मिशन 2027: यूपी में सियासी महाभारत….बीजेपी की हैट्रिक की कोशिश, सपा-बसपा और कांग्रेस भी तलाश रही सत्ता की राह
उत्तर प्रदेश की राजनीति एक बार फिर गरमाने लगी है। 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी रणनीतियों को अंतिम रूप देने में जुट गए हैं। 2022 के चुनाव में जहां भारतीय जनता पार्टी ने प्रचंड बहुमत हासिल कर सत्ता बरकरार रखी थी, वहीं समाजवादी पार्टी मुख्य विपक्ष के रूप में उभरी थी। इसके अलावा बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस जैसी पार्टियों को उम्मीद से काफी कम सीटों पर संतोष करना पड़ा था। ऐसे में अब सवाल यह उठ रहा है कि 2027 की चुनावी जंग में कौन सा दल किस रणनीति के साथ मैदान में उतरेगा और सत्ता की कुर्सी तक पहुंचने के लिए किसका समीकरण सबसे मजबूत साबित होगा।
2022 का चुनावी गणित
उत्तर प्रदेश विधानसभा की कुल 403 सीटों के लिए फरवरी से मार्च 2022 के बीच सात चरणों में मतदान हुआ था। इन चुनावों में भाजपा और उसके सहयोगियों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 255 सीटों पर जीत दर्ज की थी और लगातार दूसरी बार सरकार बनाने में सफल रही थी। समाजवादी पार्टी को 111 सीटें मिली थीं और वह सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बनकर उभरी थी। अन्य दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों के खाते में 34 सीटें आई थीं, जबकि कांग्रेस को केवल 2 सीटें और बहुजन समाज पार्टी को महज 1 सीट पर ही जीत मिल सकी थी। यह परिणाम इसलिए भी खास था क्योंकि 1985 के बाद पहली बार ऐसा हुआ था जब कोई सरकार अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा करने के बाद दोबारा पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में लौटी। अब भाजपा की नजर तीसरी बार सत्ता हासिल कर इतिहास रचने पर है।
जातीय समीकरण का बड़ा असर
उत्तर प्रदेश की राजनीति को समझने के लिए यहां के सामाजिक और जातीय समीकरण को समझना बेहद जरूरी है। प्रदेश में ओबीसी यानी अन्य पिछड़ा वर्ग की आबादी लगभग 40 से 45 प्रतिशत मानी जाती है। इसके अलावा अनुसूचित जाति यानी दलित वर्ग करीब 21 से 22 प्रतिशत है, जबकि मुस्लिम आबादी लगभग 19 से 20 प्रतिशत के आसपास मानी जाती है। वहीं सवर्ण वर्ग की हिस्सेदारी लगभग 18 से 20 प्रतिशत के बीच बताई जाती है। सवर्ण समुदाय के भीतर भी अलग-अलग जातियों का प्रभाव है। ब्राह्मणों की संख्या लगभग 10 से 11 प्रतिशत के बीच मानी जाती है, जबकि ठाकुर या राजपूत करीब 6 से 7 प्रतिशत हैं। वैश्य या बनिया समुदाय लगभग 2 से 3 प्रतिशत और कायस्थ व अन्य सवर्ण वर्ग करीब 1 से 2 प्रतिशत के आसपास हैं।
ओबीसी वोट बैंक की अहम भूमिका
उत्तर प्रदेश में ओबीसी वोट बैंक चुनावी नतीजों को प्रभावित करने में बड़ी भूमिका निभाता है। यादव समुदाय की आबादी लगभग 9 से 10 प्रतिशत मानी जाती है और इसे समाजवादी पार्टी का पारंपरिक आधार माना जाता है। इसके अलावा कुर्मी करीब 4 से 5 प्रतिशत, लोध या लोधी करीब 3 से 4 प्रतिशत के आसपास हैं। सैनी, मौर्य, कुशवाहा और शाक्य जैसे समुदायों की हिस्सेदारी लगभग 4 से 5 प्रतिशत मानी जाती है। वहीं निषाद, बिंद, मछुआरा और केवट जैसे समुदाय लगभग 3 से 4 प्रतिशत के आसपास हैं। इनके अलावा अन्य ओबीसी समूह मिलाकर लगभग 15 प्रतिशत के करीब माने जाते हैं।
दलित वोट बैंक का समीकरण
दलित समुदाय भी उत्तर प्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जाटव समुदाय, जिसे बसपा का मुख्य आधार माना जाता है, लगभग 10 से 11 प्रतिशत के आसपास है। इसके अलावा पासी समुदाय करीब 4 से 5 प्रतिशत और वाल्मीकि सहित अन्य दलित वर्ग लगभग 5 से 6 प्रतिशत के आसपास माने जाते हैं। यही वजह है कि राजनीतिक दल चुनावों के दौरान इन सामाजिक वर्गों को अपने साथ जोड़ने के लिए अलग-अलग रणनीतियां बनाते हैं।
2027 की चुनौती
2027 का चुनाव भाजपा के लिए इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि पार्टी लगातार तीसरी बार सत्ता हासिल करने की कोशिश करेगी। वहीं समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव सत्ता में वापसी के लिए अपनी रणनीति मजबूत करने में जुटे हैं। सपा “पीडीए” यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण को मजबूत कर भाजपा को चुनौती देने की कोशिश कर रही है। दूसरी तरफ बहुजन समाज पार्टी के सामने अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस पाने की बड़ी चुनौती है। 2007 में पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने वाली बसपा पिछले कई वर्षों से सत्ता से बाहर है और पार्टी को फिर से मजबूत बनाने के लिए नए सिरे से प्रयास करने पड़ रहे हैं। कांग्रेस की स्थिति भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं है। कभी उत्तर प्रदेश की राजनीति में प्रमुख भूमिका निभाने वाली कांग्रेस पिछले कई दशकों से हाशिए पर है। ऐसे में पार्टी 2027 के चुनाव को अपनी राजनीतिक वापसी का मौका मानकर संगठन को मजबूत करने में जुटी है।
पंचायत चुनाव से मिले संकेत
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव 2027 के विधानसभा चुनाव की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। इन चुनावों से यह संकेत मिल सकता है कि किस दल की पकड़ जमीनी स्तर पर मजबूत है और कौन सा दल अपने संगठन को बेहतर तरीके से सक्रिय कर पा रहा है।
आगे और तेज होगी सियासत
कुल मिलाकर साफ है कि उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव बेहद दिलचस्प और मुकाबले वाला होने वाला है। भाजपा जहां जीत की हैट्रिक लगाने की कोशिश में है, वहीं समाजवादी पार्टी सत्ता में वापसी का सपना देख रही है। बसपा अपनी खोई हुई ताकत को दोबारा हासिल करना चाहती है, जबकि कांग्रेस भी प्रदेश में अपना पुराना प्रभाव वापस लाने की कोशिश कर रही है। आने वाले महीनों में राजनीतिक गतिविधियां और तेज होंगी। रैलियां, गठबंधन और सामाजिक समीकरणों की नई रणनीतियां देखने को मिलेंगी। अब देखना यह होगा कि किस दल की रणनीति सबसे प्रभावी साबित होती है और उत्तर प्रदेश की जनता 2027 में किसे सत्ता की चाबी सौंपती है।





