VB-G-RAM-G का विरोध…कांग्रेस का आंदोलन…इन 6 राज्यों में प्रस्ताव पास

VB G RAM G agitation Resolution passed in these 6 states Congress

VB-G-RAM-G का विरोध…कांग्रेस का आंदोलन…इन 6 राज्यों में प्रस्ताव पास

VB-G-RAM-G: कर्नाटक के मंत्री प्रियंक खड़गे ने VB-G-RAM-G विधेयक को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा है कि यह विधेयक न केवल भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करता है, बल्कि देश की संघीय संरचना (फेडरल स्ट्रक्चर) को भी कमजोर करता है। खड़गे के मुताबिक, यह कानून लोगों के आजीविका के अधिकार पर सीधा हमला है और पंचायतों की शक्तियों को छीनने का प्रयास है।

  1. VB-G RAM-G बिल पर विवाद

  2. अनुच्छेद 21 उल्लंघन का आरोप

  3. प्रियंक खड़गे का हमला

  4. आजीविका अधिकार पर संकट

  5. संघीय ढांचे को नुकसान

  6. पंचायत अधिकार छीनने का आरोप

  7. मनरेगा पर विशेष सत्र

  8. केंद्र सरकार से बहस चुनौती

  9. ग्रामीण रोजगार पर असर

  10. कर्नाटक बनाम केंद्र टकराव

कर्नाटक के बीदर में मीडिया से बातचीत करते हुए प्रियंक खड़गे ने कहा, “यह विधेयक संविधान के अनुच्छेद 21 के खिलाफ है। लोगों से काम करने का अधिकार छीना जा रहा है। आजीविका का अधिकार खत्म किया जा रहा है। यह संघीय ढांचे को भी नष्ट करता है, जहां केंद्र और राज्यों के बीच परामर्श बेहद जरूरी होता है।” उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने राज्यों से सलाह-मशविरा किए बिना यह कानून लाने की कोशिश की है, जो संघीय व्यवस्था की मूल भावना के खिलाफ है।

प्रियंक खड़गे ने सवाल उठाया कि अगर यह विधेयक सच में प्रगतिशील है, तो फिर पंचायतों से अधिकार क्यों छीने जा रहे हैं। उन्होंने कहा, “अगर सरकार इतनी ही आश्वस्त है, तो उसे जनता के बीच जाकर यह बताना चाहिए कि वह मनरेगा (MGNREGA) को क्यों खत्म कर रही है। पंचायतों से शक्तियां छीनकर कोई भी कानून प्रगतिशील नहीं हो सकता।” उन्होंने यह भी कहा कि केंद्र सरकार को देश के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले मजदूरों और किसानों को जवाब देना चाहिए।

मंत्री ने आरोप लगाया कि यह प्रस्तावित कानून न सिर्फ रोजगार की गारंटी को कमजोर करता है, बल्कि ग्रामीण विकास में पंचायतों की भूमिका को भी सीमित करता है। उन्होंने साफ कहा कि राज्य सरकार किसी भी ऐसे कदम का विरोध करती रहेगी, जो संवैधानिक अधिकारों को कमजोर करे, संघीय ढांचे को नुकसान पहुंचाए या ग्रामीण विकास में पंचायतों की भूमिका को कम करे।

इससे पहले कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने भी इस मुद्दे पर बड़ा ऐलान किया था। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) से जुड़े मुद्दों पर चर्चा के लिए विधानसभा का दो दिवसीय विशेष सत्र बुलाने जा रही है। शिवकुमार ने बताया कि केंद्र सरकार द्वारा मनरेगा की जगह नए VB-G RAM-G कानून को लाने से ग्रामीण मजदूरों पर क्या असर पड़ेगा, इस पर गहन चर्चा की जाएगी।

डीके शिवकुमार ने पत्रकारों से बातचीत में कहा, “हमने मनरेगा के मुद्दे पर दो दिन का विशेष सत्र बुलाने का फैसला किया है। इस पर विस्तार से चर्चा होगी। भाजपा इस पर अभियान चलाने वाली है, तो उनके कार्यक्रम क्या हैं, यह भी सामने आना चाहिए। हम भी जनता को बताएंगे कि इस नए कार्यक्रम से क्या होने वाला है।” उन्होंने कहा कि जनता को सच्चाई बताना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है।

इतना ही नहीं, डीके शिवकुमार ने केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी को खुले तौर पर बहस की चुनौती भी दी। उन्होंने कहा कि मनरेगा और नए VB-G RAM-G विधेयक के बीच क्या अंतर है, इस पर सार्वजनिक बहस होनी चाहिए। शिवकुमार ने कहा, “उन्हें कहिए कि बहस के लिए आएं। एक तारीख तय करें। जनता के बीच जागरूकता फैलाना जरूरी है। उनकी पार्टी के अध्यक्ष, विपक्ष के नेता या केंद्र सरकार के किसी भी नेता को चर्चा के लिए आगे आना चाहिए। किसी टीवी चैनल पर खुली बहस होनी चाहिए।”

उन्होंने प्रह्लाद जोशी द्वारा यूपीए सरकार के समय 11 लाख करोड़ रुपये के कथित भ्रष्टाचार के आरोपों पर भी सवाल उठाया। शिवकुमार ने कहा, “अगर सच में इतना बड़ा भ्रष्टाचार हुआ था, तो सीबीआई को जांच के लिए क्यों नहीं कहा जाता?” उनके इस बयान से साफ है कि कर्नाटक सरकार इस मुद्दे पर पीछे हटने के मूड में नहीं है।

गौरतलब है कि दिसंबर 2025 में संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान विकसित भारत–गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) विधेयक, 2025 यानी VB-G RAM-G बिल पारित किया गया था। केंद्र सरकार का दावा है कि इस योजना का उद्देश्य ग्रामीण इलाकों में रोजगार के अवसर बढ़ाना और गांवों का समग्र विकास करना है। इसके लिए सरकार ने 1 लाख 51 हजार 282 करोड़ रुपये के बजट का प्रस्ताव रखा है।

इस विधेयक के तहत हर ग्रामीण परिवार को 100 दिनों की जगह 125 दिनों का मजदूरी आधारित रोजगार देने की गारंटी दी गई है। यह रोजगार उन वयस्क सदस्यों को मिलेगा, जो बिना कुशल श्रम करने के लिए तैयार हैं। सरकार का कहना है कि इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे।

हालांकि, विपक्ष का कहना है कि इस कानून में कई खामियां हैं। विधेयक की धारा 22 के अनुसार, केंद्र और राज्यों के बीच फंड शेयरिंग का अनुपात 60:40 रखा गया है। वहीं उत्तर-पूर्वी राज्यों, हिमालयी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर) के लिए यह अनुपात 90:10 होगा। विपक्ष का आरोप है कि इससे राज्यों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ेगा।

इसके अलावा, विधेयक की धारा 6 के तहत राज्य सरकारों को यह अधिकार दिया गया है कि वे खेती के पीक सीजन यानी बुआई और कटाई के समय कुल 60 दिनों की अवधि को पहले से अधिसूचित कर सकें। विपक्ष का कहना है कि इससे रोजगार के अवसर सीमित हो सकते हैं और मजदूरों को नुकसान उठाना पड़ सकता है।

कुल मिलाकर, VB-G RAM-G विधेयक को लेकर केंद्र और कर्नाटक सरकार के बीच टकराव साफ नजर आ रहा है। जहां केंद्र इसे ग्रामीण विकास और रोजगार बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम बता रहा है, वहीं कर्नाटक सरकार और विपक्ष इसे संविधान, संघीय ढांचे और गरीबों के अधिकारों पर हमला मान रहे हैं। आने वाले दिनों में यह मुद्दा राजनीतिक और संवैधानिक बहस का बड़ा केंद्र बन सकता है।

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