कब शांत होगा अशांत गाजा … संघर्षविराम के बाद आगे की राह अब भी कठिन..हमास ने फिर की इजराइल की सेना पर गोलीबारी
करीब दो महीने पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गाज़ा को लेकर एक शांति योजना पेश कर पूरी दुनिया को चौंका दिया था। इस योजना के तहत इज़राइल और हमास के बीच संघर्षविराम कराया गया। शुरुआती आशंकाओं के बावजूद यह संघर्षविराम अब तक अधिकांश रूप से बना हुआ है, हालांकि बीच-बीच में तनाव की घटनाएं सामने आती रही हैं। हाल ही में गाज़ा सिटी में इज़राइली हमले में हमास के एक वरिष्ठ नेता की मौत ने हालात की नाजुकता को फिर उजागर कर दिया।
इज़राइल का कहना है कि हमास ने गाज़ा के कुछ इलाकों में, जो इज़राइली नियंत्रण में हैं। उसकी सेनाओं पर गोलीबारी की। वहीं हमास इन आरोपों से इनकार करता रहा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि संघर्षविराम कराना अपेक्षाकृत आसान था, लेकिन असली चुनौती इसके बाद के कदमों में है। गाज़ा युद्ध की रिपोर्टिंग अपने आप में कठिन है क्योंकि इज़राइल स्वतंत्र पत्रकारों को गाज़ा में प्रवेश की अनुमति नहीं देता, सिवाय उन हालात के जब वे सेना के साथ हों। इसके बावजूद क्षेत्र में मौजूद पत्रकारों ने अपने स्रोतों का एक मजबूत नेटवर्क तैयार किया है। इसी कड़ी में एडम रैसगॉन ने हाल ही में क़तर की राजधानी दोहा में हमास के वरिष्ठ नेता हुसाम बदरान से मुलाकात की।
इस मुलाकात में बदरान ने कहा कि हमास अपने हथियारों के भविष्य पर चर्चा के लिए तैयार है, लेकिन केवल तब, जब तीन अहम शर्तों पर “गंभीर” बातचीत हो। ये शर्तें हैं—गाज़ा पट्टी से इज़राइल की पूरी वापसी, गाज़ा में इज़राइली सैन्य अभियानों का पूर्ण अंत, और पश्चिमी तट, गाज़ा व पूर्वी यरुशलम को मिलाकर एक स्वतंत्र फ़िलिस्तीनी राज्य की स्थापना।
यह बयान बताता है कि शांति की राह कितनी जटिल है। एडम रैसगॉन के अनुसार, संघर्षविराम के बाद भी कई मुद्दे ऐसे हैं जिन पर सहमति बनना बाकी है। फिलहाल अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान एक “अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल” (इंटरनेशनल स्टैबिलाइजेशन फोर्स) के गठन पर है। हालांकि इस दिशा में प्रगति बेहद धीमी है और अब तक किसी भी देश ने सार्वजनिक रूप से अपने सैनिक भेजने की प्रतिबद्धता नहीं जताई है।
सबसे बड़ा रोड़ा हमास के हथियारों का मुद्दा है। इज़राइल की मांग है कि गाज़ा को पूरी तरह से असैन्य (डिमिलिटराइज़) किया जाए। ट्रंप की शांति योजना में भी यही बात कही गई है। लेकिन हमास ने अब तक सार्वजनिक रूप से अपने हथियार छोड़ने की सहमति नहीं दी है। इज़राइल और उसके समर्थकों के अनुसार, यह योजना मूल रूप से हमास से आत्मसमर्पण की अपेक्षा करती है, जिसे हमास स्वीकार करने को तैयार नहीं है।
हालांकि हमास ने कुछ रियायतें जरूर दी हैं। उसने लगभग सभी बंधकों और उनके शवों को सौंप दिया है, सिवाय एक के जिसकी तलाश अभी जारी है। इसके बावजूद हथियारों का मुद्दा हमास के लिए बेहद संवेदनशील बना हुआ है। फ़िलिस्तीनी राजनीति में हमास की पहचान ही सशस्त्र संघर्ष से जुड़ी है। यही उसे पश्चिमी तट में सक्रिय फ़िलिस्तीनी प्राधिकरण से अलग बनाता है, जिसे अंतरराष्ट्रीय समर्थन प्राप्त है।
हमास का तर्क है कि अगर वह हथियार छोड़ देता है तो न केवल उसकी वैचारिक पहचान खत्म हो जाएगी, बल्कि गाज़ा में मौजूद उसके विरोधी समूहों से आत्मरक्षा करना भी मुश्किल हो जाएगा। संगठन का दावा है कि गाज़ा में कई ऐसे लोग हैं जिनकी उससे पुरानी दुश्मनी है, और ऐसे में हथियार उसके लिए सुरक्षा का साधन हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल को लेकर भी कई सवाल खड़े हैं। फ़िलिस्तीनी पक्ष और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के कई सदस्य चाहते हैं कि इज़राइल गाज़ा से पीछे हटे। लेकिन जब तक हमास के हथियारों पर स्पष्टता नहीं आती, तब तक इस बल का जनादेश तय करना मुश्किल है। क्या यह बल केवल संघर्षविराम की निगरानी करेगा और इज़राइली व फ़िलिस्तीनी बलों के बीच बफर का काम करेगा? या फिर इसे गाज़ा को असैन्य बनाने के लिए बल प्रयोग करना होगा? इस पर अब तक कोई सहमति नहीं है।
कई देश इस बल में शामिल होने पर विचार कर रहे हैं। अज़रबैजान और इंडोनेशिया के नाम सबसे अधिक चर्चा में हैं। इसके अलावा इटली, मिस्र और संयुक्त अरब अमीरात का नाम भी सामने आया है। हालांकि इनमें से कोई भी देश अपने सैनिकों को हमास के साथ सीधे युद्ध में झोंकना नहीं चाहता।
मध्य पूर्व में इस संघर्ष का प्रभाव दूर तक जाता है। कई देश इस युद्ध के अंत की उम्मीद में शांति प्रक्रिया का समर्थन करना चाहते हैं। साथ ही, कुछ देश अमेरिका और राष्ट्रपति ट्रंप के साथ अपने संबंध मजबूत करने की इच्छा भी रखते हैं। लेकिन अज़रबैजान के एक वरिष्ठ अधिकारी ने साफ कहा है कि उनका देश गाज़ा में युद्ध लड़ने के लिए सैनिक भेजने के पक्ष में नहीं है।
आगे की प्रक्रिया को लेकर क़तर में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन निर्धारित है, जहां यह परखा जाएगा कि कौन-कौन से देश इस बल में सैनिक भेजने को तैयार हैं। जनवरी में एक और सम्मेलन की भी योजना है। हालांकि अब भी यह स्पष्ट नहीं है कि यह बल गाज़ा में इज़राइली नियंत्रण वाले इलाकों में केवल प्रतीकात्मक मौजूदगी दर्ज कराएगा या वास्तव में इज़राइली सैन्य वापसी की ज़मीन तैयार करेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रक्रिया किसी भी समय पटरी से उतर सकती है। अगर ऐसा हुआ तो इज़राइल दोबारा युद्ध का रास्ता चुन सकता है। कई आलोचक इस शांति योजना को त्रुटिपूर्ण मानते हैं, लेकिन साथ ही यह भी कहते हैं कि लंबे समय के संघर्षविराम के लिए फिलहाल यही सबसे बड़ा अवसर है। ऐसे में आने वाले महीनों में होने वाले फैसले गाज़ा और पूरे क्षेत्र के भविष्य के लिए निर्णायक साबित हो सकते हैं।





