गंगा स्नान के बाद बदली जिंदगी, अपनाई शाकाहारी जीवनशैली’ — उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने काशी में सुनाया प्रेरक किस्सा

Vice President CP Radhakrishnan shared an anecdote from his personal life in the holy city of Kashi in Uttar Pradesh

गंगा स्नान के बाद बदली जिंदगी, अपनाई शाकाहारी जीवनशैली’ — उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने काशी में सुनाया प्रेरक किस्सा

वाराणसी। बनारस यानी काशी की पावन धरती पर शुक्रवार को एक विशेष क्षण देखने को मिला, जब भारत के उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने न सिर्फ एक धर्मशाला का उद्घाटन किया, बल्कि अपने जीवन से जुड़ा एक गहरा अनुभव भी साझा किया। उन्होंने बताया कि 25 साल पहले काशी में गंगा स्नान करने के बाद उनका जीवन पूरी तरह बदल गया। वे तब मांसाहारी थे, लेकिन गंगा के पवित्र जल में स्नान करने के बाद उन्होंने शुद्ध शाकाहारी जीवनशैली अपनाने का संकल्प लिया, जो आज तक कायम है।

उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन शुक्रवार को उत्तर प्रदेश के वाराणसी पहुंचे, जहां उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ श्री काशी नट्टुक्कोट्टई नगर सतराम मैनेजिंग सोसाइटी द्वारा निर्मित नई धर्मशाला (सत्रम) का उद्घाटन किया। यह धर्मशाला तमिल समुदाय के लोगों के लिए काशी में ठहरने की एक नई सुविधा प्रदान करेगी।

‘गंगा ने जीवन बदल दिया’ — उपराष्ट्रपति का आत्मानुभव

समारोह के दौरान अपने संबोधन में राधाकृष्णन ने भावुक होकर कहा, “धर्म अस्थायी रूप से संकट में हो सकता है, लेकिन कभी स्थायी रूप से समाप्त नहीं होता। यह धर्मशाला इस बात का जीवंत उदाहरण है। जब मैं पहली बार काशी आया था, तब मांसाहारी था। लेकिन गंगा स्नान के बाद मेरे भीतर एक गहरा परिवर्तन हुआ। मैंने उसी दिन शाकाहारी बनने का निर्णय लिया, और तब से अब तक उस मार्ग पर स्थिर हूं।” उनकी इस आत्मकथा ने उपस्थित लोगों को भावविभोर कर दिया। कार्यक्रम स्थल पर मौजूद सैकड़ों लोग तालियों की गड़गड़ाहट के साथ उनकी बातों का स्वागत करते नजर आए।

‘आज का काशी, बदला हुआ काशी है’

उपराष्ट्रपति ने आगे कहा कि आज की काशी पहले से बिल्कुल अलग दिखती है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रशंसा करते हुए कहा कि “काशी में जो परिवर्तन आज दिख रहा है, वह मोदी और योगी के नेतृत्व में ही संभव हुआ है। आध्यात्मिकता और आधुनिकता का सुंदर संगम आज इस नगरी में देखने को मिलता है।” उन्होंने काशी में हुए सौंदर्यीकरण कार्यों, विश्वनाथ धाम परियोजना और गंगा घाटों के पुनर्विकास की भी सराहना की।

तमिल समुदाय की सेवा भावना की सराहना

उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने कहा कि यह नई धर्मशाला केवल एक इमारत नहीं, बल्कि उत्तर भारत और दक्षिण भारत के बीच सांस्कृतिक सेतु का प्रतीक है। उन्होंने बताया कि इस सत्रम के निर्माण में तमिलनाडु के नगरथर समुदाय ने करीब 60 करोड़ रुपये का योगदान दिया है। यह समुदाय वर्षों से शिक्षा, सामाजिक कार्य और धार्मिक सेवाओं के क्षेत्र में अपना योगदान देता आ रहा है। उन्होंने कहा, “यह भवन सिर्फ ठहरने की जगह नहीं है, बल्कि यह उत्तर और दक्षिण भारत के बीच की आत्मीयता और सांस्कृतिक समरसता का प्रतीक है। यह वही भावना है, जिसने हजारों वर्षों से भारत की एकता को बनाए रखा है।”

‘काशी-तमिल संगमम’ और देवी अन्नपूर्णा की मूर्ति का उल्लेख

अपने भाषण में उपराष्ट्रपति ने हाल के वर्षों में आयोजित ‘काशी-तमिल संगमम’ का भी जिक्र किया, जिसे उन्होंने राष्ट्रीय एकता का सशक्त प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि “काशी और तमिल संस्कृति के बीच हजारों साल पुराना रिश्ता है। तमिल विद्वान, कवि और संत सदियों से ज्ञान और आध्यात्मिकता की खोज में काशी आते रहे हैं। यह परंपरा आज भी जीवित है।” राधाकृष्णन ने देवी अन्नपूर्णा अम्मन की मूर्ति की वापसी का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि “एक सदी पहले वाराणसी से चोरी हुई अन्नपूर्णा देवी की मूर्ति को 2021 में भारत वापस लाया गया। यह प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत सरकार के निरंतर प्रयासों का परिणाम है। देवी अन्नपूर्णा का काशी विश्वनाथ मंदिर में पुनः प्रतिष्ठापन हमारे सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक है।”

1863 से जारी सेवा परंपरा का विस्तार

उन्होंने बताया कि श्री काशी नट्टुक्कोट्टई नगर सतराम मैनेजिंग सोसाइटी की स्थापना वर्ष 1863 में हुई थी। इसका उद्देश्य काशी आने वाले तमिल भक्तों को आवास, भोजन और सहायता प्रदान करना था। उपराष्ट्रपति ने कहा कि “यह संस्था आज भी उसी भावना से कार्यरत है, और आज इस नई धर्मशाला के रूप में इसका दायरा और बड़ा हुआ है।” उन्होंने इस अवसर पर काशी और तमिलनाडु के लोगों से अपील की कि वे अपनी परंपराओं और मूल्यों को सहेजें और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाएं।

‘आस्था और संस्कृति, भारत की असली पहचान’

कार्यक्रम के अंत में उपराष्ट्रपति ने कहा कि “भारत की असली शक्ति उसकी आस्था, संस्कृति और समरसता में है। जब उत्तर और दक्षिण, पूर्व और पश्चिम एक साथ खड़े होते हैं, तभी भारत की आत्मा जीवंत होती है।” उन्होंने अपने संबोधन का समापन काशी और तमिलनाडु के लोगों को धन्यवाद देते हुए किया और कहा कि “गंगा की इस पवित्र धरती पर लिया गया हर संकल्प जीवन को नई दिशा देता है। मेरा जीवन इसका प्रमाण है।” इस भावनात्मक संबोधन के साथ उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन का वाराणसी दौरा आध्यात्मिकता, संस्कृति और एकता का जीवंत उदाहरण बन गया।  (प्रकाश कुमार पांडेय )

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