तक के काम के आधार पर देखेगा तो कांग्रेस काफी पिछड़ी दिखेगी। एक वजह तो यही है कि 2019 के बाद के 15 महीने के अवधि छोड़कर कांग्रेस दो दशक से सत्ता से बाहर रही। पुराने वाेटरों को अब भी सड़क, बिजली के अभावों वाली दिग्विजय सिंह की सरकार भूली नहीं होगी। भाजपा की वर्तमान सरकार में खामियां हो सकती हैं, लोगों की तमाम शिकायतें भी हो सकती हैं, पर अधिकांश लोग इसे पुरानी कांग्रेस सरकार से तो बेहतर ही मानते हैं। अगर वोटर वर्तमान सरकार के कामकाज पर नजर डालेगा तो ऐसी कई योजनाएं हैं तो वोटरों के एक बड़े वर्ग को सीधे-सीधे लाभ पहुंचा रही हैं। भाजपा की सबसे प्रभावी योजना लाडली बहनाें के खातों में हर महीने 1250 रुपए ट्रांसफर करने की है। इसके सियासी फायदे भी हैं। संभावना है कि 3 दिसंबर को ये फायदे ईवीएम में वोट के तौर पर नजर भी आ जाएं।





