मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल ने पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक अनोखा कदम उठाया है। शहर के अशोका गार्डन स्थित स्वामी विवेकानंद पार्क में देश का पहला “एल्गी ट्री” स्थापित किया गया है। यह आधुनिक तकनीक हवा से कार्बन डाइऑक्साइड को सोखकर ऑक्सीजन छोड़ती है और दावा किया जा रहा है कि इसकी एक यूनिट करीब 25 वयस्क पेड़ों के बराबर काम कर सकती है। बढ़ते प्रदूषण, घटते हरित क्षेत्र और शहरीकरण के दबाव के बीच इस तकनीक को भविष्य के “स्मार्ट ग्रीन सॉल्यूशन” के रूप में देखा जा रहा है। खासकर उन इलाकों में, जहां पेड़ लगाने के लिए पर्याप्त जगह उपलब्ध नहीं है, वहां एल्गी ट्री उपयोगी साबित हो सकता है।
आखिर क्या है एल्गी ट्री?
नाम भले ही “ट्री” यानी पेड़ हो, लेकिन यह वास्तव में कोई पेड़ नहीं है। एल्गी ट्री एक विशेष प्रकार का फोटो-बायोरिएक्टर (Photo-Bioreactor) होता है। इसमें कांच या पारदर्शी टैंक के भीतर पानी और सूक्ष्म शैवाल (Microalgae) रखे जाते हैं।ये सूक्ष्म शैवाल सूर्य की रोशनी का उपयोग करके प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) की प्रक्रिया को अंजाम देते हैं। ठीक उसी तरह जैसे प्राकृतिक पेड़-पौधे कार्बन डाइऑक्साइड लेकर ऑक्सीजन छोड़ते हैं, लेकिन माइक्रोएल्गी यह प्रक्रिया कहीं अधिक तेज गति से कर सकती है। सरल शब्दों में कहें तो एल्गी ट्री एक ऐसी मशीन है जो प्रकृति की प्रक्रिया को तकनीक के माध्यम से अधिक प्रभावी बनाती है।
कैसे करता है काम?
एल्गी ट्री के भीतर मौजूद माइक्रोएल्गी लगातार हवा से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करती है। सूर्य के प्रकाश और पानी की मदद से यह गैस को जैविक ऊर्जा में बदलती है और बदले में ऑक्सीजन छोड़ती है।
इस पूरी प्रक्रिया के दौरान:
- वातावरण से CO₂ कम होती है।
- ऑक्सीजन का स्तर बढ़ता है।
- हवा में मौजूद सूक्ष्म प्रदूषक कणों को कम करने में मदद मिलती है।
- स्थानीय स्तर पर वायु गुणवत्ता में सुधार होता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि एल्गी की वृद्धि दर सामान्य पौधों की तुलना में कई गुना अधिक होती है, इसलिए यह कम जगह में अधिक कार्बन अवशोषित कर सकती है।
25 पेड़ों के बराबर कैसे?
एल्गी ट्री को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा उसके इस दावे की हो रही है कि यह अकेले 20 से 25 बड़े पेड़ों जितना काम कर सकता है। इसके पीछे कारण यह है कि माइक्रोएल्गी का प्रकाश संश्लेषण क्षेत्रफल के हिसाब से काफी अधिक प्रभावी माना जाता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, एक एल्गी ट्री सालाना लगभग 1.5 टन कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करने की क्षमता रखता है। हालांकि पर्यावरण विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि इस तुलना का मतलब यह नहीं है कि 25 पेड़ों की जगह एक एल्गी ट्री लगा दिया जाए। पेड़ केवल ऑक्सीजन ही नहीं देते, बल्कि छाया, जैव विविधता, भूजल संरक्षण और तापमान नियंत्रण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
प्रदूषण से जूझते भोपाल के लिए क्यों जरूरी?
पिछले कुछ वर्षों में भोपाल के कई इलाकों में वायु गुणवत्ता लगातार प्रभावित हुई है। टीटी नगर, न्यू मार्केट, एमपी नगर, बागसेवनिया और औद्योगिक क्षेत्र मंडीदीप के आसपास ट्रैफिक, निर्माण कार्य और धूल के कारण प्रदूषण का स्तर बढ़ा है। विशेष रूप से PM2.5 और PM10 जैसे सूक्ष्म कण स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा माने जाते हैं। ये फेफड़ों और हृदय संबंधी बीमारियों का जोखिम बढ़ाते हैं। ऐसे में एल्गी ट्री जैसी तकनीक उन स्थानों पर राहत दे सकती है जहां हरित क्षेत्र विकसित करना कठिन है।
पूरी तरह सौर ऊर्जा से संचालित
इस तकनीक की एक और बड़ी विशेषता यह है कि यह पूरी तरह सौर ऊर्जा से संचालित होती है। यानी इसके संचालन के लिए अतिरिक्त बिजली की आवश्यकता नहीं होती। जानकारी के अनुसार, इस परियोजना को विकसित करने में करीब दो साल का समय लगा और लगभग 50 विशेषज्ञों ने मिलकर इस पर काम किया। यही कारण है कि इसे स्मार्ट सिटी और ग्रीन टेक्नोलॉजी का एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है।
क्या यह पेड़ों का विकल्प बन सकता है?
इस सवाल का जवाब विशेषज्ञ “नहीं” में देते हैं।
एल्गी ट्री को पेड़ों का विकल्प नहीं, बल्कि पूरक तकनीक माना जा रहा है। प्राकृतिक पेड़ पर्यावरण को कई स्तरों पर लाभ पहुंचाते हैं, जबकि एल्गी ट्री का मुख्य उद्देश्य सीमित स्थान में कार्बन अवशोषण और ऑक्सीजन उत्पादन को बढ़ाना है। यानी भविष्य का मॉडल ऐसा हो सकता है जहां शहरों में बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण के साथ-साथ एल्गी ट्री जैसी आधुनिक तकनीकों का भी उपयोग किया जाए।
क्या भविष्य में बढ़ेगा इसका इस्तेमाल?
भोपाल में सफल परीक्षण के बाद इस तकनीक को देश के अन्य बड़े शहरों में भी लगाने की योजना पर विचार किया जा रहा है। यदि इसके परिणाम अपेक्षा के अनुरूप रहे, तो ट्रैफिक जंक्शन, बाजार, औद्योगिक क्षेत्रों और भीड़भाड़ वाले इलाकों में एल्गी ट्री लगाए जा सकते हैं। बढ़ते प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन की चुनौती के बीच यह तकनीक शहरी भारत के लिए एक नई उम्मीद बनकर उभरी है। हालांकि इसकी वास्तविक प्रभावशीलता का आकलन लंबे समय तक निगरानी और वैज्ञानिक अध्ययन के बाद ही पूरी तरह संभव होगा, लेकिन फिलहाल भोपाल ने पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक नई शुरुआत जरूर कर दी है।





