वेनेजुएला संकट…रुबियो ने मादुरो को सत्ता से हटाने में मदद की…
जानें कैसे अमेरिकी कंपनियों को मिलेगा तेल का भंडार…
अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को वेनेज़ुएला के खिलाफ कड़े कदम उठाने के लिए प्रेरित करने में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने न केवल राजनयिक प्रयासों को पीछे छोड़ते हुए सैन्य कार्रवाई की दिशा तय करने में मदद की, बल्कि देश के लंबे समय से सत्तारूढ़ नेता निकोलस मादुरो को पकड़ने की योजना को भी आगे बढ़ाया। अब, मादुरो के सत्ता से हटने के बाद, रुबियो का अगला लक्ष्य वेनेज़ुएला को इस स्थिति में लाना है कि वह अमेरिकी कंपनियों को अपने विशाल तेल संसाधनों तक पहुंच दे। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि किसी देश की सरकार गिराना जितना कठिन होता है, उससे कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण होता है उस देश को स्थिरता और प्रभावी शासन की ओर ले जाना।
जनवरी 2026 की शुरुआत में सामने आए घटनाक्रम के अनुसार, एक दोपहर को ओवल ऑफिस में एक महत्वपूर्ण बैठक हुई। इस बैठक में राष्ट्रपति ट्रंप, विदेश मंत्री रुबियो, रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ और जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के अध्यक्ष जनरल डैन केन शामिल थे। चर्चा का मुख्य विषय यह था कि वेनेज़ुएला के खिलाफ अब तक की सीमित सैन्य कार्रवाइयों—जैसे समुद्री इलाकों में घातक नौसैनिक हमले—से आगे कैसे बढ़ा जाए और मादुरो पर निर्णायक प्रहार कैसे किया जाए।
राष्ट्रपति ट्रंप ने साफ शब्दों में कहा कि अब कूटनीति का दौर समाप्त हो चुका है। बैठक के दौरान उन्होंने रिचर्ड ग्रेनेल को फोन किया, जो विशेष दूत के रूप में पूरे वर्ष मादुरो से बातचीत कर रहे थे। ट्रंप ने ग्रेनेल के प्रयासों की सराहना की, लेकिन यह भी स्पष्ट कर दिया कि अब सैन्य कार्रवाई का समय आ गया है। इस फैसले ने अमेरिकी नीति में एक बड़ा मोड़ दिखाया, जहां लंबे समय से चल रही बातचीत को छोड़कर सीधे ताकत का इस्तेमाल करने का रास्ता चुना गया।
यह बैठक 2 अक्टूबर को हुई थी जो रुबियो के लिए विशेष रूप से निर्णायक थी। वर्षों से वे मादुरो को सत्ता से हटाने के पक्षधर रहे थे। उन्हें लगा कि उनका उद्देश्य पूरा होने के करीब है। इसके बाद घटनाएं तेजी से आगे बढ़ीं। जनवरी के पहले सप्ताह में शनिवार की सुबह, फ्लोरिडा स्थित ट्रंप की हवेली में बनाए गए एक अस्थायी ‘सिचुएशन रूम’ से राष्ट्रपति, विदेश मंत्री और पेंटागन के वरिष्ठ अधिकारी सीधे सैन्य अभियान की निगरानी कर रहे थे।
वीडियो फीड पर दिखाया गया कि अमेरिकी सेना की डेल्टा फोर्स के जवान कराकास में एक भूमिगत बंकर में घुसकर निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को पकड़ रहे हैं। यह अभियान अत्यंत गोपनीय और तेज़ी से अंजाम दिया गया। दोनों को हथकड़ियों में जकड़कर हेलीकॉप्टर के जरिए देश से बाहर ले जाया गया और अंततः न्यूयॉर्क के एक हिरासत केंद्र में पहुंचाया गया, जहां उन पर कोकीन तस्करी के आरोपों में मुकदमा चलाया जाना है।
हालांकि यह सैन्य कार्रवाई अपने लक्ष्य में सफल रही, लेकिन इसकी भारी कीमत भी चुकानी पड़ी। वेनेज़ुएला के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, इस अभियान में कम से कम 80 लोगों की मौत हुई। इससे देश के भीतर गुस्सा और अस्थिरता बढ़ने की आशंका है। मादुरो के समर्थक इसे अमेरिकी हस्तक्षेप और संप्रभुता के उल्लंघन के रूप में देख रहे हैं, जबकि उनके विरोधी इसे तानाशाही के अंत के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।
अब असली चुनौती शुरू होती है। मादुरो के हटने के बाद वेनेज़ुएला एक राजनीतिक शून्य की स्थिति में है। वर्षों की आर्थिक बदहाली, तेल उद्योग के पतन, महंगाई और सामाजिक तनाव ने देश को कमजोर कर दिया है। ऐसे में अमेरिका की यह रणनीति कि वह नए नेतृत्व को अमेरिकी तेल कंपनियों के लिए दरवाज़े खोले, स्थानीय जनता और क्षेत्रीय शक्तियों में विरोध पैदा कर सकती है।
मार्को रुबियो के लिए यह सब एक दोधारी तलवार जैसा है। यदि वे वेनेज़ुएला को स्थिरता, आर्थिक सुधार और लोकतांत्रिक शासन की ओर ले जाने में सफल होते हैं, तो यह उनकी विदेश नीति की बड़ी जीत मानी जाएगी। लेकिन यदि देश गृहयुद्ध, अराजकता या लंबे समय तक अस्थिरता में फंसता है, तो इसका दोष भी उन्हीं पर आएगा। ऐसे में वेनेज़ुएला को “चलाना” या वहां प्रभावी बदलाव लाना, मादुरो को हटाने से कहीं अधिक कठिन साबित हो सकता है।





