अखिलेश यादव के संकटमोचन जाने और पप्पू की दुकान पर चाय पीने के पीछे क्या छिपा है?

Mainpuri Lok Sabha by-election Akhilesh alleges administration is doing work of BJP

लखनऊ। अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) के अंदाज इन दिनों बदल गए हैं। रामचरितमानस पर बेहद विवादित बयान देनेवाले सिपहसालार को पदोन्नति देने के बाद वह बनारस के संकचमोटन मंदिर भी पहुंच गए। कहा जाता है ये वही मंदिर है, जहां गोस्वामी तुलसीदास रहे थे।

उत्तर प्रदेश के वाराणसी दौरे पर सपा प्रमुख अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) ने बृहस्पतिवार रात यानी 9 फरवरी की रात को उस समय सभी को हैरान कर दिया, जब वह पप्पू की छोटी सी चाय की दुकान पर पहुंच गए। यह बनारस की वही मशहूर दुकान है, जो काशीनाथ सिंह की किताब में भी आ चुकी है, जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) ने भी साल 2022 विधानसभा चुनाव प्रचार को दौरान चाय पी थी।

अखिलेश ने नींबू की मसालेदार चाय का गिलास लिया और इसके बाद दुकान में लगी प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर की तरफ चीयर्स कर उसकी घूंट भरी। वाराणसी दौरे पर अखिलेश यादव संकटमोचन हनुमान मंदिर भी गए और वहां मत्था टेका। मान्यता है कि संकटमोचन हनुमान मंदिर में ही रहकर गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस को लिखा था। उसी रामचरितमानस को, जिसे लेकर सपाई इस समय खूब ऊलजलूल बयान दे रहे हैं। इस समय चल रहे विवाद में सबसे ज्यादा विरोधी बयान अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी के नेताओं ने ही दिए हैं।

अखिलेश दुविधा में हैं

रामचरितमानस पर विवादित बयान देने वाले स्वामी प्रसाद मौर्या पर अखिलेश यादव ने कहा कि ये लड़ाई 5 हजार साल पुरानी है। रामचरितमानस पर बहस बहुत लंबे समय से चल रही है और ये चलती ही रहेगी। समाजवादी पार्टी जाति जनगणना पर लड़ेगी। अखिलेश के साथ दिक्कत दरअसल यही है। वह  नए वोटबैंक की फिराक में हैं, क्योंकि मुस्लिम और यादव का गठजोड़ उनको तीन अंकों में भी नहीं पहुंचा पाया। वह अन्य पिछड़ों का वोट लेने के लिए हिंदुओं में फूट डालने की पुरानी रणनीति पर काम कर रहे हैं और अगड़ों-पिछड़ों को उनके सिपहसालार भड़का रहे हैं।

हालांकि, अखिलेश यह भी जानते हैं कि हिंदुत्व को चल रही लड़ाई में वह कहीं नहीं हैं और लोग अभी तक भाजपा के साथ ही हैं। यह इस घटना से भी पता चलता है कि जब प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री के चाय पीकर निकलने के बाद चाय विक्रेता पप्पू से मीडिया वालों ने इस बारे में पूछा तो उन्होंने हंसते हुए महज इतना ही कहा, मोदी है तो मुमकिन है। हालांकि पप्पू का यह जवाब बेहद मामूली था, लेकिन इसे आगामी चुनावों के लिए बनारस के मिजाज की झलक माना जा रहा है।

अखिलेश कौन सी राह चुनें, यह सोच रहे हैं

सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव पैदल चलकर चाय की दुकान जा रहे हैं, लोगों से घुलमिल रहे हैं, एक साल पहले से मंदिर जा रहे हैं., यानी उन्होंने तैयारी शुरू कर दी है। इसके साथ ही वह बीजेपी पर प्रहार का कोई मौका नहीं चूक रहे। अखिलेश ने इन्वेस्टर समिट को जनता की आंखों में धूल झोंकने वाला बताया। अखिलेश ने कहा, ”तुम टाई और सूट पहन कर चले जाओ, तो बीजेपी वाले तुमसे भी MOU साइन करवा लेंगे। इन्वेस्टर मीट के बहाने, केवल जनता को धोखा देना है। पिछले इन्वेस्टर मीट में जो MOU हुए थे, कितने जमीन पर उतरे। डिफेंस एक्सपो में प्रधानमंत्री और पूर्व राष्ट्रपति आए थे। क्या उसका आउटपुट जमीन पर दिखा?”

अखिलेश ने योगी पर भी निशाना साधा। अखिलेश ने कहा, ”योगी जिस इकाना स्टेडियम में क्रिकेट मैच देखने गए थे, उसे समाजवादियों ने बनवाया। योगी को पता ही नहीं कि नो बॉल क्या होती है? स्टंप कितने लगाए जाते हैं? उसके बीच की दूरी क्या होती है? पिच कितने यार्ड की होती है? कुछ पता ही नहीं, बस मैच देखने गए थे।”

अखिलेश यादव ने गंगा की सफाई को लेकर भी सवाल उठाए। कहा कि बीजेपी का ट्रैक रिकार्ड देखो। नमामि गंगा से पूछो, गंगा साफ हो गई क्या? हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के साथ NGT ने सवाल किया, इसके बाद विपक्ष ने सवाल खड़े किया।

अखिलेश निकालेंगे हिंदुत्व और सेकुलरिज्म के बीच की राह

अखिलेश के पिता मरहूम मुलायम की राह बिल्कुल स्पष्ट थी। वह अपने सीने पर तमगे की तरह रामभक्तों पर गोली चलवाने को चिपकाए रहे। अखिलेश दो पाटों के बीच में फंस गए हैं। आपको याद होगा कि विधानसभा चुनाव के दौरान अखिलेश यादव विंध्याचल में स्थित मां विंध्यवासनी मंदिर में दर्शन पूजन के लिए पहुंचे। वहां पर उन्होंने विधिवत मां विंध्यवासनी का दर्शन पूजन किया, लेकिन पास ही कंतित शरीफ के नाम से प्रसिद्ध मुसलमानों के हजरत ख्वाजा इस्माइल चिश्ती की दरगाह पर वह नहीं गए, जबकि दरगाह पर अखिलेश यादव के आने को लेकर पूरी तैयारी थी। मुस्लिम समाज के लोग फूल, बुके और दरगाह पर चढ़ाने के लिए चादर लेकर सपा सुप्रीमो का इंतजार करते रहे। इसके लिए दरगाह को सजाया भी गया था।

अखिलेश संतुलन साधना चाह रहे हैं, लेकिन वही तो मुश्किल है। अब इस संतुलन में अखिलेश का फायदा होता है या नुकसान, यह तो वक्त ही बताएगा।

 

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