ट्रंप ने H-1B वीजा की फीस 10 गुना से भी ज्यादा बढ़ाई, जानें भारतीयों पर क्या होगा असर
नई दिल्ली, 20 सितंबर 2025 – अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बड़ा फैसला लेते हुए H-1B वीज़ा फीस को 10 गुना से भी ज्यादा बढ़ा दिया है। अब विदेशी प्रोफेशनल्स को इस वीज़ा के लिए 1 लाख डॉलर (करीब 88 लाख रुपये) तक की फीस चुकानी होगी। यह कदम न केवल अमेरिकी कंपनियों के लिए खर्चीला साबित होगा बल्कि भारतीय प्रोफेशनल्स और छात्रों के लिए भी बड़ा झटका माना जा रहा है।
H-1B वीज़ा क्या है?
H-1B एक अस्थायी अमेरिकी वर्किंग वीज़ा है। कंपनियां इसके जरिए हाईली स्किल्ड विदेशी प्रोफेशनल्स को नियुक्त कर सकती हैं। 1990 में इसे खासतौर पर STEM (Science, Technology, Engineering, Mathematics) सेक्टर के लिए शुरू किया गया था। शुरुआत में यह वीजा 3 साल के लिए दिया जाता है और इसे अधिकतम 6 साल तक बढ़ाया जा सकता है। ग्रीन कार्ड धारकों को यह अनिश्चितकाल तक रिन्यू कराया जा सकता है। अब तक H-1B वीजा फीस एक से आठ लाख रुपये तक थी, लेकिन नए नियमों के बाद यह 88 लाख रुपये से भी ज्यादा हो जाएगी।
ट्रंप प्रशासन का तर्क
व्हाइट हाउस के स्टाफ सेक्रेटरी विल शार्फ के अनुसार H-1B वीजा का लंबे समय से गलत इस्तेमाल हो रहा है। इसका उद्देश्य केवल उन्हीं विदेशी प्रोफेशनल्स को लाना था, जिनकी स्किल्स अमेरिकी वर्कफोर्स में उपलब्ध नहीं हैं। नए नियम से कंपनियों को किसी आवेदक को स्पॉन्सर करने के लिए अब 100,000 डॉलर फीस देनी होगी।
भारतीयों पर सीधा असर
भारतीय H-1B वीज़ा धारकों की संख्या सबसे ज्यादा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2024 में 71% H-1B वीज़ा भारतीयों को मिले, जबकि चीन 11.7% के साथ दूसरे नंबर पर रहा। ग्रीन कार्ड का इंतजार कर रहे करीब 10 लाख भारतीय पहले से ही लंबी कतार में हैं। हर बार वीजा रिन्यू कराने पर उन्हें अब 88 लाख रुपये से ज्यादा फीस चुकानी होगी।
टेक कंपनियों पर असर
2025 की पहली छमाही में
अमेज़न और AWS: 12,000+ H-1B अप्रूवल
माइक्रोसॉफ्ट और मेटा: 5,000+ अप्रूवल
अब इन कंपनियों का ऑपरेटिंग कॉस्ट काफी बढ़ जाएगा। अमेरिका में कुशल कर्मचारियों की कमी और गहरी हो सकती है।
अमेरिकन ड्रीम’ महंगा हुआ
अब भारतीय छात्रों और प्रोफेशनल्स के लिए अमेरिका में करियर बनाना पहले से कहीं कठिन हो जाएगा। वीज़ा एप्लिकेशन की लागत इतनी बढ़ गई है कि सिर्फ बड़े कॉरपोरेट्स ही इसे वहन कर पाएंगे। छोटे व्यवसाय और स्टार्टअप्स के लिए विदेशी टैलेंट हायर करना लगभग असंभव हो जाएगा।
नया ‘गोल्ड कार्ड’ प्रोग्राम
ट्रंप ने हाल ही में ‘गोल्ड कार्ड’ वीजा भी लॉन्च किया है व्यक्तियों के लिए फीस: 10 लाख डॉलर। कंपनियों/बिजनेस के लिए फीस: 20 लाख डॉलर। इसका लक्ष्य है केवल असाधारण और टॉप लेवल टैलेंट को अमेरिका लाना। अमेरिकी वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लुटनिक के मुताबिक, रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड प्रोग्राम अब बेकार है, इसलिए गोल्ड कार्ड को प्रोत्साहित किया जा रहा है।
नागरिकता पर सख्ती
ट्रंप प्रशासन ने नागरिकता टेस्ट को भी फिर से कठिन बनाने का फैसला किया है उम्मीदवारों को अमेरिकी इतिहास और राजनीति से जुड़े 128 सवाल पढ़ने होंगे। टेस्ट के दौरान 20 सवाल पूछे जाएंगे, जिनमें से कम से कम 12 सही देने होंगे। यह नियम पहले ट्रंप के कार्यकाल में लागू हुआ था, जिसे बाइडेन सरकार ने रद्द कर दिया था।
भारत के लिए नुकसान या फायदा?
नीति आयोग के पूर्व सीईओ अमिताभ कांत का कहना है H-1B फीस बढ़ने से अमेरिका में इनोवेशन की रफ्तार धीमी होगी। भारत के बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे और गुड़गांव जैसे शहर नए इनोवेशन हब बन सकते हैं। अमेरिका की रिसर्च लैब्स और पेटेंट्स भारत की ओर शिफ्ट हो सकते हैं। यानी यह कदम अमेरिका के लिए ब्रेन ड्रेन और भारत के लिए ब्रेन गेन साबित हो सकता है।
डोनाल्ड ट्रंप का यह फैसला अमेरिकी इमिग्रेशन पॉलिसी में ऐतिहासिक बदलाव है। भारतीयों के लिए “अमेरिकन ड्रीम” अब और महंगा हो गया है। कंपनियों का खर्च कई गुना बढ़ जाएगा और कुशल कर्मचारियों की कमी भी गहराएगी। हालांकि, भारत के लिए यह मौका है कि वह अपने प्रतिभाशाली युवाओं को रोककर देश को वैश्विक इनोवेशन हब बना सके। अब देखना यह होगा कि अमेरिकी चुनावों से पहले यह फैसला ट्रंप को राजनीतिक फायदा देता है या अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा नुकसान लेकर आता है। (प्रकाश कुमार पांडेय)





