उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार के बाद राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। विपक्ष जहां इसे भाजपा की “डैमेज कंट्रोल एक्सरसाइज” बता रहा है, वहीं भाजपा इसे 2027 विधानसभा चुनाव की रणनीतिक तैयारी के रूप में पेश कर रही है। आज शपथ लेने वालों में भूपेंद्र चौधरी के साथ, मनोज पांडे, अजीत पाल, सोमेंद्र तोमर, श्रीमती कृष्णा पासवान, हंसराज विश्वकर्मा, सुरेंद्र दिलेर और कैलाश राजपूत शामिल हैं, जिन्हें राज्यपाल ने मंत्रिपद की शपथ दिलाई।
- UP में योगी मंत्रिमंडल का विस्तार
- जातीय संतुलन पर बीजेपी का बड़ा फोकस
- 2027 के चुनाव के लिए बीजेपी तैयार
- दो मंत्रियों का प्रमोशन,6 नए चेहरे
- योगी मंत्रिमंडल में शामिल 6 नए चेहरे
- कुल 8 मंत्रियों ने ली शपथ
- जन भवन में शपथ ग्रहण समारोह
- मनोज कुमार पांडे समेत 8 विधायक बने मंत्री
- राज्यपाल आनंदी बेन पटेल ने दिलाई शपथ
- जातीय संतुलन पर बीजेपी का बड़ा फोकस
- 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी
समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने तंज कसते हुए कहा कि जब सरकार 9 साल में कुछ खास नहीं कर पाई, तो नए मंत्री 9 महीनों में क्या कर लेंगे। इसके जवाब में भाजपा समर्थक इसे सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन मजबूत करने वाला कदम बता रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक भाजपा इस विस्तार के जरिए खास तौर पर गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित वोट बैंक को साधने की कोशिश कर रही है। साथ ही ब्राह्मण और जाट समुदाय की नाराजगी कम करने की रणनीति भी दिखाई दे रही है।
नए चेहरों में पश्चिमी यूपी से जाट नेता भूपेन्द्र सिंह चौधरी , अवध क्षेत्र से ब्राह्मण चेहरा मनोज पांडेय तो बुंदेलखंड से दलित समाज की प्रतिनिधि कृष्णा पासवान कर रही हैं।वहीं पूर्वांचल से विश्वकर्मा समाज के नेता हंसराज विश्वकर्मा और केंद्रीय यूपी से लोधी समाज के कैलाश राजपूत जैसे नाम में हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा “पीडीए” यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण की काट निकालने की कोशिश में जुटी है। यही वजह है कि मंत्रिमंडल विस्तार में जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों का विशेष ध्यान रखा गया है। हालांकि विपक्ष का दावा है कि केवल चेहरे बदलने से एंटी इनकंबेंसी खत्म नहीं होगी। बुलडोजर कार्रवाई और कानून-व्यवस्था को लेकर उठ रहे सवालों का असर भी चुनाव में देखने को मिल सकता है। दूसरी तरफ भाजपा समर्थकों का कहना है कि “योगी मॉडल” अब दूसरे राज्यों में भी चर्चा का विषय बन चुका है। विशेष बात यह भी है कि इस विस्तार में युवा चेहरों और पुराने संगठनात्मक परिवारों से जुड़े नेताओं को भी जगह है। माना जा रहा है कि भाजपा चुनाव से पहले सामाजिक संदेश देने और संगठनात्मक संतुलन बनाने की दोहरी रणनीति पर काम कर रही है।





